जर्मन संसद में भी महिलाओं के आरक्षण पर बहस

सौ साल पहले इन्हीं दिनों जर्मनी की संसद में पहली बार एक महिला सांसद ने भाषण दिया था. यह वह समय था जब कुछ ही दिन पहले उन्हें पहली बार वोट देने और चुने जाने का अधिकार मिला था. लेकिन सौ साल बाद भी जर्मन संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, इसके बावजूद कि करीब 14 साल से देश का नेतृत्व अंगेला मैर्केल के रूप में एक महिला चांसलर कर रही हैं।

प्रतीकात्मक फोटो (Source: www.bundestag.de)

सौ साल पहले इन्हीं दिनों जर्मनी की संसद में पहली बार एक महिला सांसद ने भाषण दिया था. यह वह समय था जब कुछ ही दिन पहले उन्हें पहली बार वोट देने और चुने जाने का अधिकार मिला था. लेकिन सौ साल बाद भी जर्मन संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, इसके बावजूद कि करीब 14 साल से देश का नेतृत्व अंगेला मैर्केल के रूप में एक महिला चांसलर कर रही हैं. लेकिन खुद उनकी पार्टी के सांसदों में भी महिलाओं का अनुपात बहुत ही कम है. राजनीति में ज्यादा महिलाओं को लाने के लिए जर्मनी में इस समय संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण पर बहस हो रही है. बहस की एक प्रमुख वजह यह है कि मौजूदा संसद में महिलाओं की भागीदारी 37 प्रतिशत से गिरकर करीब 31 प्रतिशत ही रह गई है. जर्मन संसद में महिलाओं की तादाद गिरने की वजह संसद में नई पार्टी एएफडी का आना है।

उग्र दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी को पहली बार ही मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिला है और उनके 92 सांसदों में महिलाएं गिनी चुनी हैं. इसने कुल प्रतिशत को गिरा दिया है. वामपंथी पार्टी डी लिंके और ग्रीन पार्टी अत्यंत सख्ती से महिला और पुरुषों को बराबर मौके देने का समर्थन करती है, इसलिए उनके सांसदों में लगभग 50 फीसदी महिलाएं हैं. महिला समानता का समर्थन करने वाली देश की पहली महिला सांसद देने वाली पार्टी होने के गर्व के बावजूद सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी 50 प्रतिशत महिला सांसदों का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई है. जर्मनी की चुनाव पद्धति संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को आसान बनाती है तो बड़ी पार्टियों केलिए कुछ मुश्किलें भी खड़ी करती है. 598 सदस्यों वाली संसद की 50 फीसदी सीटें भारत की तरह चुनाव क्षेत्रों में सीधे मतदान से चुनी जाती हैं।

बाकी 50 प्रतिशत का फैसला पार्टियों को मिले वोट के आधार पर पार्टियों की सूची से होता है जिसमें महिलाओं के लिए चुनावी मैदान में उतरे बिना संसद में पहुंचना संभव होता है. लेकिन जिन सीटों पर फैसला सीधे मतदान में होता है वहां अकसर महिलाएं उम्मीदवार नहीं बनाई जातीं या उम्मीदवार होने से हारने का जोखिम उठाती हैं. चांसलर मैर्केल की सीडीयू-सीएसयू या एसपीडी जैसी पार्टियां चुनाव क्षेत्रों से सबसे ज्यादा सीटें जीतती हैं, लेकिन निश्चित जीत वाली सीटों पर अक्सर पुरुष उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं. ग्रीन और डी लिंके या एएफडी की ज्यादातर सीटें पार्टियों की सूची से आती हैं, इसलिए उनके लिए महिलाओं को उम्मीदवार बनाना ज्यादा आसान है. कोई आश्चर्य नहीं कि मौजूदा संसद की महिला सांसदों में ग्रीन पार्टी की करीब 58 प्रतिशत और वामपंथी पार्टी की करीब 54 प्रतिशत हिस्सेदारी है. 1919 की जर्मन संसद में पहली बार एक महिला सांसद मारी यूखाच की आवाज गूंजी थी. सौ साल बाद बुंडेसटाग में एक तिहाई से भी कम महिलाएं हैं. राजनीतिक दलों को महिला नेताओं का अभाव खल रहा है. फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी की 28 वर्षीया गाइड यानसेन सबसे युवा सांसद हैं।

दस सबसे युवा सांसदों में सिर्फ दो महिलाएं हैं. महिलाएं राजनीति करने को प्रेरित नहीं हो रही हैं. समस्या सिर्फ चुनाव प्रक्रिया की ही नहीं है, संसदों की कार्य प्रणाली की भी है. अकसर बैठकें देर से शुरू होती हैं और कितनी देर चलेंगी, पता नहीं होता. खासकर युवा महिलाओं के लिए परिवार और बच्चों के साथ इस रूटीन के साथ तालमेल बिठाना संभव नहीं होता. इसलिए एसपीडी संसद में महिलाओं को बराबरी देने के लिए बहुदलीय विधेयक लाने पर बातचीत कर रही है. पिछले दिनों एएफडी को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर अनौपचारिक बात की है. संसद में महिलाओं के लिए कम से कम 50 प्रतिशत सीटें सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन का ऐसा रास्ता निकालने का प्रयास किया जा रहा है जो नई मुश्किलें खड़ी न करे।

जिन विकल्पों पर चर्चा हो रही है उनमें पार्टियों पर आधी महिला उम्मीदवार खड़ी करने की शर्त के साथ एक चुनाव क्षेत्र से दो उम्मीदवारों का चुनाव करना भी शामिल है जिनमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाले एक पुरुष और एक महिला का चुनाव शामिल है. पहली शर्त का कुछ पार्टियों में यह कहकर विरोध हो रहा है कि इससे पार्टियों की स्वायत्ता खत्म होगी. बहुत से लोग महिलाओं के लिए राजनीतिक संगठनों में काम का माहौल पैदा करने की भी मांग कर रहे हैं. स्वीडन जैसे उत्तरी यूरोप के देशों ने ये कर के दिखाया है जहां संसद में 44 प्रतिशत महिलाएं हैं. स्वीडन में पिछले दशकों में राजनीतिज्ञों के बच्चों के लिए किंडरगार्टन की सुविधा, बच्चा होने की स्थिति में छुट्टी की व्यवस्था और विदेशी दौरे की स्थिति में विशेष मदद जैसे कदमों के साथ हर स्तर पर बराबरी का माहौल बनाने की कोशिश हुई है।

फ्रांस में बराबरी का कानून लागू है जिसमें पार्टियों को दलीय सूची में बराबर तादाद में महिला और पुरुष उम्मीदवारों को शामिल करना पड़ता है. मौजूदा संसद में राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों की पार्टी के प्रयास से 39 प्रतिशत महिलाएं आई हैं जबकि पिछली संसद में उनकी संख्या सिर्फ 27 प्रतिशत थी. ओईसीडी के देशों में महिला सांसदों के लिहाज से जर्मनी 16वें नंबर पर है. जर्मनी की संसद अपनी आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति की बदौलत समाज के राजनीतिक विचारों का प्रतिबिंब होने का दावा करती है, लेकिन लैंगिक समानता लाने के मामले में वह अब तक नाकाम रही है. अब यहां के प्रमुख राजनीतिक दलों ने स्थिति को बदलने और संसद को समाज का आईना बनाने का बीड़ा उठा लिया है।

महेश झा, डॉयचे वेले, बॉन, जर्मनी

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