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पांच करोड़ यूरो का जुर्माना रोक पाएगा हेट स्पीच को?

दुनिया के दूसरे देशों की तरह जर्मनी भी सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों से तंग है। बात चंद खुराफातियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई सांसद तक ट्विटर पर ऐसी बात लिख रहे हैं कि सरकार कदम उठाने को मजबूर है।
जर्मनी भी सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों से तंग है। (Photo: Reuters Representative)

दुनिया के दूसरे देशों की तरह जर्मनी भी सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों से तंग है। बात चंद खुराफातियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई सांसद तक ट्विटर पर ऐसी बात लिख रहे हैं कि सरकार कदम उठाने को मजबूर है। ऐसे लोगों को काबू करने के लिए जर्मनी में पहली जनवरी से एक नया कानून लागू किया गया, लेकिन हफ्ता भर भी नहीं बीता कि इस कानून को खत्म करने की मांग उठने लगी है। इस कानून के मुताबिक सोशल मीडिया वेबसाइटों ने अगर 24 घंटे के भीतर हेट स्पीच वाली सामग्री को नहीं हटाया तो उन पर पांच करोड़ यूरो (यानि 380 करोड़ रुपए) का जुर्माना लग सकता है। इसीलिए ट्विटर ने झटपट कई मुस्लिम विरोधी और प्रवासी विरोधी ट्वीट हटा दिए। लेकिन जर्मनी में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले बिल्ड अखबार का कहना है कि यह कानून एक दुधारी तलवार है और इसे जितना जल्दी खत्म कर दिया जाए, उतना अच्छा।

अखबार ने एक तरफ नए कानून को अभिव्यक्ति की आजादी पर बंदिश करार दिया है, तो दूसरी तरफ यह भी कहा है कि दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के जिन राजनेताओं के ट्वीट इस कानून के तहत हटाए गए हैं, उन्हें खामख्वाह ‘वैचारिक शहीद’ बनने का मौका मिल रहा है। अखबार के मुताबिक भले ही यह कानून कट्टरपंथी गुटों पर लगाम लगाने के लिए लाया गया है, लेकिन इसका असर उल्टा हो रहा है। दूसरी तरफ, जर्मनी के न्याय मंत्री हाइको मास इस बात से सहमत नहीं है कि हेट स्पीच विरोधी कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा है। उनका कहना है, “बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या के आह्वान, धकमियां, अपमान और भड़काने वाली बातें या फिर आउषवित्स के झूठ अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हैं, बल्कि ये अन्य लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हैं।”

पिछले दिनों में जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के दो सांसदों के ट्वीट्स पर काफी विवाद हुआ है। इनमें पहला ट्वीट पार्टी सांसद बेआट्रिक्स फॉन श्टॉर्श का था, जिन्होंने नए साल के मौके पर जर्मन शहर कोलोन की पुलिस के अरबी भाषा में किए ट्वीट पर भारी नाराजगी जताई। अरबी भाषा में नव वर्ष की शुभकामनाएं देने वाली कोलोन पुलिस के ट्वीट पर उन्होंने ट्वीट दागा, “यह इस देश में हो क्या रहा है? क्यों एक आधिकारिक पुलिस साइट अरबी भाषा में ट्वीट कर रही है।” उन्होंने लिखा, “क्या इसका मतलब है कि आप लोग बर्बर, मुस्लिम, गैंग रेप करने वाले पुरुषों के झुंड को खुश करना चाहते हैं?”  कोलोन में नए साल के जश्न पर दो साल पहले की घटना का भी साया था जब सैकड़ों महिलाओं ने अपने साथ यौन दुर्व्यवहार होने की शिकायत दर्ज कराई और इसके लिए बहुत हद तक प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराया गया।

2015 के प्रवासी संकट के दौरान जर्मनी ने 10 लाख से ज्यादा शरणार्थियों को अपने यहां जगह दी है जिनमें से ज्यादातर सीरिया और अन्य संकटग्रस्त क्षेत्रों से आए हैं। समाज का एक तबका सरकार के इस फैसले से खुश नहीं है और इसी का नतीजा है कि हालिया चुनाव में प्रवासियों और मुसमलानों का विरोध करने वाली एएफडी पार्टी को इतनी बड़ी कामयाबी मिली। 92 सांसदों के साथ यह आज जर्मन संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। जर्मन पुलिस ने फॉन श्टॉर्श के ट्वीट को नफरत भड़काने वाला कदम मानते हुए उनके खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। ट्विटर ने उनका ट्वीट हटा दिया और 12 घंटे तक उनका ट्विटर अकाउंट भी ब्लॉक रखा। लेकिन उन्होंने अपना यही मैसेज फेसबुक पर भी पोस्ट किया। नए कानून को देखते हुए फेसबुक ने उसे हटाने में देर नहीं लगाई।

यह मामला ठंडा नहीं पड़ा था कि एक और एएफडी सांसद का विवादित ट्वीट सामने आया। पार्टी के एक सांसद येंस मायर ने जर्मन टेनिस स्टार बोरिस बेकर के बेटे नोह बेकर को “आधा नीग्रो” कह दिया। नोह की मां अफ्रीकी-अमेरिकी पिता और एक जर्मन मां की संतान हैं। एक पत्रिका में प्रकाशित नोह बेकर के इंटरव्यू के बाद मायर ने उनके खिलाफ नस्ली टिप्पणी की। इस इंटरव्यू में नोह ने दावा किया कि उनके रंग की वजह से बर्लिन में उन पर हमला किया गया। मायर के ट्वीट को बाद में हटा लिया गया। हालांकि उनका कहना है कि यह ट्वीट उनके स्टाफ के एक व्यक्ति ने किया, लेकिन यह सफाई पर्याप्त नहीं थी। तीर कमान से निकल चुका था। अब नोह बेकर एएफडी सांसद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं।

यह किस्सा सिर्फ जर्मनी का नहीं है। भारत समेत दुनिया भर में बेलगाम सोशल मीडिया मुसीबतें खड़ी कर रहा है। हर दिन न जाने घृणा की चाश्नी में लिपटे कितने ट्वीट, फेसबुक पोस्ट और वीडियो सोशल मीडिया का हिस्सा बन रहे हैं। इनसे न सिर्फ समाज में नफरत और द्वेष फैल रहा है, बल्कि झूठी जानकारियों को सच्चा बताकर पेश किया जा रहा है। कई लोग इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। भारत में कई बार सोशल मीडिया ने दंगों के दौरान आग में घी डालने का काम किया है। साफ है कि हेट स्पीच और फेक न्यूज अब एक ग्लोबल समस्या है, इसलिए इससे निपटने की कोशिशें भी ग्लोबल स्तर पर करनी होंगी। मामला जटिल है क्योंकि जब भी हेट स्पीच के खिलाफ कदम उठाने की बात होगी तो अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी हक से जुड़े सवाल सामने खड़े होंगे।

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