चीन की चुनौती बरकरार: नहीं खुल रहा तनाव का ताला

पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर अब तक चली वार्ताओं में कई इलाकों को लेकर जिच बरकरार है।

(बाएं) जनरल (सेवानिवृत्त) शंकर रायचौधरी। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बलवीर सिंह संधू । फाइल फोटो।

पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर अब तक चली वार्ताओं में कई इलाकों को लेकर जिच बरकरार है। हाल में उपग्रह तस्वीरों के आधार पर अरुणाचल सीमा के पास चीन लारा गांव बसाए जाने, भूटान की सीमा के भीतर निर्माण किए जाने की खबरें आई हैं। इन सबके बीच सैन्य कमांडर स्तरीय वार्ता और राजनयिक स्तरीय वार्ताओं का दौर जारी है। इन हालात में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल में चीन के रवैए को लेकर कड़े बयान जारी किए हैं। ऐसे में चीन के साथ चल रही वार्ता के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सीमा पर सामरिक महत्त्व के कई इलाकों को लेकर जिच बरकरार है।
चीन ने क्यों दिखाया रंग
भारत इस बात पर जोर दे रहा है कि देपसांग समेत टकराव के सभी बिंदुओं पर लंबित मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच संबंधों के समग्र सुधार के लिए जरूरी है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तैनात भारी-भरकम फौज की वापसी को लेकर भारत-चीन के बीच पिछले महीने हुई 13वें दौर की सैन्य वार्ता तल्खी के साथ खत्म हुई। हालांकि, दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर आने को तैयार हुए हैं। दरअसल, जब तक कैलाश रेंज पर भारतीय जवानों का कब्जा रहा, चीन दबा रहा। वार्ता के दौरान चीन ने कई इलाकों में अपनी फौज पीछे हटाने के एवज में भारत से कैलाश रेंज खाली करने की मांग रखी। जब कैलाश रेंज खाली हो गया तो चीन फिर से अपने रंग में लौट गया। अब भारत के सामने चीन को देपसांग इलाके में पीछे धकेलने की चुनौती फिर से मुंह बाए खड़े है।
देपसांग पर पेच
देपसांग क्षेत्र में कई जगहों पर भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने हैं। वार्ताओं में सहमति के बावजूद चीनी सेना भारतीय सैनिकों को पिछले साल से ही अपने पारंपरिक पेट्रोलिंग पाइंट पीपी-10, 11, 11ए, 12 और 13 के साथ-साथ देमचोक क्षेत्र सेक्टर में ‘ट्रैक जंक्शन’ चार्डिंग निंगलुंग नाला (सीएनएन) तक जाने नहीं दे रही है। चीनी सैनिकों ने इन इलाकों के रास्ते रोक रखे हैं। भारत चाहता है कि देपसांग पठार में उसे गश्त के पुराने अधिकार मिलें, जहां चीनी सैनिक अभी उसे पीपी 10 से 13 तक जाने नहीं दे रहे। भारत इस बात पर जोर दे रहा है कि देपसांग समेत टकराव के सभी बिंदुओं पर लंबित मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच संबंधों के समग्र सुधार के लिए जरूरी है। माना जा रहा है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने वार्ता के 13वें चरण में देपसांग में तनाव कम करने पर जोर देते हुए अपना रुख पुरजोर तरीके से रखा था।
घुसपैठ से उठे सवाल
चीनी सैनिकों की ओर से घुसपैठ की कोशिश की दो घटनाओं की पृष्ठभूमि में 13वें दौर की बातचीत हुई थी। पहला मामला उत्तराखंड के बाराहोती सेक्टर में और दूसरा अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में सामने आया था। पिछले महीने की शुरुआत में अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में यांगत्से के पास भारतीय और चीनी सैनिकों का कुछ देर के लिए आमना-सामना हुआ था। हालांकि, स्थापित प्रक्रिया के अनुसार दोनों पक्षों के कमांडरों के बीच वार्ता के बाद कुछ घंटे में मामले को सुलझा लिया गया था।
भूटान की जमीन पर चीन के गांव
एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने भूटान की जमीन पर कई गांव बसा लिए हैं। पिछले एक साल में सौ वर्ग किलोमीटर में ये गांव बसाए गए हैं, जो भारत के लिए चिंता की बात हो सकती है। चीनी सेना की गतिविधियों की उपग्रह तस्वीरें जारी हुई हैं। एक विशेषज्ञ ने कुछ तस्वीरें ट्वीट करते हुए दावा किया है कि चीन ने भूटान के अंदर पिछले एक साल में नए गांव बसा लिए हैं। ट्वीट के मुताबिक, 100 वर्ग किलोमीटर के दायरे में कई गांव दिखाई दे रहे हैं। ‘द इंटेल लैब’ नामक इस संस्था ने लिखा है, ‘डोकलाम के नजदीक भूटान और और चीन के बीच विवादित जमीन पर 2020-21 के बीच नया निर्माण देखा जा सकता है। सौ वर्ग किलोमीटर में कई नए गांव अब इस जमीन पर फैले दिखते हैं।’

भारत और भूटान

द इंटेल लैब के दावे से भारत में चिंता बढ़ी है। ऐतिहासिक रूप से भूटान भारत का करीबी रहा है और उसकी विदेश नीति पर भारत का काफी प्रभाव रहा है। भारत ही भूटान की फौजों को प्रशिक्षण देता है। दूसरी ओर, भूटान पर चीन लगातार दबाव बनाता है। चीन चाहता है कि भूटान सीमाओं को लेकर उसके साथ तोलमोल करे, ताकि इलाकों को फिर भी परिभाषित किया जा सके। दोनों देशों के बीच बातचीत भी हुई। लेकिन उस बातचीत में क्या हुआ, यह सार्वजनिक नहीं हो पाया। इसलिए इस बात को लेकर संदेह जताए जा रहे हैं कि नया निर्माण कहीं उसी समझौते का हिस्सा तो नहीं है। द इंटेल लैब के मुताबिक ये नए गांव मई 2020 और नवंबर 2021 के बीच बनाए गए थे।

क्या कहते हैं जानकार

पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच चुके चीन की निगाह ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए मलक्का जल डमरू क्षेत्र तक है। यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग है और अमेरिका समेत कुछ देशों के साथ व्यापार युद्ध को देखते हुए चीन का इरादा बहुत नेक नहीं जान पड़ रहा है।

  • जनरल (सेवानिवृत्त) शंकर रायचौधरी

चीन की बड़ी योजना हिंद महासागरीय क्षेत्र में भारत के चारों ओर उसकी दूरगामी रिंग आफ पर्ल योजना की है। वह सेतुवे, श्रीलंका के हंबनटोटा, बांग्लादेश के चट्गांव तक अपनी पहुंच बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। सीमा विवाद को इस तथ्य के मुताबिक भी विश्लेषित करना चाहिए।

  • लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त)
    बलवीर सिंह संधू

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