अमेरिका की आपत्ति के बावजूद ईरान और ओमान होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूलने की तैयारी कर रहे हैं। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।

ईरान और ओमान का यह प्लान अगर लागू होता है तो यह एक बड़ा बदलाव होगा। ईरान-अमेरिका युद्ध से पहले इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध के दौरान होर्मुज जलमार्ग ईरान द्वारा बंद कर दिया गया था। इस वजह से पूरी दुनिया में गैस और तेल की सप्लाई प्रभावित हुई थी। युद्ध खत्म होने के बाद से ही ईरान लगातार कह रहा है कि वह होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूलना चाहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ओमान ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को एक प्रस्ताव भेजा है। इसमें सुझाव दिया गया है कि होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों की कंपनियां वहांं से गुजरने के लिए एक तय फीस चुकाएं।

‘जबरन वसूली को दिया गया ‘सेवा शुल्क’ का नाम’

न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए एक सूत्र ने बताया कि अमेरिकी अधिकारियों को यह प्रस्ताव मिल गया है और वे इस पर ओमान के अधिकारियों के साथ चर्चा करेंगे। इस सूत्र और एक राजनयिक ने कहा कि इस प्रस्ताव में जबरन टोल टैक्स की जगह स्वेच्छा से दिए जाने वाले ‘सेवा शुल्क’ की बात कही गई है।

दूसरी तरफ ईरान के एक अधिकारी ने कहा कि यह फीस सभी के लिए जरूरी होगी। होर्मुज जलमार्ग का भविष्य में संचालन कैसे होगा, यह अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।

मलक्का और सिंगापुर जलमार्ग की तर्ज पर लगाना चाहते हैं शुल्क

पश्चिम एशिया के एक राजनयिक के अनुसार, ओमान का यह प्रस्ताव मलक्का और सिंगापुर जलमार्ग में अपनाई जाने वाली व्यवस्था से प्रेरित है। वहां एक निजी संस्था जहाजों और कंपनियों से फीस लेती है। इसका उपयोग समुद्री सुरक्षा और सुरक्षित नौवहन से जुड़े कामों पर किया जाता है।

सोमवार को ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि ईरान की सबसे बड़ी कोशिश यह है कि ओमान के साथ एक समझौता हो जाए ताकि दोनों देश मिलकर होर्मुज जलमार्ग से होने वाले ट्रैफिक को मैनेज कर सकें।

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भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक जी. कृष्णकुमार के मुताबिक, इस संकट से निपटने का पहला और सबसे बड़ा सहारा था, तेल खरीदने के कई विकल्प होना। अगर कोई देश सिर्फ दो-तीन देशों से ही तेल खरीदता है, तो वह उन्हीं पर निर्भर रहता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें