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मकानों की किल्लत से जूझता जर्मनी, आसमान छू रहे हैं किराए

रोजगार और पढ़ाई के बेहतर अवसर लोगों को जर्मन शहरों की तरफ ला रहे हैं। लेकिन जिस तेजी से शहरों की आबादी बढ़ रही है, उस तेजी से मकान नहीं बनाए जा रहे हैं। यही वजह है कि जर्मनी में मकानों की किल्लत हो रही है।

आठ करोड़ लोगों के साथ जर्मनी यूरोप में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है।

भारत हो या यूरोप, सब जगह रोटी, कपड़ा और मकान ही इंसान की बुनियादी जरूरतें हैं। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में रोटी और कपड़े की तो शायद कोई कमी नहीं है लेकिन मकान मुसीबत बन रहे हैं। किराए और प्रॉपर्टी के दाम इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि जर्मन लोगों को पसीना छूट रहा है। इसलिए सरकार भी दबाव में है। जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने कहा है कि आने वाले सालों में 15 लाख नए घर बनाए जाएंगे। सरकार इस पर पांच अरब यूरो यानी 424 अरब रुपये खर्च करने की योजना बना रही है। सबसे बड़ी जरूरत ऐसे किफायती घर बनाने की है जो कम आमदनी वाले लोगों की पहुंच में भी हों। आठ करोड़ लोगों के साथ जर्मनी यूरोप में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। शरणार्थियों की समस्या और मजबूत होती दक्षिणपंथी सियासत पर चिंताओं से इतर देश की अर्थव्यवस्था चकाचक है। बेरोजगारी की दर साढ़े तीन प्रतिशत से भी कम है। नौकरियों की कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी काम करने वालों की है। लेकिन मकानों का संकट सिरदर्द बनता जा रहा है।

रोजगार और पढ़ाई के बेहतर अवसर लोगों को जर्मन शहरों की तरफ ला रहे हैं। लेकिन जिस तेजी से शहरों की आबादी बढ़ रही है, उस तेजी से मकान नहीं बनाए जा रहे हैं। यही वजह है कि जर्मनी में मकानों की किल्लत हो रही है। जिन शहरों में मकानों का किराया सबसे ज्यादा है उनमें म्यूनिख, कोलोन, श्टुटगार्ट, हैमबर्ग, फ्रैंकफर्ट और बर्लिन शामिल हैं। एक जमाना था जब बर्लिन अपने कम किराए की वजह से दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता था। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। लोगों को मकान तलाशने के लिए दर दर भटकना पड़ता है, जबकि दस साल पहले तक जर्मन राजधानी में किराए का मकान ढूंढना ज्यादा मुश्किल काम नहीं समझा जाता था। इन दस सालों में मकानों के किराए भी लगभग दो गुने हो गए हैं। रुपये में बात करें, तो एक कमरे के मकान के लिए अब करीब 75,000 रुपये देने पड़ रहे हैं। इस साल मई में बर्लिन में ही पुलिस को उस समय दखल देना पड़ा जब बढ़ते किरायों के विरोध में 56 लोग खाली इमारतों में डेरा जमा कर बैठ गए। इससे पहले अप्रैल में दस हजार लोगों ने मकानों की किल्लत के खिलाफ सड़कों पर आकर प्रदर्शन किया।

बड़े शहरों में यह संकट कुछ ज्यादा है, लेकिन इसे महसूस पूरे देश में किया जा रहा है। जर्मनी के संघीय बैंक बुंडेसबांक की एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक साल में राष्ट्रीय स्तर पर मकान के किरायों में 7.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है जबकि प्रॉपर्टी के दाम भी 15 से 30 प्रतिशत तक बढ़े हैं। ऐसे में, खतरा इस बात को लेकर है कि जब कीमतों का यह बुलबुला फूटेगा तो रियल एस्टेट सेक्टर का क्या हाल होगा।

प्रॉपर्टी एसोसिएशनों का अनुमान है कि जर्मनी में हर साल साढ़े तीन लाख से चार लाख घर बनाने की जरूरत है। इनमें लगभग 80 हजार सोशल हाउसिंग यूनिट बनानी होंगी, यानी ऐसे किफायती घर जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के लिए हों। लेकिन आलोचक सवाल उठाते हैं कि यह होगा कैसे। अभी जर्मनी में एक साल में 2.8 लाख नए घर बनाए जा रहे हैं। इसका मतलब है कि नए घरों के निर्माण में जर्मनी लक्ष्य से काफी पीछे चल रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि यह मुद्दा राजनेताओं की प्राथमिकता में शामिल है और वे इसे हल करना चाहते हैं। जनवरी में जब चांसलर अंगेला मैर्केल की पार्टी सीडीयू और सोशल डेमोक्रैट्स के बीच नई गठबंधन सरकार बनाने को लेकर सहमति हुई, तो उसके दस्तावेज में किफायती घरों के निर्माण को भी प्राथमिकताओं में शामिल किया गया।

इसी महीने जर्मन कैबिनेट ने एक बिल को मंजूरी दी है जिसका मकसद बड़े शहरों में तेजी से बढ़ रहे किरायों पर लगाम लगाना है। इस बिल के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी मकान को किराए पर लेता है तो उसे यह जानने का हक है कि उससे पहले वहां रह रहा व्यक्ति कितना किराया देता था। बिल में इस बात की रोकथाम पर जोर दिया गया है कि कहीं मकान मालिक छिटपुट मरम्मत को किराया बढ़ाने के लिए इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है।

वहीं, बिल्डर किराए को लेकर इंतनी बंदिशों का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे निर्माण सेक्टर में निवेश करने वालों का भरोसा डगमगाएगा। उनकी दलील है कि अगर किराए नहीं बढ़ेंगे तो फिर कोई क्यों निर्माण सेक्टर में अपना पैसे लगाए। इसके अलावा जर्मनी में भवन निर्माण के सख्त नियम कानून भी नए मकान बनाने की राह में बाधा बनते हैं। खासकर अब जोर ऐसे घरों पर है जिनमें ऊर्जा की खपत कम से कम रहे। आम तौर पर ऐसे घरों पर आने वाली लागत बहुत ज्यादा होती है। इसके अलावा किसी नई जमीन पर निर्माण कार्य की अनुमति के लिए भी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। बर्लिन में 2014 में हुए एक जनमत संग्रह में लोगों ने एक पब्लिक पार्क की जमीन पर निर्माण कार्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

हर उद्योग की तरह रियल एस्सेट को भी मुनाफा चाहिए। ऐसे में, घरों की किल्लत से इस सेक्टर में बूम आ रहा है। लेकिन बात जब घरों की होती है, तो इसे सिर्फ उद्योग और मुनाफे के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। लोगों को किफायती दामों पर घर मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी बनती है। सरकार इसके लिए गंभीर भी है। लेकिन जरूरत निर्माण की रफ्तार को तेज करने की है। दस लाख से ज्यादा शरणार्थियों को देश में जगह देने के लिए पहले ही चांसलर मैर्केल को खरी खोटी सुननी पड़ती है। ऐसे में, मकानों की किल्लत को दूर करने के लिए तेजी से कदम नहीं उठाए गए तो उनके आलोचकों के स्वर और तेज होंगे।

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