पुतिन-बाइडेन वार्ता एशियाई देश कितने प्रभावित

जेनेवा में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत को लेकर एशियाई देशों में काफी उम्मीदें जताई जा रही हैं। रूस-अमेरिकी तनाव में कमी भूराजनैतिक बदलाव से गुजर रहे एशिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुतिन-बाइडेन वार्ता। फाइल फोटो।

जेनेवा में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत को लेकर एशियाई देशों में काफी उम्मीदें जताई जा रही हैं। रूस-अमेरिकी तनाव में कमी भूराजनैतिक बदलाव से गुजर रहे एशिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।

दोनों महाशक्तियों के शीर्ष नेताओं के बीच 2018 के बाद पहली मुलाकात हुई। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 2018 में हेलसिंकी में ऐसी ही मुलाकात हुई थी। उसके बाद अब बाइडेन-पुतिन शिखर वार्ता हुई। इस वार्ता में जिन महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई, वे वैश्विक राजनीति पर तो असर डालते ही हैं, कुछ मुद्दों का एशिया पर खास असर होने की संभावना है। विशेषकर उन मसलों पर जहां चीन की बड़ी भूमिका रही है। चीन, ईरान और पश्चिम एशिया, उत्तर कोरिया, और तमाम रणनीतिक महत्त्व वाले देशों पर इन दोनों देशों का व्यापक असर देखने को मिलता है।

ताजा वार्ता में परमाणु हथियारों के नियंत्रण के मसले पर भी दोनों देशों के बीच सैद्धांतिक तौर पर आम सहमति बनी दिखती है। रूस को लेकर एशिया के कई देशों को सैन्य सहयोग करने की बात उठती है। इनमें सीरिया, ईरान, उत्तर कोरिया, और म्यांमार जैसे देश शामिल हैं। सीधे तौर पर फिलहाल रूस इन देशों के साथ संबंधों में कोई कमी नहीं लाने जा रहा और इस लिहाज से मुलाकात का कोई सीधा असर एशिया की हथियार मंडी पर नहीं होगा। लेकिन बाइडेन की बात का इतना असर तो होगा कि रूस अमेरिका के ठिकानों पर कोई साइबर हमला नहीं करेगा। बाइडेन-पुतिन की मुलाकात में दोनों देशों के बीच रोड़ा बने कई मुद्दों पर ठोस बातचीत नहीं हुई। साइबर सुरक्षा, यूक्रेन, जॉर्जिया, और नगोर्नो -काराबाख इलाके में रूसी दखलंदाजी पर भी कुछ खास बात नहीं सामने आई। मुलाकात से पहले और उसके बाद के जो बाइडेन के वक्तव्यों में चीन का जिक्र दिलचस्प था।

एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के तमाम देश, चाहे जापान हो या इंडोनेशिया, आॅस्ट्रेलिया, भारत या फिर वियतनाम, सभी चीन की आक्रामक नीतियों और बढ़ती दादागीरी से परेशान हैं। ऐसे में बाइडेन की एक कूटनीतिक संयुक्त मोर्चा खोलने की कवायद का सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर समर्थन कर रहे हैं। पश्चिम के देशों से बरसों से मुंह मोड़ कर बैठे और तमाम प्रतिबंधों की मार झेल रहे रूस के लिए यह अच्छा अवसर है कि वह पश्चिम के देशों का साथ दे। वैसे तो रूस चीन का साथ देने की बात करता रहा है, लेकिन पश्चिम के साथ नई सौदों की उम्मीद में रूस कुछ मुद्दों पर सहयोग कर भी सकता है। शिखर वार्ता के बाद रूस के बारे में दिया बाइडेन का बयान ऐसी कई संभावनाओं की ओर इशारा करता है। रूस मध्य एशिया और कॉकेशस में चीन की बढ़ती दखलंदाजी पसंद नहीं करता और इन बातों से परेशान भी है।

चीन की बढ़ती आर्थिक, सामरिक और सैन्य ताकत ने उसे अत्याधुनिक पश्चिमी देशों की कतार में ला खड़ा किया है। रूस इनमें से कई मामलों में चीन से पिछड़ता दिख रहा है। दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां पहले रूस का वर्चस्व था और आज उसकी जगह चीन ने ले ली है। दक्षिण एशिया में भारत जैसा मजबूत सहयोगी होने के बावजूद वह अमेरिका के मुकाबले पिछड़ता जा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग पर भी आंच आ रही है।

संयुक्त मोर्चा की कोशिश

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन को यह उम्मीद है कि रूस चीन के मुद्दे पर अमेरिका का साथ दे सकता है। नाटो और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ मुलाकात हो या जी-7 का शिखर सम्मेलन, बाइडेन लगातार चीन को लेकर एक संयुक्त मोर्चा बनाने की फिराक में है। इस नई कूटनीतिक चाल के दूरगामी परिणाम माने जा रहे हैं, भले ही एक झटके में बाइडेन को इसमें कामयाबी न मिले।

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