भारत जैसे देशों में रसोई का बजट कई कारकों पर निर्भर करता है। इनमें एलपीजी की कीमतें, परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव शामिल हैं। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ये बदलाव सीधे जीवन यापन की लागत को प्रभावित करते हैं। भारत में रसोई गैस और खाने-पीने की चीजों की कीमतें मुख्य रूप से बाजार आधारित ढांचे पर चलती हैं जहां सरकार सब्सिडी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी योजनाओं के जरिए कुछ राहत देती है लेकिन अधिकांश उतार-चढ़ाव उपभोक्ता कीमतों में दिखाई देते हैं।

इसके उलट, ईरान का मॉडल एक अलग दिशा में विकसित हुआ है जहां बुनियादी खाद्य पदार्थ- खासतौर पर रोटी पर राज्य का सीधा और व्यापक नियंत्रण है। तेहरान पिछले करीब तीन महीने से वैश्विक मीडिया की सुर्खियों में है और इसकी वजह है अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा तनाव। दुनिया की किसी अन्य राजधानी की तरह ही तेहरान की सुबह भी आमतौर पर किसी भी अन्य एशियाई राजधानी जैसी ही होती है- भीड़, ट्रैफिक और लंबी कतारें। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है वो है-सरकारी बेकरी के बाहर लगी शांत लेकिन अनुशासित लाइनें, जहां लोग अपनी राष्ट्रीय आईडी और बैंक कार्ड के जरिए रियायती दर पर रोटी खरीद रहे होते हैं।

यह कोई साधारण बाजार व्यवस्था नहीं है। ईरान में रोटी सिर्फ भोजन नहीं बल्कि एक राज्य-प्रबंधित रणनीतिक वस्तु है जिसे सरकार ‘स्मार्ट सब्सिडी सिस्टम’ के तहत नियंत्रित करती है।

ईरान में रोटी है एक रणनीतिक वस्तु

ईरान में रोटी (ब्रेड) को केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं माना जाता बल्कि इसे एक रणनीतिक और संवेदनशील वस्तु माना जाता है। इसका कारण यह है कि यह वहां के आम नागरिकों की रोजमर्रा की खपत का एक बड़ा हिस्सा है।

ईरानी सरकार लंबे समय से रोटी पर भारी सब्सिडी देती आई है ताकि यह आम जनता को बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हो सके। यह सब्सिडी मुख्य रूप से आटे पर दी जाती है जिसे सरकारी चैनलों के जरिए बेकरी तक पहुंचाया जाता है।

इस प्रणाली का उद्देश्य बुनियादी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, महंगाई का असर कम करना और सामाजिक स्थिरता बनाए रखना है।

डिजिटल सिस्टम से चल रहा रोटी का सिस्टम

ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपने ब्रेड सब्सिडी सिस्टम को डिजिटल बना दिया है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार ने बेकरी नेटवर्क को बैंकिंग सिस्टम और डिजिटल कार्ड से जोड़ दिया है ताकि रियायती आटे और ब्रेड की बिक्री सीधे रिकॉर्ड हो सके और सब्सिडी के गलत इस्तेमाल को रोका जा सके।

इस सिस्टम में लोग अपने बैंक कार्ड या डिजिटल आईडी का उपयोग करके तय कोटा के अनुसार रोटी खरीदते हैं। इसका उद्देश्य यह है कि सस्ती सरकारी रोटी केवल घरेलू उपभोग के लिए ही उपलब्ध रहे। कुछ मामलों में इसे ‘Nanino system’ जैसे इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट नेटवर्क से जोड़ा गया है जो बेकरी और सरकारी भुगतान को ट्रैक करता है।

डिजिटल ब्रेड सिस्टम की शुरुआत कब हुई?

