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सिंधु जल समझौता तोड़ा तो समझेंगे भारत ने युद्ध छेड़ दिया: पाकिस्तान

सरताज अजीज ने कहा कि समझौते को एकतरफा तौर पर रद्द करना पाकिस्तान और इसकी अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी होगी।

Author इस्लामाबाद | September 27, 2016 6:58 PM
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश मामलों पर सलाहकार सरताज अजीज। (एपी फाइल फोटो)

पाकिस्तान के शीर्ष राजनयिक सरताज अजीज ने मंगलवार (27 सितंबर) को कहा कि यदि भारत 56 साल पुराने सिंधु जल समझौते को निलंबित करता है तो उनका मुल्क संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख करेगा। साथ ही, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस समझौते को रद्द करने को ‘युद्ध छेड़ने की गतिविधि’ के तौर पर लिया जा सकता है। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार अजीज ने इस मुद्दे पर नेशनल एसेंबली में कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय कानून बताते हैं कि भारत एकतरफा तरीके से इस समझौते से खुद को अलग नहीं कर सकता।’ उन्होंने कहा, ‘समझौता रद्द करने की कार्रवाई को दोनों देशों के बीच युद्ध की कार्रवाई के तौर पर लिया जा सकता है।’

उन्होंने कहा कि समझौते को एकतरफा तौर पर रद्द करना पाकिस्तान और इसकी अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी होगी। उन्होंने कहा कि यदि भारत समझौते का उल्लंघन करेगा तो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख कर सकता है। अजीज ने कहा, ‘‘इस भारतीय कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय शांति के उल्लंघन के तौर पर लिया जा सकता है और इस तरह पाकिस्तान एक अच्छी वजह को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रूख कर सकता है।’ उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने पर विचार कर रहा है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 56 साल पुराने सिंधु जल समझौते की एक समीक्षा बैठक की सोमवार (26 सितंबर) को अध्यक्षता की थी जिस दौरान यह फैसला किया गया कि भारत झेलम सहित पाकिस्तान नियंत्रित नदियों के जल का बंटवारा समझौते के मुताबिक ‘अधिकतम दोहन’ करेगा। उरी हमले में 18 सैनिकों के शहीद होने के बाद पाकिस्तान पर पलटवार करने के भारत के पास विकल्पों की तलाश करने के मद्देनजर यह बैठक हुई। हमले के बाद यह मांग की जाने लगी कि सरकार पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए जल बंटवारा समझौता को रद्द कर दे।

समझौते के तहत व्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चेनाब और झेलम…छह नदियों के पानी का दोनों देशों में बंटवारा होना था। इस संधि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सितंबर 1960 में हस्ताक्षर किये थे। पाकिस्तान पर्याप्त पानी नहीं मिलने की शिकायत करता रहा है और कुछ मामलों में अंतरराष्ट्रीय पंचाट के पास गया है। एक पूर्व संघीय कानून मंत्री, प्रेसीडेंट रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ के अध्यक्ष और भारत मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में वकील आमेर बिलाल सूफी ने कहा कि भारत के पास इस समझौता को अपनी तरफ से रद्द करने की कोई कानूनी क्षमता नहीं है क्योंकि समझौते की धारा 12 (4) समझौते को उसी सूरत में रद्द करने की इजाजत देती है जब लिखित में दोनों देश इसके लिए राजी हों।

उन्होंने कहा कि सिंधु जल समझौते में एक मध्यस्थता शर्त है, यदि भारत उस हद तक जाता है तो उसका सहारा लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत खुद से इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता कि पाकिस्तान ने अविश्वास सहित किसी आधार पर समझौते का उल्लंघन किया है। यदि भारत समझौते को रद्द करता है तो इसका अर्थ होगा कि इसने इसे अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि चूंकि समझौते में इसकी अवधि या निलंबन के बारे में कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि पाकिस्तान समझौते को बहाल करने के लिए कदम उठा सके। पाकिस्तान समझौते को लागू करने के लिए विशेष कार्य निष्पादन की मांग करते हुए आईसीजे का रुख नहीं कर सकता है।

आईसीजे विधान के तहत भारत के सुरक्षित अधिकार के चलते वह ऐसा नहीं कर सकता जो भारत के खिलाफ पाकिस्तान को मामला दायर करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि दूसरे शब्दों में, पाकिस्तान के पास कोई शांतिपूर्ण उपाय नहीं बचेगा। सूफी ने कहा कि यदि भारत नदी के ऊपरी हिस्से पर होने के नाते पाकिस्तान की ओर जल प्रवाह को बाधित करने की कोशिश करता है तो यह एक क्षेत्रीय व्यवहार स्थापित करेगा और इससे चीन को भी ब्रह्मपुत्र का पानी रोकने के समर्थन में तर्क मिल जाएगा।

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