ताज़ा खबर
 

‘दो युद्धों के बाद भी बनी रही भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि’

भारत एवं पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि दो युद्धों के बाद भी बची रही और यह आज भी लागू है।

Author संयुक्त राष्ट्र | September 23, 2016 14:49 pm

संयुक्त राष्ट्र के एक उच्च स्तरीय अधिकारी ने जल को केवल संघर्ष ही नहीं बल्कि सहयोग के स्रोत का प्रतिनिधि भी बताते हुए कहा कि भारत एवं पाकिस्तान के बीच 1960 में की गई सिंधु जल संधि ‘दो युद्धों’ के बाद भी बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव जॉन एलीसन ने महासभा के इतर ‘जल: शांति का एक स्रोत’ विषय पर आयोजित उच्च स्तरीय कार्यक्रम में यह बात कही। हालांकि उरी में सैन्य अड्डे पर हुए आतंकवादी हमले के कारण भारत एवं पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के बीच यह संधि अचानक सुर्खियों में आ गई है। एलीसन ने कहा, ‘20वीं सदी की दूसरी छमाही में 200 से अधिक जल संधियों पर सफलतापूर्वक वार्ता की गई है। भारत एवं पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि दो युद्धों के बाद भी बची रही और यह आज भी लागू है।’ एलीसन ने अन्य संधियों का जिक्र करते हुए कहा, ‘अफ्रीका में जल संसाधनों के प्रबंधन में सहयोग का पुराना इतिहास है।’

उल्लेखनीय है कि भारत ने गुरुवार (22 सितंबर) को स्पष्ट किया था कि ऐसी किसी संधि के काम करने के लिए ‘परस्पर विश्वास और सहयोग’ महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से यह बयान उस वक्त आया है जब भारत में ऐसी मांग उठी है कि उरी हमले के बाद पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए इस जल बंटवारा समझौते को खत्म किया जाए। यह पूछे जाने पर कि दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए क्या सरकार सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार करेगी तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा, ‘ऐसी किसी संधि पर काम करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्षों के बीच परस्पर सहयोग और विश्वास होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि संधि की प्रस्तावना में यह कहा गया है कि यह ‘सद्भावना’ पर आधारित है।

एलीसन ने कहा कि वर्ष 2050 तक विश्व की जनसंख्या नौ अरब हो सकती है जो सीमित जल संसाधनों को साझा करेगी। उन्होंने गुरुवार को यहां एक समारोह में कहा, ‘जल संसाधनों पर सहयोग एक आपात चुनौती है जिससे निपटने के लिए बहुत प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। सभी क्षेत्रों में जल को लेकर तनाव बढ़ रहा है।’ एलीसन ने रेखांकित किया कि दुनिया ने ‘कम मात्रा में उपलब्ध इस संसाधान पर बार-बार प्रतिस्पर्धा देखी है जो असंतोष का बड़ा वाहक बनी है और जिसके कारण आंतरिक एवं क्षेत्रीय संघर्ष हुए हैं।’ उन्होंने कहा, हालांकि ये जोखिम वास्तविक हैं लेकिन जल अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जो अवसर मुहैया कराता है, हमें उन्हें भी पहचानना और उनका निर्माण करना चाहिए। ‘जल युद्ध’ बयानबाजी में फंसना गलती होगी। एलीसन ने कहा, ‘जल सहयोग के स्रोत, विकास के स्रोत और आपसी सकारात्मक निर्भरता के स्रोत का भी समान रूप से प्रतिनिधित्व करता है।’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App