ईरान में ब्रेड सब्सिडी व्यवस्था दशकों पुरानी है लेकिन डिजिटल बदलाव हाल के वर्षों में तेज हुआ।

पिछले कई दशकों से सरकार आटे पर भारी सब्सिडी देती रही है। 2010 के बाद सब्सिडी सुधार और वितरण नियंत्रण पर चर्चा तेज हुई। 2021–2023 के आसपास डिजिटल ट्रैकिंग और कार्ड-बेस्ड पेमेंट सिस्टम को व्यापक रूप से लागू करने की दिशा में कदम बढ़े। हाल के वर्षों में बेकरी और बैंकिंग/पेमेंट सिस्टम को जोड़ने की प्रक्रिया को और मजबूत किया गया।

इस डिजिटलाइजेशन का उद्देश्य था:
-सब्सिडी का दुरुपयोग रोकना
-वास्तविक उपभोक्ता तक लाभ पहुंचाना
-खपत का डेटा तैयार करना
-वितरण प्रणाली को केंद्रीकृत और नियंत्रित करना

सिस्टम कैसे काम करता है

-ईरान के ब्रेड सब्सिडी सिस्टम को सरल रूप में इस तरह समझा जा सकता है:
-सरकार आटे पर सब्सिडी देती है
-यह आटा सरकारी या निर्धारित चैनल से बेकरी तक पहुंचता है
-बेकरी डिजिटल सिस्टम से जुड़ी होती है
-ग्राहक कार्ड या डिजिटल आईडी से भुगतान करते हैं
-बिक्री और खपत का डेटा रिकॉर्ड होता है

इस मॉडल का उद्देश्य पारदर्शिता और नियंत्रण दोनों है।

‘नानबाई’ कौन होते हैं?

‘नानबाई’ (Nanbai) फारसी और उर्दू/हिंदी में बेकरी चलाने वाले या रोटी बनाने वाले कारीगर को कहा जाता है।

ईरान में नानबाई की भूमिका:
-पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह की बेकरी चलाते हैं
-तंदूर या मशीन आधारित ब्रेड बनाते हैं
-सरकारी सब्सिडी वाले आटे से रोटी तैयार करते हैं
-डिजिटल सिस्टम के जरिए बिक्री रिकॉर्ड करते हैं

कई मामलों में नानबाई सिर्फ कारीगर नहीं बल्कि सरकारी सप्लाई सिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं।

दुनिया की सबसे सस्ती रोटी

सरकारी सब्सिडी की वजह से ईरान में रोटी अब भी दुनिया के कई देशों की तुलना में बेहद सस्ती है। अनुमान के अनुसार, सरकार लागत का बड़ा हिस्सा वहन करती है और लोग केवल एक छोटे हिस्से का भुगतान करते हैं। लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह स्थिर नहीं है।

पिछले वर्षों में ईरान में आटे की कीमतों में उतार-चढ़ाव, साइबर हमलों से भुगतान प्रणाली में रुकावटें और बेकरी भुगतान में देरी जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं जिससे कभी-कभी सप्लाई और वितरण प्रभावित हुआ है।

ईरान में कौन-कौन सी रोटियां मिलती हैं?

ईरान में कई तरह की पारंपरिक रोटियां (Nan / Bread) खाई जाती हैं जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

-ताफ्तून (Taftoon / Taftun)
पतली, नरम रोटी
तंदूर में पकाई जाती है
रोजमर्रा के खाने के साथ सबसे आम

  • लवाश
    बहुत पतली और बड़ी शीट जैसी रोटी
    ईरान और आसपास के क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय
    आसानी से रोल करके खाई जाती है

-संगक (Sangak)
पत्थरों पर पकाई जाने वाली पारंपरिक रोटी
थोड़ी मोटी और देसी स्वाद वाली
इसे ईरान की “elite traditional bread” भी कहा जाता है

-बरबरी (Barbari)
मोटी और लंबी रोटी
ऊपर से तिल या आटे की परत
नाश्ते में बहुत लोकप्रिय

भारत से तुलना

हाल के वैश्विक तनावों और पश्चिम एशिया में संघर्ष की स्थिति के बीच ऊर्जा और अनाज सप्लाई चेन पर असर की चर्चाएं भी हो रही हैं। भारत जैसे देशों में LPG या ईंधन की कीमतें और सप्लाई सिस्टम उपभोक्ता बाजार पर आधारित हैं जबकि ईरान में रोटी जैसे बुनियादी खाद्य पदार्थ पर राज्य का सीधा नियंत्रण है।

