यूरोप ने इस साल अप्रत्याशित रूप से भीषण गर्मी का सामना किया और पूरे महाद्वीप से संकलित आंकड़ों के मुताबिक तापमान में बेतहाशा वृद्धि से जुड़ी घटनाओं में सामान्य से कहीं अधिक, करीब 10 हजार लोगों की जान गई है। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार जून के आखिर में इसमें तेजी से वृद्धि हुई, जब यूरोप के कुछ हिस्सों में तापमान ने रिकॉर्ड तोड़ दिया। जानकारों का कहना है कि पूरी स्थिति समझने में समय लगता है और गर्मी से होने वाली कई मौतों को आधिकारिक तौर पर उस तरह दर्ज नहीं किया जाता।
उदाहरण के लिए, भीषण गर्मी से दिल का दौरा पड़ सकता है, खासतौर पर उन लोगों को जो उम्रदराज हैं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। लेकिन उनकी मौत होने पर मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत की वजह दिल का दौरा लिखा जा सकता है। अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक गर्मियों की शुरुआत चिंताजनक रही है। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में कई बार भीषण गर्मी पड़ी, जिसकी वजह से हजारों लोगों की मौत हुई है।
डेनमार्क के स्टेटन्स सीरम इंस्टीट्यूट से संबद्ध और यूरोएमओएमओ के समन्वयक लासे वेस्टेरगार्ड ने कहा, “हम इसका कारण यूरोप के कई देशों में पड़ रही भीषण गर्मी को मानते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस अवधि में इतनी अधिक मौतों की कोई और स्पष्ट वजह समझ नहीं आती।”
यूरोएमओएमओ ने अलग-अलग देशों के आंकड़े नहीं दिए हैं, लेकिन उसने फ्रांस, बेल्जियम और जर्मनी में अतिरिक्त मौतों की सबसे अधिक दर दर्ज की है।
जर्मनी के रोग नियंत्रण केंद्र रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट ने इस साल जुलाई की शुरुआत तक गर्मी से सीधे तौर पर 6,830 लोगों की मौत होने की बात कही है। इनमें से 6,470 लोगों की उम्र 65 वर्ष या उससे अधिक थी।
ब्रिटेन की राष्ट्रीय मौसम एजेंसी ने कहा है कि मई और जून में इंग्लैंड और वेल्स में भीषण गर्मी की वजह से करीब 2,700 लोगों की मौत हुई। फ्रांस के जन स्वास्थ्य प्राधिकरण ने बताया कि 22 से 28 जून के बीच इससे पूर्ववर्ती सप्ताह की तुलना में करीब 2,000 अधिक मौतें दर्ज की गईं। स्पेन की सरकारी निगरानी एजेंसी कार्लोस तृतीय स्वास्थ्य संस्थान के मुताबिक देश में भीषण गर्मी से करीब 937 लोगों की मौत हुई।
बेल्जियम के जन स्वास्थ्य संस्थान साइएनसानो (Sciensano) के मुताबिक 18 जून से 1 जुलाई तक भीषण गर्मी के प्रकोप वाली अवधि में सामान्य से 1,747 अधिक मौतें हुईं। नीदरलैंड में भी इस साल भीषण गर्मी से करीब 480 लोगों की मौत हुई है।
साल 2003 में लगभग 70 हजार लोगों की गई थी जान
गर्मी के कारण यूरोप में वर्ष 2003 सबसे अधिक जानलेवा रहा था, जिसमें लगभग 70 हजार लोगों की मौत हुई थी। जलवायु परिवर्तन की वजह से भीषण गर्मी की आवृत्ति बढ़ रही है और यह बदलाव कोयला, तेल और गैस जैसे ईंधनों के दहन से हो रहा है। यूरोएमओएमओ एक मृत्यु निगरानी केंद्र है, जिसे दो दर्जन देशों से आंकड़े प्राप्त होते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 28 जून को समाप्त हुए सप्ताह में सभी कारणों से करीब 14,260 अतिरिक्त मौतें हुईं। इनमें से 12 हजार से अधिक मौतें 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की थीं। यह उस सप्ताह हुई कुल 84,583 मौतों का हिस्सा था। इससे पहले और बाद के सप्ताहों में ये आंकड़े काफी कम थे।
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जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को अक्सर बढ़ते तापमान, हीटवेव, बाढ़ और सूखे से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अब इसका असर इंसानी शरीर की सबसे बुनियादी जरूरत- नींद पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती है कि भारत में बढ़ती गर्म रातों के कारण लोग हर साल दर्जनों घंटे की नींद खो रहे हैं। कुछ राज्यों में यह नुकसान 90 घंटे के करीब पहुंच चुका है जबकि इसका एक बड़ा हिस्सा सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
