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यूरोप में मस्जिदों से अजान पर हंगामा

यूरोप में मुसलमानों की बढ़ती संख्या से ना सिर्फ यहां का समाज, बल्कि सियासत भी तब्दील हो रही है। मुसलमानों और आप्रवासियों का विरोध करने वाली दक्षिणपंथी पार्टियों की लोकप्रियता बढ़ रही है।

Muslims in Europe, Muslims, Europe, Muslims In world, Muslims numbers, Muslims in politics, Muslims effects, Muslims in usa, Muslims and politics, Society, Society in europe, article on muslims, International newsइस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

यूरोप में 2015 के शरणार्थी संकट के बाद मुसलमानों की संख्या अचानक बढ़ गई है। दस लाख से ज्यादा मुसलमान अचानक जर्मन समाज का हिस्सा बन गए। पहनावे और रहन-सहन के साथ-साथ मस्जिदों से अजान दिए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। मुसलमानों के लिए जहां मस्जिद से आने वाली अजान की आवाज रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा है, वहीं यूरोप में रहने वाले बहुत से लोग उसे सिर्फ लाउडस्पीकर से होने वाला शोर समझते हैं जिससे उनकी नींद, आराम और सुकून में खलल पड़ती है। कई और यूरोपीय देश भी पिछले दिनों स्वीडन के एक शहर में अपने समाज में आने वाले ऐसे बदलाव और टकराव से गुजर रहे हैं। वेक्सयो में स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद पुलिस ने एक मस्जिद को जुमे की नमाज के लिए अजान लगाने की अनुमति दे दी। आम चुनाव से ठीक पांच महीने पहले वहां यह फैसला राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।

कई राजनेता पुलिस के फैसले पर सवाल उठाते हुए कह रहे हैं कि इससे समाज में सांस्कृतिक तनाव बढ़ेगा। हालांकि मस्जिद के इमाम का कहना है कि अजान को ठीक वैसे ही समझा जाना चाहिए जैसे चर्च की घंटियां। लेकिन स्वीडन में हुए एक सर्वे में 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि मस्जिदों से होने वाली अजान पर बैन लगना चाहिए। वेक्सयो में पुलिस ने हफ्ते में सिर्फ एक दिन और वह भी तीन मिनट 45 सेकंड के लिए अजान लगाने की अनुमति दी है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि आसपास रहने वाले लोग अपने घरों में इतनी देर भी क्यों अजान सुनें। वेक्सयो की मस्जिद स्वीडन की तीसरी ऐसी मस्जिद है जिसे अजान की अनुमति मिली है।

इससे पहले, पश्चिमी जर्मनी में ओएर एरकेंशविक शहर में एक ईसाई दंपत्ति स्थानीय मस्जिद से होने वाली साप्ताहिक अजान को रुकवाने में कामयाब रहा। मस्जिद से छह सौ मीटर की दूरी पर रहने वाले इस दंपत्ति ने अदालत में दलील दी कि अजान की आवाज से उनके धार्मिक अधिकारों का हनन होता है। उन्होंने कहा, “अजान से होने वाले शोर से ज्यादा हम इस बात को लेकर चिंतित है कि इसमें अल्लाह को हमारे ईसाइयों के ईश्वर से ऊपर रखा गया है। यहां ईसाई माहौल में पले बढ़े किसी भी ईसाई के लिए यह स्वीकार्य नहीं होगा।” अदालत ने धार्मिक मुद्दे पर तो कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन मस्जिद से अजान की अनुमति देने की प्रक्रिया में खामियों का हवाला देते हुए इस पर रोक लगा दी।

