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भारत नए जलवायु मसौदे पर संतुष्ट नहीं : जावड़ेकर

भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर देशों के स्वैच्छिक संकल्प सहित उसकी कई चिंताओं को उस नए मसौदे में शामिल नहीं किया गया है जो ‘निर्णायक कदम का शुरुआती बिंदु’ है..

Author पेरिस | December 10, 2015 22:35 pm
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर।

भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर देशों के स्वैच्छिक संकल्प सहित उसकी कई चिंताओं को उस नए मसौदे में शामिल नहीं किया गया है जो ‘निर्णायक कदम का शुरुआती बिंदु’ है। वार्ताकारों ने पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के खतरे से निपटने के लिए एक समझौते पर अथक कार्य किया है। भारत ने यह भी कहा कि ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर देने के लक्ष्य के लिए विकसित देशों को अपने उत्सर्जनों में भारी कटौती करनी होगी और विकासशील देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद ‘बढ़ानी’ होगी।

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा ‘मुझे इस बात पर जोर देना होगा कि अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (आईएनडीसी) एक बड़ी नई खोज है और यह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाने वाली साबित हुई है। इसने 186 से अधिक देशों की भागीदारी को समर्थ बनाया है। इसके बावजूद आईएनडीसी का मसौदे में जिक्र नहीं किया गया।’

जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक समझौते की समय सीमा से दो दिन पहले, कल नौ दिसंबर को वार्ताकारों ने नया और छोटा मसौदा जारी किया जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण प्रगतियों और मतभेदों को शामिल किया गया है। ‘पेरिस आउटकम’ का पहला मसौदा दो दिवसीय मंत्रीस्तरीय गहन विमर्श के बाद तैयार किया गया है। इसे फ्रांस के विदेश मंत्री लॉरेंत फैबियस ने जारी किया। इस मसौदे पर अब 196 देशों द्वारा विचार किया जाएगा जिसके बाद ही अंतिम फैसले पर पहुंचेंगे।

नए मसौदा का पाठ 48 पृष्ठों वाले पूर्ववर्ती संस्करण के मुकाबले बहुत छोटा, महज 29 पृष्ठों, का है जिसे वार्ता में शामिल सभी देशों को वितरित किया गया। भारत ने मजबूती से अपनी बात रखी कि ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को ‘कम करके’ या प्रदूषकों और पीड़ितों को समान स्तर पर लाकर पेरिस में कोई स्थायी समझौता तैयार ‘नहीं किया जा सकता।’

साथ ही भारत ने वित्त संबंधी मुद्दे को ‘निराशाजनक’ बताया और कहा कि विकसित देश अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने में असफल रहे हैं और साथ ही वे अपनी जिम्मेदारी को विकसित देशों पर ‘हस्तांतरित’ करना चाहते हैं। जावड़ेकर ने एक संवाद सत्र के दौरान कहा, ‘वित्त की बात करें, तो यह बेहद निराशाजनक है कि एक ओर तो विकसित देश अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं कर रहे और दूसरी ओर, वे अपनी जिम्मेदारी विकासशील देशों पर हस्तांतरित करने की कोशिश कर रहे है। वित्तीय मदद बढाने का कोई संकेत नहीं दिया गया है और न ही कोई स्पष्ट रोडमैप बनाया गया है।’’

भारत ने प्रेजीडेंसी के नेतृत्व एवं प्रयासों की भी सराहना की और इस बात पर जोर दिया कि वह जी-77 की ओर से दिए गए बयान से खुद को जोड़ता है। जावड़ेकर ने ताजा मसौदे को केवल ‘निर्णायक कदम का शुरुआती बिंदु’ बताते हुए कहा कि वार्ता के इस चरण में कई ‘अलग-अलग रुख’ हैं और किसी एक आम सहमति पर पहुंचने के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है।

जावड़ेकर ने कहा, ‘समझौते में पहले इस बात की फिर से पुष्टि किए जाने की आवश्यकता है कि यह संधि (यूएनएफसीसीसी) के तहत है और सिद्धांतों के अनुरूप है। इसका लक्ष्य संधि के क्रियान्वयन को इसके सभी स्तंभों तक विस्तारित करना है।’

उन्होंने कहा, ‘यह अहम है। संधि के सिद्धांतों को अनावश्यक बातें जोड़े बिना सही तरीके से रखा। भारत ने यह भी कहा कि समझौते को इसके सभी तत्वों के बीच भिन्नता को ‘सार्थक’ तरीके से लागू करना चाहिए जो मौजूदा मसौदे में स्पष्ट नहीं है।

भारत ने मजबूती से कहा कि मसौदे में एकपक्षीय कदम, स्थायी जीवनशैली और जलवायु न्याय समेत उसकी कई चिंताओं का जिक्र नहीं किया गया। जावड़ेकर ने कहा, ‘हम मसौदे को गौर से देखेंगे और किसी समझौते पर पहुंचने के लिए हमारे साझीदारों के साथ मिल कर काम करेंगे।’

उन्होंने कहा कि भारत ग्लोबल वॉर्मिंग को पूर्व औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री सेल्सियस के बीच सीमित करने की मांग के प्रति संवेदनशील है। जावड़ेकर ने कहा, ‘दीर्घकालिक तापमान लक्ष्य की दिशा में हम जलवायु से जुड़ी उच्चतर महत्वाकांक्षा से जुड़ी मांगों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। मैं 1.5 डिग्री के जिक्र की मांग को पूरी तरह समझता हूं क्योंकि भारत में हमारे पास भी 1300 से ज्यादा द्वीप हैं।’

उन्होंने कहा ‘हालांकि, 1.5 डिग्री के लक्ष्य के लिए विकसित देशों को अपने उत्सर्जनों में भारी कटौती करनी होगी और विकासशील देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद ‘बढ़ानी’ होगी। ऐसा हो नहीं रहा है।’ ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर देने का जिक्र समझौते के मसौदे में किया गया है, जिसे कल जारी किया गया था।

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