Iran Israel War History Explained:मध्य-पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। यह संघर्ष दशकों पुराना है जो समय-समय पर युद्ध जैसे हालात पैदा करता रहा है। हाल के दिनों में यह टकराव और ज्यादा खतरनाक हो गया है और पूरे क्षेत्र में बड़े युद्ध की आशंका बढ़ गई है। यूनाइटेड स्टेट्स और इजरायल ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को ईरान पर हमला किया जिसके बाद पश्चिम एशिया एक नए संघर्ष में घिर गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य अमेरिका के लिए पैदा हुए सुरक्षा खतरे को खत्म करना है और ईरान के लोगों को अपने शासकों के खिलाफ खड़े होने का मौका देना है। लेकिन यूएस-इजरायल-ईरान के इन हमलों के बाद क्षेत्र के तेल उत्पादक खाड़ी देशों में चिंता बढ़ गई क्योंकि पूरे इलाके में संघर्ष के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया। वहीं इजरायल ने कहा कि इसके जवाब में ईरान ने इजरायल की ओर मिसाइलें दागीं।
ईरान ने भी जवाबी हमला करते हुए चेतावनी दी कि वह इस कार्रवाई का बदला लेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने शनिवार (28 फरवरी 2026) को कहा कि इजरायल और अमेरिका को अपने इस कदम पर ‘पछताना पड़ेगा।’ लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईरान-इजरायल विवाद आखिर है क्या और क्यों पूरा मिडिल ईस्ट अब इस संघर्ष को झेल रहा है। चलिए समझते हैं विस्तार से…
ईरान-इजरायल विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी की असली शुरुआत 1979 की ईरानी क्रान्ति के बाद हुई। इस क्रांति से पहले ईरान पर मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था और उस समय ईरान तथा इजरायल के रिश्ते सामान्य ही नहीं बल्कि काफी सहयोगी भी थे। दोनों देशों के बीच व्यापार, खुफिया सहयोग और सैन्य संपर्क मौजूद थे।
लेकिन 1979 में क्रांति होने के बाद रुहोल्ला खोमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामिक शासन स्थापित हुआ। नई सरकार ने अपनी विदेश नीति पूरी तरह बदल दी। ईरान ने इजरायल को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया और उसे ‘अवैध राज्य’ बताते हुए अपना प्रमुख दुश्मन घोषित कर दिया।
इसके बाद ईरान ने फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी नीति का अहम हिस्सा बना लिया। इसी कारण उसने हिज़्बुल्लाह और हमास जैसे समूहों को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना शुरू किया जो इजरायल के खिलाफ संघर्ष करते हैं।इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया। यहीं से दोनों देशों के बीच शैडो वॉर शुरू हो गया।
यहीं से दोनों देशों के बीच राजनीतिक, वैचारिक और सैन्य टकराव की शुरुआत हुई जो समय के साथ और ज्यादा गहरा होता चला गया।
शैडो वॉर और प्रॉक्सी युद्ध क्या है?
पिछले 20 सालों में दोनों देशों ने सीधे युद्ध की बजाय कई अप्रत्यक्ष तरीके अपनाए। इनमें साइबर हमले, वैज्ञानिकों की हत्या, सीरिया और लेबनान में प्रॉक्सी मिलिशिया के जरिए हमले शामिल हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान इजरायल कई बार सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर एयरस्ट्राइक करता रहा है।
हाल के हमलों से क्यों बढ़ा मिडिल ईस्ट संकट?
हाल ही में दोनों देशों के बीच ड्रोन, मिसाइल और हवाई हमलों की घटनाएं तेज हो गईं। इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों और मिसाइल लॉन्च साइट्स को निशाना बनाया। ईरान ने जवाब में क्षेत्र में अमेरिकी और इजरायली हितों को निशाना बनाने की धमकी दी। इन घटनाओं के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में सैन्य अलर्ट बढ़ गया।
बाकी दुनिया और तेल बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
गौर करने वाली बात है कि यह संघर्ष सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर कई देशों पर पड़ रहा है। हिज़्बुल्लाह के चलते लेबनान, ईरान समर्थित मिलिशिया के कारण सीरिया भी इससे प्रभावित है। इसके अलावा कुवैत, कतर भी इस संघर्ष के चलते असर पड़ा है। खाड़ी देशों के इस संघर्ष से प्रभावित होने के चलते तेल आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर खतरा बढ़ा है।
ईरान-इजरायल युद्ध: आगे क्या हो सकता है?
–सीमित सैन्य टकराव
मौजूदा स्थिति को देखें तो ईरान और इजरायल अभी कुछ समय तक एक-दूसरे पर हमले करते रह सकते हैं लेकिन पूरा युद्ध शुरू नहीं होगा। आम तौर पर इस तरह के टकराव में मिसाइल, ड्रोन हमले, साइबर अटैक और सीमित एयरस्ट्राइक शामिल होते हैं। दोनों देश कोशिश करते हैं कि हमला ऐसा हो जिससे मैसेज भी जाए और मामला पूर्ण युद्ध तक भी न पहुंचे।
पिछले कई सालों में दोनों देशों के बीच ऐसा ही ‘शैडो वॉर’ देखने को मिला है। इजरायल ने कई बार सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर हमले किए जबकि ईरान ने अपने सहयोगी समूहों के जरिए जवाब देने की कोशिश की। इस तरह का संघर्ष लंबे समय तक चलता रह सकता है। लेकिन इसमें आमतौर पर बड़े पैमाने पर जमीनी युद्ध नहीं होता।
–क्षेत्रीय युद्ध
अगर यह संघर्ष बढ़ता है और दूसरे देश या मिलिशिया समूह इसमें खुलकर शामिल हो जाते हैं तो स्थिति पूरे मिडिल-ईस्ट के युद्ध में बदल सकती है। उदाहरण के लिए लेबनान में मौजूद हिज़्बुल्लाह ईरान का समर्थक है और वह पहले भी इजरायल के साथ लड़ चुका है। अगर हिज़्बुल्लाह या दूसरे ईरान समर्थित समूह सक्रिय हो जाते हैं तो कई मोर्चों पर लड़ाई शुरू हो सकती है।
इसके अलावा यूनाइटेड स्टेट्स इजरायल का प्रमुख सहयोगी है और उसके सैन्य ठिकाने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद हैं। अगर उन ठिकानों पर हमले होते हैं तो अमेरिका सीधे युद्ध में उतर सकता है। ऐसी स्थिति में तेल आपूर्ति, समुद्री रास्तों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
–कूटनीतिक दबाव
तीसरा रास्ता यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दबाव बनाकर तनाव कम कराने की कोशिश करे। आमतौर पर ऐसे मामलों में यूनाइटेड नेशंस, यूरोपीय देश और क्षेत्रीय शक्तियां बातचीत या मध्यस्थता की पहल करती हैं। इनका लक्ष्य होता है कि दोनों पक्ष सीज़फायर, वार्ता या समझौते के जरिए हालात को नियंत्रित करें।
अतीत में भी कई बार अंतरराष्ट्रीय दबाव से बड़े संघर्ष टले हैं। अगर प्रमुख देश और संगठन सक्रिय भूमिका निभाते हैं तो सैन्य टकराव को सीमित रखा जा सकता है और धीरे-धीरे बातचीत के रास्ते से समाधान तलाशने की कोशिश की जा सकती है।
ईरान-इजरायल संघर्ष सिर्फ दो देशों का विवाद नहीं है बल्कि यह पूरे मध्य-पूर्व की स्थिरता और वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह तनाव बड़े युद्ध में बदलता है या कूटनीति से शांत होता है।
