तेहरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने से दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई पर खतरा बढ़ गया है। इस वजह से खाड़ी क्षेत्र के देश खासकर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब अब इस रास्ते पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें, तेल और गैस की सप्लाई इस समुद्री रास्ते पर काफी निर्भर है। अगर इसमें कोई रुकावट आती है, तो पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए ये देश अब नए बंदरगाह, पाइपलाइन और दूसरी सुविधाएं बना रहे हैं ताकि भविष्य में इस रास्ते पर उनकी निर्भरता कम हो सके।
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलमार्ग से होकर गुजरने वाले समुद्री यातायात में अभूतपूर्व ठहराव आया है। यह ईरान और ओमान के बीच एक संकरा जलमार्ग है। जिससे होकर वैश्विक तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का लगभग पांचवां हिस्सा यहां से होकर गुजरता है। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने खाड़ी देशों को पुरानी पाइपलाइनों को पुनर्जीवित करने और नई पाइपलाइनें बनाने के लिए सहयोग और समन्वय करने का पर्याप्त कारण दिया है। क्षेत्र से मिली रिपोर्टों के अनुसार, इस दिशा में प्रारंभिक प्रयास पहले से ही शुरू हो चुके हैं।
संयुक्त अरब अमीरात स्थित व्यवसायी और देश के व्यापार एवं परोपकार मामलों के विशेष दूत बदर जाफर ने हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में लिखा, “मैंने पिछले महीने सैकड़ों व्यापारिक नेताओं और खाड़ी देशों की वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ इस संकट और इसके बाद की चुनौतियों पर चर्चा की है। बातचीत का रुख बदल चुका है। तत्काल संकट के प्रबंधन से हटकर उन प्रणालियों को फिर से तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है जिन्होंने इसको जन्म दिया।”
जाफर ने लिखा, “यह संकट वह कर रहा है जो वर्षों के शिखर सम्मेलन नहीं कर पाए, वास्तविक अंतरक्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के लिए परिस्थितियां तैयार कर रहा है। जिन देशों के संबंध कुछ ही सप्ताह पहले तनावपूर्ण थे, वे अब एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। आवश्यक व्यापार को एक ही अवरोध बिंदु से हटाकर दूसरे मार्ग पर ले जाने से न केवल इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के जोखिम भी कम होते हैं।”
दशकों तक ईरान होर्मुज जलमार्ग को बंद करने की धमकी देता रहा, लेकिन उसने वास्तव में ऐसा नहीं किया। 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-इजराइल के ईरान विरोधी युद्ध ने स्थिति बदल दी। तेहरान और पूरी दुनिया अब जानती है कि वह लगभग अपनी इच्छा से इस समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही को प्रभावी ढंग से रोक सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल सकता है।
पश्चिम एशिया युद्ध ने तेल, गैस और कुछ अन्य प्रमुख वस्तुओं के वैश्विक प्रवाह के लिए होर्मुज जलमार्ग के महत्व को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है और ईरान द्वारा इसे प्रभावी रूप से बंद करने से विशेष रूप से ऊर्जा बाजारों में झटके लगे हैं।
कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर की वरिष्ठ तेल विश्लेषक विक्टोरिया ग्रैबेनवोगर ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “भविष्य में होर्मुज जलमार्ग पर निर्भरता को और कम करने के लिए कई पाइपलाइन विकल्पों का विस्तार, पुनः सक्रियण या नए निर्माण किए जा सकते हैं। हालांकि, इन सभी के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय निवेश और इन्हें साकार होने में कई वर्षों का समय लगेगा।”