भारत का मॉडल मुख्य रूप से मार्केट-ड्रिवन सिस्टम पर आधारित है जहां सरकार कुछ क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती है। लेकिन कीमतों का बड़ा हिस्सा वैश्विक और घरेलू बाजार की स्थिति पर निर्भर करता है।

यही कारण है कि दोनों देशों की स्थिति अलग-अलग दिखाई देती है। एक तरफ बाजार आधारित उतार-चढ़ाव और दूसरी तरफ भारी सब्सिडी आधारित नियंत्रित प्रणाली।

चुनौतियां भी मौजूद

हालांकि ‘सब्सिडी ब्रेड सिस्टम’ पूरी तरह निर्बाध नहीं रही है। पिछले वर्षों में आटे की कीमतों में बदलाव, तकनीकी व्यवधान और भुगतान प्रणाली में रुकावट जैसी समस्याएं सामने आई हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी जिक्र मिलता है कि कभी-कभी बेकरी भुगतान में देरी या वितरण में असंतुलन जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।

महिलाओं की स्वतंत्रता?

ईरान के ‘डिजिटल नानबाई’ और सब्सिडी आधारित ब्रेड सिस्टम को समझते समय अक्सर एक सामाजिक तुलना सामने लाई जाती है- घरेलू रसोई में रोटी बनाने का रोज़मर्रा का काम और उसका सामाजिक बोझ।

भारत जैसे देशों में रोटी या चपाती बनाना आमतौर पर घर के भीतर होने वाला एक नियमित घरेलू श्रम है जिसे ज्यादातर परिवारों में महिलाएं रोज़ाना निभाती हैं। यह काम मौसम, समय या परिस्थितियों से स्वतंत्र होकर लगातार चलता रहता है और इसे घरेलू जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि यह सिर्फ महिलाओं पर बाध्य है लेकिन सामाजिक संरचना में इसका बड़ा हिस्सा महिलाओं के हिस्से आता है।

इसके विपरीत, ईरान में रोटी का एक बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर रोज़ाना नहीं बनकर सरकारी या लाइसेंस प्राप्त बेकरी सिस्टम पर निर्भर करता है। सरकार द्वारा सब्सिडी प्राप्त आटे से बेकरी (नानबाई) रोटी तैयार करते हैं और लोग उसे सीधे खरीदते हैं। इस व्यवस्था के कारण कई परिवारों में दैनिक रूप से घर पर रोटी बनाने की आवश्यकता उतनी अनिवार्य नहीं रहती क्योंकि बुनियादी ब्रेड आसानी से बाजार से उपलब्ध हो जाती है।

ईरान का यह मॉडल घरेलू श्रम के एक हिस्से को ‘कमोडिटी और पब्लिक सिस्टम’ में बदल देता है जिससे घर के भीतर रोज़ाना रोटी बनाने का दबाव कुछ हद तक कम हो जाता है। हालांकि इसे सीधे ‘महिला स्वतंत्रता’ कहना सरल निष्कर्ष होगा क्योंकि महिलाओं की सामाजिक भूमिका केवल रोटी बनाने तक सीमित नहीं है और दोनों देशों में उनकी स्थिति व्यापक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों से तय होती है।

क्या ईरान का मॉडल टिकाऊ है?

विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल रोटी सिस्टम का फायदा यह है कि यह भ्रष्टाचार और सब्सिडी के दुरुपयोग को कम करता है लेकिन इसके साथ कई जोखिम भी जुड़े हैं- जैसे तकनीकी विफलता, भुगतान अटकना और आर्थिक दबाव।

ईरान का ‘डिजिटल नानबाई मॉडल’ इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक देश अपने सबसे बुनियादी भोजन-रोटी को भी टेक्नोलॉजी और राज्य नियंत्रण के जरिए मैनेज करने की कोशिश कर रहा है।

ईरान की यह व्यवस्था ना तो पूरी तरह आदर्श है और ना ही पूरी तरह संकटमुक्त। यह एक ऐसे देश की कहानी है जो आर्थिक दबावों और प्रतिबंधों के बीच अपने नागरिकों को सस्ती रोटी उपलब्ध कराने के लिए डिजिटल और केंद्रीकृत मॉडल अपना रहा है।