जर्मनी में शरणार्थी मुद्दे पर संविधान बदलने की बहस

जर्मन संविधान के निर्माता ऐसी स्थिति में फंसने वाले दूसरे लोगों की मदद करना अपना कर्तव्य समझते थे. जर्मनी दुनिया का संभवतः अकेला देश है जो प्रताड़ित लोगों को शरण का संवैधानिक अधिकार देता है.

जर्मनी में आए हुए शरणार्थी (फोटो सोर्स : Indian Express)

जर्मनी में देश के संविधान में मौजूद शरण के अधिकार पर बहस हो रही है. जब से सत्ताधारी क्रिश्चियन डेमोक्रैटिक पार्टी का अध्यक्ष बनने की कोशिश में लगे फ्रीडरिष मैर्त्स ने संविधान की इस धारा पर खुली बहस की मांग की है, तब से उनकी अपनी पार्टी और पार्टी से बाहर ये बहस तेज हो गई है. जर्मन संविधान की ये धारा जर्मनी के द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवों से जुड़ी है.

नाजी तानाशाही से भागने वाले बहुत से जर्मनों को जब दूसरे देशों ने शरण दी तो उनकी जान बच गई. दूसरे, बहुत से देशों ने जर्मन यहूदियों को शरण देने से मना कर दिया जिन्हें बाद में जर्मनी वापस लौटना पड़ा और वे नाजी यातना शिविरों में मारे गए. जर्मन संविधान के निर्माता ऐसी स्थिति में फंसने वाले दूसरे लोगों की मदद करना अपना कर्तव्य समझते थे.

जर्मनी दुनिया का संभवतः अकेला देश है जो राजनैतिक रूप से प्रताड़ित लोगों को शरण का संवैधानिक अधिकार देता है. एक तो इसकी वजह से और दूसरे अपनी अच्छी आर्थिक स्थिति के कारण जर्मनी शरणार्थियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय भी है. लेकिन मौजूदा पीढ़ी के बहुत से लोग द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी अत्याचारों के लिए अपनी जिम्मेदारी को नहीं मानते. इसलिए संवैधानिक शरणार्थी अधिकारों पर बहस जर्मनी के लिए एक अहम नैतिक बहस बन गई है.

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल जब से राजनीतिक तौर पर कमजोर हुई हैं, उनकी पिछले सालों की नीतियों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. और ये सवाल पार्टी के बाहर तो पहले ही उठाए जा रहे थे, अब पार्टी के अंदर भी उठाए जा रहे हैं. मैर्केल के इस्तीफे के बाद पार्टी नेतृत्व की दावेदारी कर रहे नेता इन मुद्दों को और जोर शोर से उठा रहे हैं. इनमें से एक फ्रीडरिष मैर्त्स हैं, जो मैर्केल के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद सक्रिय राजनीति छोड़कर वित्तीय संस्थानों में काम करने लगे थे. अब 18 साल बाद मैर्केल के सीडीयू पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद वे मैदान में हैं और मैर्केल की नीतियों पर हमला कर रहे
हैं.

मैर्त्स के सक्रिय राजनीति में लौटने के साथ ही जर्मन राजनीति के दो दशक पुराने नारे वापस लौट आए हैं. संसदीय दल के नेता पद से हटाए जाने के समय भी उनके लिए विदेशियों का मुद्दा प्रमुख था और वे उस समय जर्मन मुख्यधारा की संस्कृति की बात कर रहे थे, जिसे विदेशियों को भी मानना चाहिए. अब फिर से उन्होंने संविधान में शामिल शरण के अधिकार को बदलने के मुद्दे पर वर्जनाओं को तोड़ने की बात कही है. उस बहस से ज्यादा कुछ भले ही न बदले, लेकिन पार्टी के दक्षिणपंथी धड़े को खुश करने में मदद जरूर मिलेगी. ये एक सांकेतिक असर वाला कदम होगा.