कई तेल टैंकरों और सैकड़ों व्यापारिक जहाजों के फारस की खाड़ी में फंसे होने के बावजूद, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने होर्मुज जलमार्ग को बाईपास करने वाली पाइपलाइनों का उपयोग करके अपने तेल का कुछ हिस्सा निर्यात करने में कामयाबी हासिल की। इनमें सऊदी अरब की 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन शामिल है, जो फारस की खाड़ी के पास स्थित तेल क्षेत्रों से लेकर लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक जाती है और संयुक्त अरब अमीरात की अबूधाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (एडीसीओपी) है, जो हबशान तेल क्षेत्र को ओमान की खाड़ी में फुजैराह बंदरगाह से जोड़ती है।
हालांकि इन पाइपलाइनों के माध्यम से ले जाई जा सकने वाली मात्रा सऊदी अरब और यूएई द्वारा आमतौर पर होर्मुज जलमार्ग के माध्यम से निर्यात की जाने वाली मात्रा से काफी कम है, फिर भी इन्होंने होर्मुज जलमार्ग पर निर्भरता को कम करने के एक उपकरण के रूप में पाइपलाइनों की क्षमता को प्रदर्शित किया है।
इस अहसास से भविष्य में पश्चिम एशिया से ऊर्जा प्रवाह के तरीके में एक बड़ा बदलाव आ सकता है। विशेषज्ञों और विश्लेषकों के अनुसार, युद्ध ने अन्य पश्चिम एशियाई शक्तियों को होर्मुज जलमार्ग को दरकिनार करने के लिए पाइपलाइनों जैसी विशाल अवसंरचना के निर्माण के महत्व को पहचानने के लिए प्रेरित किया है। इस प्रकार की अवसंरचना का निर्माण- जिसमें नई पाइपलाइनें बनाना, क्षेत्र में मौजूदा पाइपलाइन प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना और बंद पड़ी या निष्क्रिय पाइपलाइनों को पुनर्जीवित करना शामिल हो सकता है। हालांकि, इस काम में वर्षों लगेंगे, भारी निवेश की आवश्यकता होगी और खाड़ी देशों के बीच व्यापक सहयोग की आवश्यकता होगी। लेकिन ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को बाधित करके किए गए हमले के बाद, यह संभावना है कि पश्चिम एशिया में और अधिक पाइपलाइन और बंदरगाह अवसंरचना का निर्माण किया जाएगा, ताकि निर्यात को ओमान की खाड़ी, लाल सागर और भूमध्य सागर जैसे वैकल्पिक मार्गों के माध्यम से जलडमरूमध्य से दूर किया जा सके।
ऐसा नहीं है कि पश्चिम एशिया में अतीत में तेल निर्यात पाइपलाइनें नहीं थीं। फिर भी, क्षेत्रीय तनावों के चलते उनमें से शायद ही कोई टिक पाई हो। खाड़ी अनुसंधान केंद्र में ऊर्जा अध्ययन के वरिष्ठ सलाहकार नाजी अबी आद ने एक विश्लेषण में लिखा, “खाड़ी क्षेत्र में तेल निर्यात पाइपलाइनों के ऐतिहासिक प्रदर्शन को देखते हुए यह आसानी से देखा जा सकता है कि इस क्षेत्र की हर पाइपलाइन कम से कम एक बार बंद हुई है, और उनमें से अधिकांश आज भी बंद हैं। खाड़ी में कई निर्यात पाइपलाइनों के बंद होने के मुख्य कारण उत्पादक देशों या राज्यों के भीतर राजनीतिक संघर्ष और अंतरराज्यीय विवाद हैं। वास्तव में राज्य सीमाओं को पार करने वाली अधिकांश पाइपलाइनें किसी न किसी समय इस क्षेत्र की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और संघर्षों का शिकार हो चुकी हैं।
पाइपलाइन विकल्प
केप्लर के तेल विश्लेषक ग्रैबेनवोगर ने कहा, “सबसे व्यवहार्य उपायों में संभवतः सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन/यानबू की क्षमता का विस्तार, साथ ही यूएई की एडीसीओपी पाइपलाइन में सुधार या फुजैराह तक समानांतर लाइनें बिछाना शामिल होगा।”
उन्होंने कहा, “इराक-तुर्की पाइपलाइन (किरकुक से सेहान तक) पर प्रवाह क्षमता बढ़ाने से खाड़ी क्षेत्र को बाईपास करते हुए इराकी कच्चे तेल की अधिक मात्रा का परिवहन संभव हो सकेगा। इसके अलावा, बसरा-अकाबा (इराक-जॉर्डन) पाइपलाइन और आईपीएसए (सऊदी अरब के रास्ते इराकी पाइपलाइन) सहित कई परियोजनाएं, जो फिलहाल रुकी हुई हैं। वह आने वाले वर्षों में फिर से शुरू की जा सकती हैं। आईपीएसए पाइपलाइन, जो इराक को सऊदी अरब से जोड़ती है और आगे लाल सागर पर स्थित यानबू तक जाती है, वह 1990 के दशक की शुरुआत से बंद पड़ी है और इसे फिर से शुरू करने के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी सुधार और राजनीतिक समन्वय की आवश्यकता होगी। यदि इसे फिर से सक्रिय किया जाता है, तो यह एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक निर्यात मार्ग प्रदान कर सकता है जो खाड़ी क्षेत्र से पूरी तरह बचता है।”
