भारत अब सिर्फ दूसरे देशों के साथ व्यापार समझौते करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि इन समझौतों का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाकर अपने कारोबार और निर्यात को बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार की नजर अब दुनिया के बड़े बाजारों पर है, जहां भारतीय कंपनियों को दूसरे देशों की तुलना में बेहतर शर्तों पर सामान बेचने का मौका मिल सके।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कहा कि भारत ने अब तक नौ मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए किए हैं। इन समझौतों के जरिए भारतीय कारोबारियों को दुनिया के करीब दो-तिहाई बाजार तक बेहतर पहुंच मिल चुकी है। अब सरकार की कोशिश है कि इन समझौतों का इस्तेमाल सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि भारतीय कंपनियां वास्तव में इनका फायदा उठाएं।

पीयूष गोयल के मुताबिक आने वाले समय में भारत कई और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार समझौते कर सकता है। इनमें अमेरिका, कनाडा और चिली जैसे देश शामिल हैं। इसके अलावा कई अन्य देशों और व्यापारिक समूहों के साथ भी बातचीत चल रही है।

अमेरिका के साथ समझौते में अटका है पेच

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। दोनों देशों ने 2 फरवरी को एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते का ढांचा तैयार कर लिया था, लेकिन इसके बाद अमेरिका में टैरिफ से जुड़े कानूनी बदलावों के कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका।

पीयूष गोयल इस महीने के आखिर में अमेरिका जाने वाले हैं। उन्होंने साफ किया कि भारत तब तक समझौते को अंतिम रूप नहीं देगा, जब तक भारतीय सामान पर ऐसा शुल्क तय नहीं हो जाता जिससे भारत को उसके प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले फायदा मिले।

सीधी भाषा में कहें तो भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर लगने वाला टैक्स इतना कम हो कि भारत की कंपनियां चीन, वियतनाम और दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले पीछे न रह जाएं। गोयल ने कहा कि जैसे ही अमेरिका भारत को उसके प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर टैरिफ दर देने की स्थिति में होगा, दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाएगा।

अब तक किन देशों के साथ हुआ समझौता?

मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत ने कई देशों और व्यापारिक समूहों के साथ एफटीए किए हैं। इनमें मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी EFTA, ओमान और ब्रिटेन प्रमुख हैं।

न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौतों को लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। अमेरिका के साथ भी अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा तैयार हो चुका है, लेकिन टैरिफ से जुड़ी अंतिम व्यवस्था तय होना बाकी है।

सरकार का जोर इस बात पर है कि हर व्यापार समझौता भारत के लिए सिर्फ बाजार खोलने वाला न हो, बल्कि भारतीय निर्यातकों को दूसरे देशों के कारोबारियों के मुकाबले वास्तविक बढ़त भी दे।

अमेरिका की टैरिफ नीति बन रही बड़ी चुनौती

व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की तरफ से लगाए जा रहे अलग-अलग टैरिफ और जांच भारत के लिए चिंता का विषय हैं। जुलाई में अमेरिका ने कुछ श्रम-प्रधान भारतीय उत्पादों पर 10 फीसदी टैरिफ लगाया था। इसके अलावा अमेरिकी प्रशासन ने औद्योगिक क्षमता से जुड़े एक और मामले की जांच शुरू की है, जिससे भविष्य में अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की आशंका बनी हुई है।

ऐसे में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के रास्ते में सिर्फ बातचीत ही नहीं, बल्कि अमेरिकी टैरिफ नीति भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन मुद्दों पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक दोनों देशों के लिए संतुलित और दोनों के हित में समझौते पर पहुंचना मुश्किल रहेगा।

अब नजर कनाडा, चिली और दूसरे बड़े बाजारों पर

भारत की व्यापार रणनीति अब अमेरिका तक सीमित नहीं है। सरकार आने वाले महीनों और अगले कुछ वर्षों में कई और देशों के साथ व्यापार समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कनाडा, मैक्सिको, चिली, मर्कोसुर, दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ यानी SACU, खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC और इजरायल के साथ बातचीत चल रही है।

इसके साथ ही भारत पहले से मौजूद कुछ व्यापार समझौतों को भी नए सिरे से देख रहा है। ASEAN, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ मौजूदा समझौतों की समीक्षा और विस्तार पर काम किया जा रहा है। सरकार का अनुमान है कि नए समझौतों और पुराने समझौतों के विस्तार के बाद भारतीय कारोबारियों को दुनिया के करीब 75 फीसदी व्यापार तक ऐसे बाजारों में पहुंच मिल सकती है, जहां भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कम शुल्क का फायदा मिलेगा।

चिली के साथ समझौता क्यों खास है?

इन बातचीत के बीच चिली के साथ प्रस्तावित आर्थिक समझौता भारत के लिए खास महत्व रखता है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA को अंतिम रूप देने के काफी करीब हैं।

चिली की खासियत यह है कि वहां कई ऐसे महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध हैं जिनकी जरूरत इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, ऊर्जा और आधुनिक तकनीक से जुड़े उद्योगों में तेजी से बढ़ रही है।

यानी भारत की कोशिश सिर्फ अपने तैयार माल के लिए नए ग्राहक ढूंढने की नहीं है। वह ऐसे देशों के साथ भी रिश्ते मजबूत करना चाहता है, जहां से भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी कच्चा माल और महत्वपूर्ण खनिज हासिल किए जा सकें।

कुल मिलाकर भारत की व्यापार नीति अब एक नए दौर में जाती दिख रही है। लक्ष्य सिर्फ ज्यादा एफटीए करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इन समझौतों से भारतीय कंपनियों को वास्तव में फायदा मिले, निर्यात बढ़े और दुनिया के बड़े बाजारों में भारत की हिस्सेदारी मजबूत हो।

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