जलवायु परिवर्तन: क्यों बढ़ी आशंका सैन्य तनाव की

अमेरिका के ‘आफिस आफ डायरेक्टर आफ नेशनल इंटेलिजेंस’ (ओडीएनआइ) की ताजा रिपोर्ट ‘नेशनल इंटेलिजेंस एस्टीमेट’ में पूर्वानुमान जाहिर किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेंगे।

(बाएं) भूपेंद्र यादव, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री,केपी फाबियान, पूर्व राजनयिक ! फाइल फोटो।

अमेरिका के ‘आफिस आफ डायरेक्टर आफ नेशनल इंटेलिजेंस’ (ओडीएनआइ) की ताजा रिपोर्ट ‘नेशनल इंटेलिजेंस एस्टीमेट’ में पूर्वानुमान जाहिर किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेंगे। अमेरिकी खुफिया एजंसियों के रडार पर दुनिया के 11 देश हैं। इनमें भारत के अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमा, इराक, उत्तर कोरिया, ग्वाटेमाला, हैती, होंडूरास, निकारागुआ और कोलंबिया हैं, जहां अमेरिकी एजंसियों ने रणनीतिक और सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन देशों पर जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा कहर बरपा सकता है। ये देश जलवायु परिवर्तन के कारण आने वालीं प्राकृतिक और सामाजिक आपदाओं को झेलने के लिए तैयार नहीं हैं। जलवायु संकट के कारण 2040 तक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेंगे, जिसका अमेरिका की सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा।
दक्षिण एशिया में युद्ध का खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक सूखा, पानी की कमी और प्रभावहीन सरकार के कारण अफगानिस्तान की स्थिति काफी चिंताजनक है। भारत और बाकी दक्षिण एशिया में पानी की कमी के कारण विवाद उभर सकते हैं। यह तनाव इन देशों के बीच गंभीर विवाद में बदल सकता है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान अपने भूजल के लिए भारत से निकलती नदियों पर निर्भर रहता है। दोनों परमाणु संपन्न देश 1947 में आजाद होने के बाद से कई युद्ध लड़ चुके हैं। भारत के दूसरी तरफ बांग्लादेश की कुल आबादी 16 करोड़ का लगभग 10 फीसद पहले ही ऐसे तटीय इलाकों में रह रहा है जो समुद्र का जलस्तर बढ़ने के सबसे ज्यादा खतरे में है।
विस्थापन का खतरा
अनुमान है कि बढ़ता तापमान दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और अफ्रीका के सहारा क्षेत्र की तीन फीसद आबादी यानी करीब 14.3 करोड़ लोगों को अगले तीन दशक में ही विस्थापित कर सकता है। ये लोग दूसरे देशों की ओर पलायन करेंगे। अमेरिकी एजंसियां दो और क्षेत्रों को लेकर चिंतित हैं। रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण मध्य अफ्रीका और प्रशांत महासागर के छोटे छोटे द्वीपों को लेकर विशेष चिंता जताई गई है और कहा गया है कि ये दुनिया के दो सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में शामिल हैं। इन एजंसियों का मानना है कि जो देश अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जीवाश्म ईंधनों के निर्यात पर निर्भर हैं, वे शून्य कार्बन संसार की ओर अग्रसर होने का विरोध करते रहेंगे क्योंकि वे ऐसा करने की आर्थिक, राजनीतिक या भू-राजनीतिक कीमत से डरते हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग के मुताबिक हर साल तूफान, मौसमी बारिश और औचक प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनियाभर के औसतन करीब दो करोड़ 15 लाख लोग विस्थापित होते हैं। आज और आने वाले सालों में बनाई गईं नीतियां और योजनाएं जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण विस्थापित हो रहे लोगों के अनुमान को प्रभावित करेंगी।
आर्कटिक क्षेत्र में आर्थिक होड़
आर्कटिक और गैर-आर्कटिक देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक संकट को खतरा माना जा रहा है। तापमान बढ़ने और बर्फ कम होने से पहुंच आसान हो जाएगी। आर्कटिक क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंलिता मोटे तौर पर आर्थिक होगी, लेकिन गलत गणना का खतरा 2040 तक मध्यम रूप से बढ़ेगा क्योंकि व्यावयसायिक और सैन्य गतिविधियां बढ़ेंगी और अवसरों के लिए ज्यादा संघर्ष होगा। आर्कटिक क्षेत्र के अलावा इसी साल गर्मियों में ग्रीस में गर्मी की ऐसी लहर देखी गई जैसी पहले कभी नहीं आई। उसकी वजह से घातक जंगली आग फैल गई जिसने करीब 2,50,000 एकड़ जंगलों को जला कर राख कर दिया। अल्जीरिया और तुर्की में तो आग से करीब 80 लोग मारे गए। इटली और स्पेन में भी आग का प्रकोप देखा गया।
जलवायु बैठक में दांव
ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र की ओर से जलवायु शिखर सम्मेलन हो रहा है। इसमें विश्व नेताओं पर वैश्विक तापमान को स्थिर करने और जलवायु के लिहाज से तैयारी के लिए आर्थिक साझेदारी का दबाव बनाया जाएगा। वर्ष 2015 में पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का गैर-बाध्यकारी लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन समझौते पर हस्तक्षर के बावजूद पूरी दुनिया में पेरिस समझौते के लक्ष्यों के विपरीत, पूरी रफ्तार से जीवाश्म ईंधन फूंके जा रहे हैं और पेड़ों को काटा जा रहा है। प्रदूषण करने वाले कई देशों के नेताओं ने इस शताब्दी के मध्य तक अपनी अर्थव्यवस्थाओं को कार्बनमुक्त कर देने का वादा किया है।

क्या है पेरिस संधि

तमाम बैठकों में महत्त्वपूर्ण प्रगति नहीं हो पाई थी और निर्णय लेने की गति भी उम्मीद से बहुत कम रही है। फिर भी अभी तक की सबसे जीवंत उपलब्धि काप21 के तहत हुआ पेरिस समझौता है। ये जलवायु परिवर्तन को लेकर सबसे बड़ी वैश्विक संधि है। 2015 में 196 देशों की मंजूरी से पेरिस समझौता अस्तित्व में आ गया, जिसमें औद्योगिक काल पूर्व के स्तरों के मुकाबले ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य घोषित किया गया। इस कोशिश को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी थी कि ये लक्ष्य डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक आ जाए। कुछ लोगों का मानना है कि पेरिस समझौता का असर दिख रहा है। फासिल इंधनों से दूरी बरती जा रही है और नई परियोजनाओं में कोयले का इस्तेमाल नहीं करने पर जोर दिया जा रहा है।

क्या कहते हैं जानकार

भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शुमार है, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार अपनी ओर से अधिक प्रयास कर रहा है। भारत 2030 तक हरित ऊर्जा क्षमता बढ़ाकर 450 गीगावॉट करने की ओर बढ़ रहा है। देश में 100 गीगावॉट से ज्यादा नवीनीकृत ऊर्जा क्षमता स्थापित हो चुकी है।

  • भूपेंद्र यादव, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री

हर साल तूफान, मौसमी बारिश और औचक प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनियाभर के औसतन करीब दो करोड़ 15 लाख लोग विस्थापित होते हैं। आज और आने वाले वर्षों में बनाई गईं नीतियां और योजनाएं जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण विस्थापित हो रहे लोगों के अनुमान को प्रभावित करेंगी।

  • केपी फाबियान, पूर्व राजनयिक

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