अबू धाबी स्थित ऊर्जा विश्लेषक नतालिया काटोना ने ग्रैबेनवोगर की बात का समर्थन करते हुए कहा कि इराक के बसरा में तेल उत्पादन को किरकुक से और फिर तुर्की के सेहान से जोड़ना “कागज पर काफी तर्कसंगत” लगता है।
काटोना ने इस समाचार पत्र को बताया, “बुनियादी ढांचा आंशिक रूप से मौजूद है, लेकिन इसका विस्तार और स्थिरीकरण करने में समय, धन और कहीं अधिक स्थिर सुरक्षा वातावरण की आवश्यकता होगी। हालांकि, इराक पर कार्रवाई करने का सबसे अधिक दबाव है- सीमित भंडारण, सीमित शोधन और निरंतर निर्यात पर भारी निर्भरता। यदि हम अधिक व्यापक दृष्टिकोण की बात करें, तो सऊदी अरब से जॉर्डन और सीरिया होते हुए भूमध्य सागर तक जाने वाली पुरानी ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन जैसी किसी परियोजना को पुनर्जीवित करने का विचार हमेशा मौजूद है। लेकिन वास्तविकता में वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति को देखते हुए यह एक निकट भविष्य के विकल्प की बजाय एक विचार मात्र है।”
ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन और आईपीएसए के अलावा, पश्चिम एशिया की अन्य प्रमुख निष्क्रिय या बंद हो चुकी तेल पाइपलाइन प्रणालियों में इराक के किरकुक को सीरिया के बानियास बंदरगाह से जोड़ने वाली पाइपलाइन और इराक-सीरिया-लेबनान पाइपलाइन शामिल हैं। क्षेत्रीय युद्धों और राजनीतिक तनावों के कारण इनमें से अधिकांश पाइपलाइनें प्रभावी रूप से बंद कर दी गई हैं और इन्हें छोड़ दिया गया है। हालांकि समय-समय पर इन्हें पुनर्जीवित करने की चर्चाएं सामने आती रहती हैं।
कटोना ने कहा, “कुवैत, कतर और बहरीन जैसे देशों के लिए भौगोलिक स्थिति वाकई प्रतिकूल है। उनके पास पाइपलाइन के ज़्यादा विकल्प नहीं हैं, इसलिए अल्पावधि से मध्यावधि में पूरी तरह से प्रवाह का मार्ग बदलने के बजाय भंडारण क्षमता बढ़ाना और जोखिम प्रबंधन करना ज़्यादा ज़रूरी है। समय के लिहाज़ से यूएई के पास शायद छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स पर अपेक्षाकृत तेज़ी से आगे बढ़ने की सबसे ज़्यादा लचीलता है। लेकिन असली ढांचागत दबाव इराक और छोटे खाड़ी देशों पर है, वे सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं और उनके पास सबसे कम वैकल्पिक विकल्प हैं।”
लेकिन कुवैत, कतर और बहरीन जैसे देशों के सामने मौजूद वर्तमान सीमाएं उन्हें भविष्य के लिए पाइपलाइन बुनियादी ढांचे के निर्माण हेतु अपने खाड़ी पड़ोसियों के साथ सहयोग करने से नहीं रोकती हैं।
ब्लूमबर्ग के ऊर्जा और कमोडिटी स्तंभकार जेवियर ब्लास ने हाल ही में एक लेख में लिखा, “सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी बाईपास पाइपलाइनों के माध्यम से कुछ हद तक इस अवरोध को दूर करने में कामयाबी हासिल की है। रियाद और अबू धाबी लगभग निश्चित रूप से इन आपातकालीन पाइपलाइनों का और विस्तार करेंगे। कुवैत भी निस्संदेह सऊदी अरब के साथ मिलकर अपनी बाईपास पाइपलाइन का निर्माण करेगा। इराक को खर्चे की समस्या होगी, लेकिन उसके पास अपनी पुरानी रणनीतिक पाइपलाइन का पुनर्निर्माण करने का पूरा प्रोत्साहन है, जिसके माध्यम से वह दक्षिण से तुर्की होते हुए भूमध्य सागर तक तेल पहुंचाता था।”
ब्लास ने लिखा, “पांच साल बाद फारस की खाड़ी के पास आज की तुलना में कहीं बेहतर वैकल्पिक मार्ग होंगे। अमेरिका और ईरान होर्मुज के भविष्य को लेकर चाहे जो भी समझौता करें, होर्मुज जलमार्ग की स्थिति बदल जाएगी। लेकिन यह जलमार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए उतना महत्वपूर्ण कभी नहीं रहेगा जितना छह सप्ताह पहले लड़ाई शुरू होने पर था।”
पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता के दूसरे दौर को लेकर सस्पेंस लगातार बरकरार है। ट्रंप की टीम उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की लीडरशिप में बातचीत के इस्लामाबाद जाने वाला है लेकिन ईरान अभी राजी नहीं है। इस बीच पाकिस्तानी सेना के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन मिलाया और होर्मुज जलमार्ग को लेकर एक खास गुजारिश की है। पढ़ें पूरी खबर।
