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घड़ियों को आगे-पीछे करने से छुटकारा चाहता है यूरोप, 80 प्रतिशत लोगों ने डेलाइट सेविंग का किया विरोध

समय तो अपनी रफ्तार से चलता रहता है, लेकिन घड़ियों को जरूर आगे पीछे किया जा सकता है। अमेरिका और यूरोप के देशों में सर्दियों और गर्मियों में घड़ियों को एक घंटा आगे पीछे करना के रिवाज है।

Author डॉयचे वेले, बॉन, जर्मनी | September 2, 2018 1:21 AM
घड़ियां को बदलने का यह सिलसिला सबसे पहले 1916 में जर्मनी में उस वक्त शुरू हुआ जब पहला विश्व युद्ध अपने चरम पर था।

समय तो अपनी रफ्तार से चलता रहता है, लेकिन घड़ियों को जरूर आगे पीछे किया जा सकता है। अमेरिका और यूरोप के देशों में सर्दियों और गर्मियों में घड़ियों को एक घंटा आगे पीछे करना के रिवाज है। इसका मकसद है गर्मियों में सूरज की रोशनी का ज्यादा से इस्तेमाल करना। लेकिन अब यूरोप डेलाइट सेविंग कही जाने वाली इस अदला बदली से छुटकारा पाना चाहता है। यूरोपीय संघ के देशों में हुए एक सर्वे में लगभग 46 लाख लोगों ने हिस्सा लिया जिसमें से 80 प्रतिशत लोगों की राय है कि गर्मियों और सर्दियों में एक जैसा ही समय रहना चाहिए। यूरोपीय आयोग के प्रमुख ज्यां क्लोद युंकर भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं। सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों में सबसे ज्यादा 30 लाख लोग जर्मनी से थे। इससे पता चलता है कि जर्मन लोग इस व्यवस्था से छुटकारा पाने के लिए कितने बेताब है।

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने भी इस मुद्दे को बड़ी प्राथमिकता बताया है। ब्रिटेन के लोगों ने इस मामले में सबसे कम दिलचस्पी दिखाई, जो पहले ही यूरोपीय संघ को छोड़ने का फैसला कर चुका है। घड़ियां को बदलने का यह सिलसिला सबसे पहले 1916 में जर्मनी में उस वक्त शुरू हुआ जब पहला विश्व युद्ध अपने चरम पर था। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद यह सिलसिला भी बंद हो गया। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस पर फिर से अमल होने लगा। युद्ध के बाद पूर्वी जर्मनी में इस पर अमल होता रहा। उसने तो अपनी घड़ियों को एक नहीं, बल्कि दो घंटा आगे पीछे करना शुरू कर दिया। पश्चिमी जर्मनी में 1980 से डेलाइट सेविंग पर अमल होने लगा। जर्मनी के साथ साथ ब्रिटेन और फ्रांस समेत कई दूसरे यूरोपीय देशों ने घड़ियों को आगे पीछे करना शुरू कर दिया। 1918 में अमेरिका ने भी इस नियम को अपना लिया।

वैसे डेलाइट सेविंग का ख्याल सबसे पहले एक ब्रिटिश बिल्डर विलियम विलेट को आया और उन्होंने इसका प्रस्ताव रखा। ब्रिटेन के विलियम विलेट का कहना था कि गर्मियों में सूरज जल्दी निकलता है और उजाला जल्दी फैलता है। लेकिन इसका बहुत सारा हिस्सा बेकार चला जाता है क्योंकि लोग गर्मी में सुबह सोए रहते हैं। इसलिए गर्मी में घड़ियों को एक घंटा आगे कर दिया जाए, तो सूरज का रोशनी का ज्यादा इस्तेमाल हो सकता है। हालांकि उनके जीवनकाल में इस पर अमल नहीं हो सका। लेकिन बाद में जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका जैसे पश्चिमी दुनिया के बहुत से देशों ने इसे अपना लिया। वे गर्मियों में अपनी घड़ियों एक घंटा आगे करने लगे और सर्दियां आने पर घड़ियों को पीछे कर लिया जाता रहा।

मार्च के आखिरी रविवार को यूरोप की घड़ियां एक घंटा आगे कर दी जाती हैं और अक्टूबर के आखिरी रविवार को घंटा भर पीछे। यह काम शनिवार और रविवार की दरमियानी रात में दो बजे किया जाता है। मार्च में जब घड़ियों में दो बजते हैं तो घड़ियों को आगे कर उनमें तीन बजा दिए जाते हैं जबकि अक्टूबर में जब घड़ियां रात के तीन बजा रही होती हैं तो उन्हें एक घंटा पीछे कर दो बजा दिए जाते हैं। ऑटोमेटिक घड़ियां तो खुद अपना टाइम एडजस्ट कर लेती हैं। लेकिन हाथ से सेट की जाने वाली घड़ियों का वक्त बदलना पड़ता है। याद नहीं रखा तो अगली सुबह आपकी बस, ट्रेन और फ्लाइट छूट सकती हैं। देरी से पहुंचने पर स्कूल या दफ्तर में भी डांट पड़ सकती है। शुरू के कुछ दिन तक बदलते हुए समय के साथ एडजस्ट करना जरा मुश्किल ही होता है। घड़ियों को समय बदलने का कई लोग यह कर भी विरोध करते हैं कि इसका सेहत पर बुरा असर पड़ता है क्योंकि यह प्राकृतिक नियमों के साथ छेड़छाड़ है।

जानकार कहते हैं कि हमारे शरीर में खुद एक तरह की घड़ी होती है जिसे बॉडी क्लॉक का नाम दिया जाता है जबकि दूसरी होती है इंसान की बनाई घड़ियां। ऐसे में, जब भी मानव निर्मित घड़ियों में कोई बदलाव किया जाता है तो उनके साथ हमारी बॉडी क्लॉक का तालमेल प्रभावित होता है। कुछ अध्ययन भी यह कहते हैं कि बार बार वक्त बदलने से उत्पादन क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए बहुत से किसान भी घड़ियों को बदलने का विरोध करते हैं। वहीं घड़ियों का समय बदलने के समर्थकों का कहना है कि इससे न सिर्फ ऊर्जा की बचत होती है, बल्कि उत्पादकता भी बढ़ती है। लेकिन आलोचक इससे उत्पादकता घटने की दलील देते हैं क्योंकि टाइम में बदलाव की वजह से नींद में खलल पड़ती है। टाइम बदलने पर किसी व्यक्ति को अपने निर्धारित समय से एक घंटा पहले उठना पड़ सकता है। ऐसे में, नींद ना पूरी होने का असर दिन पर उसके काम पर रहेगा।

फिनलैंड ने डेलाइट सेविंग को खत्म करने की मांग उठाई है। वहां लगभग 70 हजार लोगों ने हस्ताक्षर मुहिम के जरिए घड़ियों के साथ छेड़छाड़ का विरोध किया है। यूरोपीय आयोग का कहना है कि डेलाइट सेविंग से ऊर्जा की बचत भी उतनी नहीं होती जितना कहा जाता है। यूरोपीय आयोग के प्रमुख युंकर के रुख से लगता है कि वह इसे खत्म करने का पूरा मन बना चुके हैं। लेकिन इतना बड़ा बदलाव करने के लिए उन्हें यूरोपीय संघ के 28 देशों की सरकारों और यूरोपीय संसद की मंजूरी हासिल करनी होगी। अगर यूरोप में ऐसा हो जाता है तो फिर तुर्की, रूस, आइसलैंड और बेलारूस जैसे देशों में डेलाइट सेविंग के खिलाफ आवाज उठ सकती है।

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