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विक्टर ओरबान: यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा सिरदर्द

हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर शरणार्थियों के मुद्दे को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं और यूरोपीय संघ से टकराने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं।

हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान। (Source: AP)

“हम इन लोगों को मुस्लिम शरणार्थियों के तौर पर नहीं देखते। हम इन्हें मुस्लिम आक्रामणकारियों की तरह देखते हैं।” “हम समझते हैं कि बड़ी संख्या में मुसलमानों के आने से समांतर समाज बन जाएंगे क्योंकि ईसाई और मुस्लिम सजा कभी एक नहीं हो सकते।” “सारे आतंकवादी मूल रूप से आप्रवासी हैं।” “बहुसंस्कृतिवाद (मल्टीकल्चरलिज्म) तो एक छलावा है।” “आपको (जर्मनी को) आप्रवासी चाहिए थे, हमें नहीं।” “हमारे लिए आप्रवासन दवा नहीं बल्कि जहर है, हमें इसे निगलने की ना जरूरत है और ना ही हम निगलेंगे।” इन सभी बयानों से नफरत की बू आती लगती है। नफरत मुसलमानों से, आप्रवासियों से और नफरत उन लाखों लोगों से जो अपने देशों में चल रही लड़ाई के कारण जान बचाकर यूरोप पहुंचे हैं। ये सारे बयान एक ही व्यक्ति के मुंह से निकले है। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान, जो यूरोपीय संघ के लिए लगातार बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे हैं। राष्ट्रवाद के रथ पर सवार विक्टर ओरबान अपने देश में लोकप्रियता के शिखर पर हैं। शरणार्थियों के मुद्दे को वह हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं और यूरोपीय संघ से टकराने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं।

इसके साथ ही जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय संघ के अहम देश अकसर उनके निशाने पर रहते हैं। आप्रवासियों और मुसलमानों के खिलाफ विक्टर ओरबान के बयान रह रह कर यूरोपीय प्रेस में गूंजते रहते हैं। अभी तो ओरबान और यूरोपीय संघ के बीच तलवारें एक निर्धारित कोटे के तहत शरणार्थियों को लेने के मुद्दे पर खिंची हैं, लेकिन यह खटपट पुरानी है। हंगरी में 2011 में मीडिया के पर कतरने वाला कानून हो या फिर 2012 में सत्तारूढ़ पार्टी की पकड़ को मजबूत करने वाला नया संविधान, हाल के सालों में हमेशा ओरबान कुछ न कुछ ऐसा कहते और करते रहे हैं जिस पर ब्रसेल्स में बैठे यूरोपीय संघ के नीति निर्माताओं की भवें तनी रहीं। रूस के साथ उनकी नजदीकी भी ब्रसेल्स के लिए चिंता का विषय रही है। यहां तक कि जब रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया को अपने क्षेत्र में मिला लिया तो रूस के खिलाफ यूरोपीय संघ के अत्यधिक कड़े रुख की ओरबान ने आलोचना की थी।

ऐसा लगता है कि जिन उदारवादी लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों पर यूरोपीय संघ की बुनियादें टिकी हैं, ओरबान के लिए वे शायद इतना अहमियत नहीं रखते। बल्कि वह तो समझते हैं कि पश्चिम के लोकतांत्रिक मॉडल से कहीं ज्यादा कारगर रूस, चीन और तुर्की जैसे देशों की निरंकुश व्यवस्थाएं हैं। यूरोपीय संघ आज शरणार्थियों के मुद्दे पर एक विभाजित कुनबा नजर आता है, तो इसकी एक बड़ी वजह विक्टर ओरबान हैं। 28 देशों वाले संघ में वह आप्रवासियों के खिलाफ उठने वाली सबसे मुखर आवाज हैं। पोलैंड, चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया जैसे देश भी अब उनके रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं और शरणार्थी कोटे पर सवाल उठा रहे हैं। 2015 में सीरिया, इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों से लाखों की तादाद में शरणार्थी यूरोप पहुंचे। जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे देशों ने मांग उठाई कि यूरोपीय संघ के सभी देश मिलकर शरणार्थियों का बोझ उठाएं। इसके लिए कोटा व्यवस्था तय की गई।

पिछले दो साल से इस बात पर बहस हो रही है कि यूरोपीय संघ के भीतर शरणार्थियों को कैसे बांटा जाए, लेकिन हंगरी, पोलैंड, चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया ऐसी सभी कोशिशों पर पानी फेर रहे हैं क्योंकि वे कोटा व्यवस्था के खिलाफ हैं। यूरोपीय संघ का विरोध पोलैंड और हंगरी को करीब ला रहा है। पिछले दिनों पोलैंड के प्रधानमंत्री मातेउज मोराविस्की हंगरी के दौरे पर बुडापेस्ट पहुंचे तो उनके बयान से संकेत मिला कि यूरोपीय संघ के भीतर और एक संघ आकार ले रहा है। उन्होंने कहा, “हम समझते हैं कि समान सोच रखने वाले हमारे जैसे राष्ट्र मिल कर यूरोप के भविष्य को बहुत ही सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।” ओरबान ने इस मौके को भी यूरोपीय संघ के बड़े देशों पर निशाना साधने के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, “हम फिर से किसी साम्राज्य में नहीं रहना चाहते हैं। हम लगातार यूरोपीय संघ को राष्ट्रों के संघ के तौर पर देखते हैं।”

एक बार फिर धर्म का पत्ता फेंकते हुए ओरबान यह कहना भी नहीं भूले कि ईसाई संस्कृति को संरक्षित और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हम हंगरी के लोग समझते हैं कि यूरोप यूरोपियन ही रहे।” यानी फिर उन्होंने साफ कर दिया कि यूरोप में मध्य पूर्व के देशों से आए मुसलमानों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। कोटे के मुद्दे पर विक्टर ओरबान आरपार के मूड में दिखते हैं। यूरोपीय जस्टिस कोर्ट ने भी जब कोटा व्यवस्था पर अपनी मुहर लगा दी तो विक्टर ओरबान ने कहा, “असल लड़ाई तो अब शुरू हुई है।” यूरोपीय संघ की तरफ से एकजुटता की अपीलों पर वह कहते हैं कि इस एकजुटता की खातिर हंगरी आप्रवासियों के देश में तब्दील हो जाएगा और यह उन्हें कतई मंजूर नहीं है। वह कहते हैं कि बड़े पश्चिमी यूरोपीय देश इसलिए आप्रवासियों के देश बने क्योंकि दुनिया में उनके उपनिवेश थे और इस नाते उनके ऊपर एक जिम्मेदारी आती थी, लेकिन हंगरी के ऊपर किसी औपनिवेशिक विरासत का बोझ नहीं है। बहरहाल उनके इस रुख के चलते यूरोपीय संघ की प्रवासी नीति एक बड़ा बोझ साबित हो रही है और इसके ताने बाने उलझते ही जा रहे हैं।

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