नॉर्वे में भी ऐसी ही रोक की मांग उठ रही है। सत्ताधारी गठबंधन में शामिल प्रोग्रेस पार्टी इस मांग को उठा रही है। नॉर्वे में अभी कोई भी मस्जिद अजान नहीं देती है। लेकिन प्रोग्रेसिव पार्टी का दावा है कि स्वीडन की देखा-देखी कुछ मस्जिदें इसके लिए अनुमति लेने की तैयारी कर रही हैं। आप्रवासियों का विरोध करने वाली प्रोग्रेस पार्टी ने 2000 में भी अजान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव दिया था। लेकिन देश के न्याय मंत्रालय ने उसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस तरह का कोई भी प्रतिबंध यूरोपीय मानवाधिकार कन्वेंशन का उल्लंघन होगा, जो विचारों, चेतना और धर्म की आजादी का अधिकार देता है।

यूरोप दुनिया भर में अपने मानवीय मूल्यों और मानवाधिकारों के लिए जाना जाता है। ऐसे में, यूरोप में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने धार्मिक रीति रिवाजों पर चलने से नहीं रोका जा सकता। लेकिन अगर यूरोप में रहने वाला कोई व्यक्ति किसी महिला से यह कहते हुए हाथ मिलाने से इनकार कर दे कि उसके धर्म में गैर औरतों को छूने की मनाही है तो आप कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद करेंगे। या फिर स्कूल में कोई व्यक्ति अपनी छोटी छोटी बेटियों को इसलिए तैराकी सीखने ना भेजे कि उन्हें वहां अपनी क्लास के लड़कों के साथ तैरना होगा। दोनों ही मामले स्विट्जरलैंड के हैं और दोनों में ही आखिरी फैसला स्थानीय नियम कायदों के मुताबिक किया गया। यानी पहले मामले में दो मुस्लिम छात्रों को अपनी टीचर से हाथ मिलाने का आदेश दिया गया तो दूसरे फैसले में लड़कियों को लड़कों से साथ ही तैराकी सीखने को कहा गया।

जाहिर है नए लाइफस्टाइल को एकदम से अपना लेना ना तो यूरोप में आ रहे मुसलमानों के लिए आसान है और ना यूरोपीय लोग उनके तौर तरीकों को रातों रात स्वीकार कर लेंगे। किसी भी समाज में अचानक होने वाले बदलाव सहज नहीं होते। कई बार ऐसे बदलाव टकराव में भी तब्दील होने लगते हैं। यूरोप में बुर्के, अजान या फिर मस्जिद बनाने को लेकर होने वाले विवाद इसी टकराव का हिस्सा हैं। अमेरिकी थिंकटैंक पियु रिसर्च सेंटर का अनुमान है कि 2050 तक यूरोप की आबादी में 7.5 फीसदी मुसलमान होंगे। इस समय यूरोप में सबसे ज्यादा मुसलमान फ्रांस में रहते हैं जहां उनकी आबादी 57.2 लाख है। इसके बाद जर्मनी (49.5 लाख), ब्रिटेन (41.3 लाख), इटली (28.7 लाख) और नीदरलैंड्स (12.1 लाख) यूरोप में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देशों में गिने जाते हैं।

यूरोप में मुसलमानों की बढ़ती संख्या से ना सिर्फ यहां का समाज, बल्कि सियासत भी तब्दील हो रही है। मुसलमानों और आप्रवासियों का विरोध करने वाली दक्षिणपंथी पार्टियों की लोकप्रियता बढ़ रही है। सीरिया, अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों में लगातार खिंचते चले जा रहे संकट लगातार लोगों को यूरोप की तरफ धकेल रहे हैं। बड़े पैमाने पर हो रहे आप्रवासन को रोकने के लिए संकटग्रस्त देशों में चल रहे संकटों को सुलझाने पर ध्यान देना होगा। और जो लोग अपना देश छोड़ कर यूरोप में आ चुके हैं, उन्हें नई जगह के नए कायदे सीखने होंगे। तभी वे यहां के समाज का हिस्सा बन पाएंगे। धीरे-धीरे यूरोपीय लोगों को भी उनके तौर तरीकों की आदत हो जाएगी। सरकारें इस समय एकीकरण की इसी प्रक्रिया पर जोर दे रही हैं। लेकिन इसमें समय लगेगा। तब तक यूरोप में इस्लाम को लेकर चल रही बहस अलग-अलग मुद्दों के साथ दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचती रहेगी।

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