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भारत ने साधा चीन पर निशाना, कहा- एक देश ने लगातार एनएसजी सदस्यता में लगाया अड़ंगा

एनएसजी सर्वसम्मति के सिद्धांत पर काम करता है और किसी एक देश का विरोध भी किसी भी देश के प्रयास को विफल कर सकता है।

Author ताशकंद | June 24, 2016 18:28 pm
गुरुवार (23 जून, 2016) को शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन के शिखर सम्मेलन से इतर मुलाकात करते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (PTI Photo)

एनएसजी में भारत की सदस्यता का प्रयास खारिज होने के बाद निराश भारत ने शुक्रवार (24 जून) को कहा कि 48 देशों के समूह में इसके आवेदन पर चर्चा के दौरान एक देश ने लगातार प्रक्रियागत ‘बाधाएं’ उत्पन्न कीं। भारत का इशारा स्पष्ट रूप से चीन के विरोध की तरफ था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा कि एनएसजी में भारत की भागीदारी से परमाणु अप्रसार संधि को और मजबूती मिलती और पूरी दुनिया में परमाणु व्यवसाय ज्यादा सुरक्षित बनता।

सोल में दो दिन की बैठक के अंत में एनएसजी ने एनपीटी को ‘पूरी तरह से और प्रभावी तरीके से’ लागू करने के लिए ‘मजबूत समर्थन’ करने की घोषणा की क्योंकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार के समर्थकों ने भारत को कोई छूट देने से इंकार कर दिया। स्वरूप ने यहां कहा, ‘हम समझते हैं कि एक देश द्वारा लगातार प्रक्रियागत बाधा उत्पन्न करने के बावजूद एनएसजी में भविष्य में भागीदारी को लेकर गुरुवार (23 जून) रात तीन घंटे तक चर्चा हुई।’

उन्होंने कहा, ‘सोल में एनएसजी की बैठक में भारत को तुरंत समूह की सदस्यता देने से इंकार कर दिया गया और कहा गया कि जिन देशों ने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किया है उनकी भागीदारी पर चर्चा जारी रहेगी।’ उन्होंने कहा, ‘काफी संख्या में सदस्य देशों ने भारत की सदस्यता का समर्थन किया है और भारत के आवेदन पर सकारात्मक जवाब दिया। हम उन सबको धन्यवाद देते हैं। हम यह भी मानते हैं कि व्यापक समझ यह बनी कि मामले को आगे ले जाया जाए।’

स्वरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रतिनिधिमंडल में शामिल हैं जो यहां शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने आया हुआ है।
स्वरूप ने कहा, ‘यह सुझाव दिया गया कि एनएसजी में भारत की भागीदारी के लिए इसे एनपीटी में शामिल होने की जरूरत है। एनपीटी पर हमारा रुख स्पष्ट है। लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि सितम्बर 2008 में एनएसजी ने खुद ही इस मुद्दे का समाधान कर दिया था।’ उन्होंने कहा, ‘सितम्बर 2008 के निर्णय का पैराग्राफ एक (ए) कहता है कि भारत पर निर्णय होने से ‘परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि के प्रावधानों और उद्देश्यों को लागू करने की संभावना बढ़ जाएगी।’

उन्होंने कहा, ‘इस प्रकार एनपीटी और एनएसजी के साथ भारत की प्रतिबद्धता में कोई विरोधाभास नहीं है।’ उन्होंने कहा कि भारत की समझ यह है कि अधिकतर देश जल्द निर्णय करना चाहते हैं और कुछ देशों ने एनएसजी में भारत की भागीदारी की प्रक्रिया के बारे में मुद्दे उठाए। एनएसजी की पूर्ण बैठक के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार (23 जून) को चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से यहां शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के इतर मुलाकात की और उनसे एनएसजी में भारत के प्रयास को समर्थन देने की अपील की। एनएसजी सर्वसम्मति के सिद्धांत पर काम करता है और किसी एक देश का विरोध भी किसी भी देश के प्रयास को विफल कर सकता है।

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