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आतंकवाद रोकने के लिए ‘मस्जिद टैक्स’ लगाने पर विचार कर रही यह सरकार!

जर्मनी में एक बार फिर 'मस्जिद टैक्स' लगाने की चर्चा जोर पकड़ रही है। मस्जिद टैक्स लगाने का उद्देश्य इस्लामिक संस्थानों को विदेश मदद या फंडिंग पर निर्भरता को कम करना है।

तुर्की-इस्लामिक यूनियन ऑफ द इंस्टीट्यूट फॉर रिलीजन 900 मस्जिदों का संचालन करता है। (प्रतीकात्मक फोटोः एपी)

जर्मनी में एक बार फिर ‘मस्जिद टैक्स’ लगाने की चर्चा जोर पकड़ रही है। मस्जिद टैक्स लगाने का उद्देश्य इस्लामिक संस्थानों को विदेश मदद या फंडिंग पर निर्भरता को कम करना है। यह बात एक मीडिया रिपोर्ट में रविवार को कही गई।

एक सवाल के जवाब में जर्मनी की संघीय सरकार इसे संभावित कदम के रूप में देख रही है। इसे परोक्ष रूप से आतंकवाद को रोकने व इस्लामिक विचारधारा के प्रभाव से बचने का उपाय माना जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार जर्मनी में 16 राज्यों ने इस आशय के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से अपनी सहमति जता दी है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे जर्मनी में ‘चर्च टैक्स’ लिया जाता है। जर्मनी में एक बार फिर से मस्जिद टैक्स लगाने पर चर्चा तेज हो गई है। सरकार के साथ ही प्रगतिशील मुसलमान मस्जिद टैक्स लगाए जाने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार जर्मनी में 50 लाख से अधिक मुस्लिम रहते हैं। इनमें से अधिकतर तुर्की और अरब देशों से हैं। तुर्की-इस्लामिक यूनियन ऑफ द इंस्टीट्यूट फॉर रिलीजन जर्मनी में 900 मस्जिदों का संचालन करता है। यह संगठन तुर्की के राष्ट्रपति रेसिप तैयप एर्दोगन के अधीन है।

यहां के मस्जिदों के इमाम को तुर्की की तरफ से पैसे दिए जाते हैं। इससे पहले इस समूह के सदस्य जर्मनी में जासूसी करने को लेकर जांच के दायरे में आए थे। साल 2017 में जब जर्मनी और तुर्की से संबंधों में तनाव बढ़ गया था उस समय जर्मनी के दो मंत्रियों ने कहा था कि एर्दोगन की खतरनाक विचारधारा को कुछ निश्चित मस्जिदों के जरिये जर्मनी में लाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

यहां के कुछ मस्जिद कंट्टरपंथी व इस्लामिक उग्रवादी विचारधारा फैलाने को लेकर जांच के दायरे में आ चुके हैं। एक सर्वे के अनुसार राज्यों इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि जर्मनी में मस्जिदों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए।

जर्मनी के अलावा अन्य यूरोपीय देशों में भी है चर्च टैक्सः जर्मनी की तरह ही स्वीडन, इटली और ऑस्ट्रिया जैसे कई यूरोपीय देशों में ‘चर्च टैक्स’ लिया जाता है। टैक्स के बाद सरकार इन चर्च को इनकी खर्च के लिए अपनी तरफ से राशि उपलब्ध कराती है। ये टैक्स कैथोलिक के साथ ही प्रोटेस्टेंट लोगों से भी लिया जाता है। बर्लिन में प्रगतिशील मस्जिद के संस्थापक सेयरान अटेस ‘मस्जिद टैक्स’ को लेकर सहमत हैं।

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