मैर्केल के राजनीतिक प्रभाव का कम होना उनकी शरणार्थी नीति के साथ जुड़ा रहा है. शरणार्थी संकट के शीर्ष पर 2015 में करीब 15 लाख शरणार्थी जर्मनी आए. मैर्केल ने अपनी पार्टी के कंजर्वेटिव तत्वों से पूछे बिना देश की सीमाएं खोल दी थी और उम्मीद की थी कि शरणार्थियों के आने से जर्मनी कामगारों की कमी की अपनी समस्या भी हल कर लेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. युद्ध क्षेत्रों से आए शरणार्थी इतने कुशल नहीं थे कि उच्चस्तरीय जर्मन अर्थव्यवस्था में खप सकें. तीन साल से शरणार्थियों के मुद्दे पर बहस चल रही है, इसने मैर्केल को राजनीतिक रूप से कमजोर किया है, सीडीयू और एसपीडी जैसी पार्टियों का समर्थन घटा है और अति दक्षिणपंथी और विदेशी विरोधी एएफडी पार्टी का उदय हुआ है.

तीन साल से चल रही बहस के बाद ऐसा लग रहा था कि विदेशियों और शरणार्थियों से जुड़े सारे मुद्दों पर जर्मनी में पर्याप्त बहस हो चुकी. हालांकि राजनैतिक शरण के अधिकार पर जर्मन संविधान की धारा को बदलने की बहस के मध्य में आ गई सीडीयू पार्टी को फिर से दक्षिण की और ले जाने की कोशिश है ताकि वे समर्थक जो पार्टी का साथ छोड़कर एएफडी की ओर चले गए हैं, उन्हें फिर से वापस लाया जा सके.

शरणार्थियों के मुद्दे ने पूरे यूरोप में कंजरवेटिव पार्टियों को बांट दिया है. यूरोपीय संसद के चुनाव से कुछ महीने पहले यह विभाजन इतना गहरा गया है कि संयुक्त राष्ट्र की आप्रवासन संधि पर भी वे एक दूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहे हैं. चांसलर मैर्केल इसका पूरा समर्थन कर रही हैं, लेकिन पहली बार उनकी पार्टी और उनका संसदीय दल पूरी तरह उनके साथ नहीं है. पिछले दिनों संसदीय दल के नेता पद पर उनके उम्मीदवार और लंबे समय से संसदीय दल के नेता रहे फोल्कर काउडर की हार उनके घटते असर का सबूत है. ऑस्ट्रिया के कंजरवेटिव चांसलर इसका विरोध कर रहे हैं. सीडीयू का युवा धड़ा भी इसके खिलाफ दिखता है. संधि पर दस्तखत दिसंबर में सीडीयू की पार्टी कांग्रेस के कुछ ही दिनों बाद होगा. पार्टी में इस मुद्दे पर बहस की मांग जोर पकड़ती जा रही है. और जिस तरह से मैर्केल की पकड़ कमजोर पड़ती जा रही है, कोई आश्चर्य नहीं कि पार्टी कांग्रेस इस मुद्दे पर चांसलर से अलग राय तय कर ले.

जर्मनी बहुत धीमी गति से ही सही, लेकिन बड़े बदलाव से गुजर रहा है. करीब दो दशक से जर्मनी की राजनीति मतदाताओं के केंद्र में घूम रही थी, उसे फिर से वाम और दक्षिणपंथ के ध्रुवीकरण की और ले जाया जा रहा है. शरणार्थियों के मुद्दे पर संविधान में संशोधन संविधान रचयिताओं के मूल्यों के साथ खिलवाड़ के अलावा नाजी काल से सीखे सबक का त्याग भी होगा. आने वाले दिनों में सिर्फ शरणार्थियों और विदेशियों के मुद्दे पर ही नहीं दूसरे मुद्दों पर भी जर्मनी अधिक दक्षिणपंथी रवैया अपनाता हुआ दिख सकता है.

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