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हंगरी में ओरबान की ‘जीत पक्की’ फिर भी चुनाव दिलचस्प

ओरबान की जीत के पीछे वामपंथी और उदारवादी दलों का विखराव रहा है। विपक्ष के वोट बंटने की वजह से सत्ताधारी पार्टी को अप्रत्याशित जीत मिलती रही है।

Author April 8, 2018 9:13 PM
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान। फोटो सोर्स: AP

हंगरी में संसदीय चुनावों से दो दिन पहले प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान को अपने पक्के साथी पोलैंड की मदद मिली है। पोलैंड की सत्ताधारी पार्टी के प्रमुख यारोस्लाव काचिंस्की ने ओरबान और उनकी पार्टी को फिर से चुनने की अपील की है। मौका था राजधानी बुडापेस्ट में 2010 में रूस के स्मोलेंस्क में विमान दुर्घटना में मारे गए 96 लोगों के स्मारक का उद्घाटन। इस दुर्घटना में काचिंस्की के भाई और तत्कालीन राष्ट्रपति लेख काचिंस्की की भी मौत हो गई थी। यारोस्लाव काचिंस्की ने ओरबान को राष्ट्रों के सम्मान और आजादी का प्रतीक बताया और कहा कि रविवार को आप आजादी के बारे में फैसला करेंगे। उनका इशारा आप्रवासियों और लोकतांत्रिक सुधारों पर यूरोपीय संघ के साथ चल रहे विवाद की ओर था। यूरोपीय संघ के खिलाफ विद्रोह में दोनों देश साथ हैं। और चूंकि ईयू में सारे फैसले एकमत से होते हैं इसलिए जब तक दोनों देश साथ हैं, तो किसी के भी खिलाफ ईयू कोई दंडात्मक कदम नहीं उठा सकता।

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काचिंस्की ने भले ही ओरबान को चुनावी मदद देने की कोशिश की हो, लेकिन उन्हें इसकी बहुत जरूरत नहीं लगती। उन्होंने आप्रवासी विरोधी नारे के साथ चुनाव अभियान चलाया है। अभियान में उन्होंने खुद को मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ ईसाई मूल्यों और संस्कृति के रक्षक के तौर पर पेश किया जिसके बाद वे चुनाव सर्वेक्षणों में दूसरी पार्टियों से आगे चल रहे हैं और रविवार को होने वाले चुनावों में लगातार तीसरी बार उनकी जीत निश्चित लग रही है। उनकी अति दक्षिणपंथी फिदेश पार्टी की जीत साम्यवाद के पतन के बाद सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता के रूप में उनकी स्थिति तो मजबूत करेगी ही, साथ ही इससे पोलैंड और यूरोप के दूसरे राष्ट्रवादियों को भी ताकत मिलेगी।

ओरबान शुरू से ही यूरोपीय संघ की शरणार्थी नीति का विरोध करते रहे हैं और उन्होंने पोलैंड की ही तरह ग्रीस के रास्ते आए लाखों शरणार्थियों में से अपने हिस्से के आप्रवासियों लेने से मना कर दिया है। इन चुनावों में जीत से यूरोप में आप्रवासी नीतियों के खिलाफ गठबंधन मजबूत होगा और साथ ही यूरोपीय एकीकरण की प्रक्रिया को भी धक्का लगेगा जिसका वे पुरजोर विरोध कर रहे हैं और सदस्य देशों के लिए फैसले लेने की आजादी की मांग कर रहे हैं। ओरबान की जीत यूरोपीय संघ के अंदर दरार को और गहरा कर सकती है।

हालांकि लंबे समय से ओरबान आप्रवासियों का डर दिखाकर लोगों को अपने पक्ष में रखने में कामयाब रहे हैं। इसमें इस बात से भी मदद मिली है कि पिछले समय में उन्होंने मीडिया को नियंत्रण में कर लिया है और देश को अनुदारवादी लोकतंत्र में बदल दिया है। देश पूरी तरह उनके नियंत्रण में है। लेकिन चुनाव के आखिरी दिनों में विपक्ष उनता भी कमजोर नहीं लग रहा जितना शुरू के दिनों में था। सोशलिस्ट पार्टी के गेररेली कारासोनी विरोध की आवाज बनकर उभरे हैं। वे आप्रवासी मुद्दे के बदले अधिक वेतन, अधिक पेंशन और बेहतर शिक्षा और चिकित्सा सेवा का वादा कर रहे हैं। हालांकि वे एक छोटी ग्रीन पार्टी के नेता हैं और बुडापेस्ट के एक जिले के मेयर हैं लेकिन सोशलिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन के बाद ओरबान के खिलाफ चुनाव में एक लोकतांत्रिक गठबंधन बन गया है।

ओरबान की जीत के पीछे वामपंथी और उदारवादी दलों का विखराव रहा है। विपक्ष के वोट बंटने की वजह से सत्ताधारी पार्टी को अप्रत्याशित जीत मिलती रही है। ओरबान को सही मायने में चुनौती तभी मिल सकती है जब वामपंथी गठबंधन को दक्षिणपंथी जॉबिन पार्टी का भी समर्थन मिले, जिसे 20 प्रतिशत तक मत मिलने की बात कही जा रही है। हालांकि औपचारिक रूप से दोनों ही पक्ष किसी तरह के समझौते का विरोध कर रहे हैं लेकिन होदमेजोवासरहेली शहर में मेयर के चुनाव में ओरबान की पार्टी पर विपक्ष की जीत के बाद ऐसे समझौते के लिए दबाव बढ़ गया है।

हंगरी में संसद की 199 सीटें हैं जिनमें से 106 सीटों पर भारत की तरह चुनाव क्षेत्रों में सीधे बहुमत से फैसला होता है जबकि 93 सीटों पर सामानुपातिक पद्धति से फैसला होता है। 2014 के चुनावों में सिर्फ 43 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद फिदेश पार्टी 106 में से 96 सीटें जीतने में कामयाब रही। अगर इस बार विपक्ष वोटों के बंटवारे को रोक पाता है तो ओरबान की जीत उतनी आसान नहीं रहेगी। हालांकि कोई भी राजनीतिक पर्यवेक्षक ऐसा नहीं है जो ओरबान या फिदेश पार्टी की हार पर दाव लगाने को तैयार हो।

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