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भारत-अमेरिकी संबंध : अहम मुद्दों पर कितनी मजबूती

अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड आॅस्टिन की भारत यात्रा को नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की विदेश नीति के तहत भारत-अमेरिकी रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

नीचे (बाएं ) हर्ष वी पंत, निदेशक, आॅब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, संजय के भारद्वाज, प्रोफेसर, सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज, जेएनयू । फाइल फोटो।

अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड आॅस्टिन की भारत यात्रा को नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की विदेश नीति के तहत भारत-अमेरिकी रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। क्वाड समूह के देशों की डिजिटल बैठक में बाइडेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत की थी।

इसके बाद दो दिनों की यात्रा में आॅस्टिन ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तरीय वार्ता में कई अहम मुद्दों, रक्षा सौदों और रणनीतिक समझ को अंतिम रूप दिया। बहुचर्चित हिंद-प्रशांत क्षेत्र की नीति और अफगानिस्तान के हालात को लेकर चर्चा हुई। हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर बातचीत चीन की बढ़ती शक्ति के सामने संतुलन बनाने की रणनीति बताई जा रही है। अफगानिस्तान में शांति वार्ता भारत के लिए अहम है। अमेरिका अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल लेने के लिए अफगान सरकार और तालिबान के बीच समझौता कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन देश में हिंसा का चक्र थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। अगर वहां अस्थिरता और गहराती है तो उसका भारत पर भी सीधा असर पड़ेगा।

अमेरिकी सीनेट की समिति का पेच

आॅस्टिन की यात्रा शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट की शक्तिशाली विदेशी रिश्ते समिति के अध्यक्ष बॉब मेनेंडेज ने उन्हें एक पत्र लिख कर दो प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया। उन्होंने लिखा कि भारत अगर रूस से एस-400 मिसाइल खरीदने की अपनी योजना पर आगे बढ़ता है तो यह अमेरिका के हितों के खिलाफ होगा। मेनेंडेज का यहां तक मानना है कि अगर यह समझौता पूरा हो जाता है तो यह अमेरिका को भारत के खिलाफ प्रतिबंध लागू करने पड़ेंगे।

इसके अलावा मेनेंडेज ने आॅस्टिन से यह भी कहा कि उन्हें भारत सरकार के साथ चर्चा में लोकतंत्र और मानवाधिकारों को लेकर चिंताओं को भी उठाना चाहिए। उन्होंने लिखा कि भारत और अमेरिका की साझेदारी सबसे मजबूत तब ही होती है जब दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास दिखाएं और भारत सरकार उन मूल्यों से दूर जाती दिख रही है। मेनेंडेज ने इस संबंध में किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून जैसे कई मुद्दों का उदाहरण दिया। कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटाना, राजनेताओं को गिरफ्तार किया जाना और राजद्रोह के कानून से का इस्तेमाल जैसे मुद्दे भी उन्होंने उठाए।

द्विपक्षीय रक्षा और सुरक्षा के संबंध

आॅस्टिन की प्रथम विदेश यात्रा के दौरान तीन देशों के दौरे में भारत तीसरा पड़ाव स्थल था। उनकी इस यात्रा को बाइडेन प्रशासन के अपने करीबी सहयोगियों और क्षेत्र में साझेदारों के साथ मजबूत प्रतिबद्धता के तौर पर देखा जा रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता से अमेरिका भी चिंतित है। साथ ही, पूर्वी लद्दाख में चीन के रवैए को लेकर भी अमेरिका कई बार भारत के पक्ष में बोल चुका है। अमेरिका से प्रीडेटर ड्रोन खरीद और लड़ाकू विमानों के सौदे पर भी बात हुई है।

रक्षा मंत्रियों की प्रतिनिधिमंडल स्तरीय वार्ता में तीन अरब डॉलर से अधिक (अनुमानित) की लागत से अमेरिका से करीब 30 मल्टी-मिशन सशस्त्र प्रीडेटर ड्रोन खरीदने की भारत की योजना पर चर्चा हुई। ये ड्रोन सेना के तीनों अंगों (थल सेना, वायु सेना और नौ सेना) के लिए खरीदने की योजना है। मध्य ऊंचाई पर लंबी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम इस ड्रोन का निर्माण अमेरिकी रक्षा कंपनी जनरल एटोमिक्स करती है। यह ड्रोन करीब 35 घंटे तक हवा में रहने में सक्षम है और जमीन व समुद्र में अपने लक्ष्य को भेद सकता है। करीब 18 अरब डॉलर की लागत से 114 लड़ाकू विमान खरीदने की भारत की योजना पर भी वार्ता हुई है।

एस-400 मिसाइल सौदे पर रुख

भारत इसे रूस से खरीद रहा है और इसके लिए अक्तूबर 2018 में रूस के साथ पांच अरब डॉलर का एक सौदा किया था। भारत ने तत्कालीन ट्रंप प्रशासन की चेतावनी की अनदेखी करते हुए इस सौदे को आगे बढ़ाया था। तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने चेतावनी दी थी कि इस पर आगे बढ़ने पर उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका ने एस-400 मिसाइल रूस से खरीदने को लेकर हाल ही में तुर्की पर प्रतिबंध लगाए थे।

सीनेट की शक्तिशाली विदेशी रिश्ते समिति के अध्यक्ष बॉब मेनेंडेज का इस सौदे को लेकर दबाव है। आॅस्टिन और राजनाथ सिंह की बैठक में यह मुद्दा उठा है, लेकिन भारतीय प्रतिनिधिमंडल को इस मुद्दे पर अमेरिका का ठोस आश्वासन नहीं मिल सका है। यह तय है कि आर्थिक संबंधों एवं समीकरणों के कारण भारत के साथ तुर्की जैसा व्यवहार अमेरिका नहीं करेगा, लेकिन दबाव तो बन ही रहा है।

क्या कहते
हैं जानकार

रूस, अमेरिका और भारत तीनों की विदेश नीतियां और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। रूस अब वो रूस नहीं है जो शीत युद्ध के दौरान हुआ करता था। पश्चिमी देशों का दबाव महसूस होने पर रूस ने पश्चिम विरोधी नीति अपनाई जिसमें उसे चीन सहयोगी नजर आता है।
हर्ष वी पंत, निदेशक,
आॅब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन

भारत के रूस और अमेरिका से संबंधों में चीन एक बड़ा फैक्टर बना हुआ है। ये भी ठीक नहीं कि अमेरिका से सहयोग के चलते रूस भारत का विरोधी और चीन का सहयोगी हो जाए। ना ही ये ठीक है कि भारत चीन का सामना करने में अमेरिकी सहयोग को नकार है।
– संजय के भारद्वाज, प्रोफेसर, सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज, जेएनयू

नए समीकरण में रूस से संबंध

बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों और प्राथमिकताओं के बीच भारत के लिए नए और पुराने दोस्तों में संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया है। चीन से मिल रही चुनौती, व्यापार और अन्य मुद्दे भारत को अमेरिका के करीब ला रहे हैं तो रूस को भारत की पश्चिमी देशों से ये करीबी रास नहीं आ रही है। भारत के ये नए और पुराने दोस्त यानी अमेरिका और रूस एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं। भारत जिस क्वाड समूह का सदस्य है, उसे लेकर रूस अपनी असहजता पहले ही जाहिर कर चुका है।

उसने अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरे की आशंका भी जाहिर की है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि रूस और भारत के बीच 20 सालों से होने वाला वार्षिक सम्मेलन पिछले साल नहीं हुआ, जिसके पीछे क्वाड को भी एक वजह माना जा रहा था। हाल में रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि पश्चिमी देश भारत के साथ उसके करीबी रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे है।

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