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इस्‍लाम जर्मनी का हिस्‍सा है या नहीं? सवाल पर बंटा देश

एक इंटरव्यू में गृह मंत्री हॉर्स्ट जेहोफर ने कहा, "इस्लाम जर्मनी का हिस्सा नहीं है। जर्मनी को ईसाइयत ने आकार दिया है। यहां रहने वाले मुसलमान बेशक जर्मनी का हिस्सा हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों को कुरबान कर दें।"

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इस्लाम जर्मनी का हिस्सा है या नहीं? हाल के सालों में इस सवाल की गूंज बार-बार जर्मन राजनीति में सुनाई देती रही है। इस सवाल ने न सिर्फ जर्मनी की सियासत को प्रभावित किया है, बल्कि जर्मन समाज के ताने बाने पर भी इसका असर दिख रहा है। लेकिन इस्लाम को लेकर ताजा बहस की शुरुआत जर्मनी की नई सरकार में गृह मंत्री का पद संभालने वाले हॉर्स्ट जेहोफर के बयान से हुई है। जर्मनी में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार बिल्ड को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “इस्लाम जर्मनी का हिस्सा नहीं है। जर्मनी को ईसाइयत ने आकार दिया है। यहां रहने वाले मुसलमान बेशक जर्मनी का हिस्सा हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों को कुरबान कर दें।” इसके तुरंत बाद जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल का बयान आया जिसमें उन्होंने साफ कहा कि चालीस लाख से ज्यादा मुसलमानों ने जर्मनी को अपना घर बनाया और ये मुसलमान जर्मनी का हिस्सा हैं इसलिए उनका धर्म इस्लाम भी जर्मनी का हिस्सा है।

सीडीयू पार्टी की नेता अंगेला मैर्केल और सीएसयू पार्टी के नेता जेहोफर बेहद करीबी सहयोगी रहे हैं। लेकिन कुछ मुद्दों पर उनकी राय एकदम अलग है। 2015 में जब मैर्केल ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को जर्मनी में आने की अनुमति दी थी तो जेहोफर इस फैसले से कतई खुश नहीं थे। नए चुनावों के बाद सरकार में शामिल होने से पहले उन्होंने इस बात पर चांसलर मैर्केल को सहमत करा दिया कि जर्मनी में एक साल के भीतर दो लाख से ज्यादा नए शरणार्थी नहीं आ सकते हैं। जर्मनी में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान उन “मेहमान कामगारों” के वंशज हैं जिन्हें काम करने के लिए 1960 और 1970 के दशक में तुर्की से लाया गया था। लेकिन देश की मुस्लिम आबादी में 2015 में एकदम से इजाफा हो गया जब चांसलर मैर्केल ने युद्ध झेल रहे सीरिया, इराक और अफगानिस्तान के लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए। एक झटके में दस लाख से ज्यादा मुसलमान जर्मनी में आ गए।

वैसे जर्मनी में इस्लाम को लेकर बहस पुरानी है। 2006 में चांसलर मैर्केल की पहली सरकार में गृह मंत्री रहे वोल्फगांग शौएब्ले ने कहा था कि इस्लाम जर्मनी और यूरोप का हिस्सा है। उस वक्त इस बयान पर थोड़ी बहुत प्रतिक्रिया हुई थी। लेकिन जब 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति क्रिस्टियान वुल्फ ने फिर इस बात को दोहराया तो एक राष्ट्रीय बहस शुरू हो गई कि आखिर जर्मन होने का मतलब क्या है। चांसलर मैर्केल लगातार कहती रही हैं कि इस्लाम और मुसलमान जर्मनी का हिस्सा हैं और उनकी नई सरकार भी मुस्लिम समुदाय के साथ उस संवाद को जारी रखेगी जिसकी शुरुआत 2006 में शौएब्ले ने की थी। लेकिन गृह मंत्री होने के नाते जेहोफर को ही इस संवाद का नेतृत्व करना है।

जाहिर है 2006 के बाद से बहुत कुछ बदल गया है। कई लोग अपने आसपास इतने सारे विदेशियों को देखकर परेशान हैं। सड़कों पर बुर्के और हिजाब पहन कर चलने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ रही है। पश्चिमी देशों में बीच-बीच में होने वाली आतंकवादी हमलों के कारण उनके मन में इस्लामोफोबिया यानी ‘इस्लाम का डर’ घर कर रहा है। इसके खिलाफ बाकायदा पेगीडा नाम से एक अभियान शुरू हो गया, जिसे हजारों लोगों का समर्थन मिला। लेकिन इसकी सियासी फसल धुर दक्षिणपंथी एएफडी पार्टी ने काटी जो आज जर्मन संसद में मुख्य विपक्षी पार्टी है। दूसरी तरफ इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम शरणार्थियों को लेने के कारण मैर्केल को बड़ा सियासी नुकसान उठाना पड़ा है। पिछले साल हुए आम चुनावों में उनकी पार्टी को 2013 के आम चुनावों के मुकाबले लगभग आठ प्रतिशत वोट कम मिले। इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार बनाने के लिए उन्हें कई अहम मंत्रालय गठबंधन में जूनियर पार्टनर एसपीडी पार्टी को देने पड़े हैं।

बतौर गृह मंत्री जर्मन संसद में अपने पहले भाषण में जेहोफर ने कहा कि इस्लामी आंतकवाद के कारण सुरक्षा को लेकर खतरा बढ़ा है और इसीलिए जर्मनी की सीमाओं पर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने की जरूरत है। जर्मनी की संघीय सरकार में गृह मंत्री का पद संभालने से पहले जेहोफर जर्मनी के दक्षिण राज्य बवेरिया के मुख्यमंत्री थे। जो लोग 2015 में बाल्कन देशों से होते जर्मनी में आए, उनमें से ज्यादातर बवेरिया से दाखिल हुए। एक समय तो ऐसा था जब वहां हर रोज 10 हजार लोग पहुंच रहे थे। इसे लेकर इलाके में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली। अब बतौर गृह मंत्री जेहोफर दोषी करार दिए जा चुके प्रवासियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने का वादा कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने ऐसे शरणार्थियों को वापस उनके देश भेजने की प्रक्रिया तेज करने की बात भी कही है जिनकी शरण की याचिका खारिज हो चुकी है।

जर्मनी में शरणार्थी और इस्लाम से जुड़े सवाल बराबर उठते रहेंगे। ऐसे सवालों के जवाबों की उम्मीद सरकार प्रमुख होने के नाते चांसलर मैर्केल से ही सबसे ज्यादा होगी। उन चिंताओं पर ध्यान देना ही होगा जो शरणार्थियों और मुसलमानों के चलते स्थानीय आम लोगों के मन में घर कर रही हैं। अगर ऐसा करने में नई सरकार नाकाम रहती है तो धुर दक्षिणपंथी और मजबूत होंगे और साथ ही समाज में टकराव बढ़ेगा।

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