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पाकिस्‍तान में ईशनिंदा कानून: सैकड़ों बने शिकार, पर इसे खत्‍म करना सुप्रीम कोर्ट के बूते की भी बात नहीं

पाकिस्‍तान के सुप्रीम कोर्ट ने बीते 27 अक्‍टूबर को एक ऐतिहासिक टिप्‍पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश के ईशनिंदा कानून में 'बेहतरी' की मांग करने में कुछ भी आपत्‍त‍िजनक नहीं है।

पाकिस्‍तान, पाकिस्‍तान ईशनिंदा, ईशनिंदा कानून, पाकिस्‍तान ईशनिंदा कानून, blasphemy, blasphemy in Pakistan,पाकिस्‍तान के विवादास्‍पद ईशनिंदा कानून का विरोध करने की वजह से पंजाब के गवर्नर सलमान तासिर की 4 जनवरी 2011 को उनके ही गार्ड ने गोली मारकर हत्‍या कर दी थी। वारदात के बाद मौका ए वारदात की जांच करते अधिकारी (FILE PHOTO)

पाकिस्‍तान के सुप्रीम कोर्ट ने बीते 27 अक्‍टूबर को एक ऐतिहासिक टिप्‍पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश के ईशनिंदा कानून में ‘बेहतरी’ की मांग करने में कुछ भी आपत्‍त‍िजनक नहीं है। कल्‍पना कीजिए, पाकिस्‍तान के आम नागरिक को देश के सबसे बेरहम कानून की आलोचना करने का अधिकार कोर्ट के एक फैसले के बाद मिला। एक ऐसा कानून, जो निर्दोष लोगों को मौत के मुंह में ढकेल रहा है। कोर्ट ने कहा, ”ईशनिंदा कानून (पाकिस्‍तान पीनल कोर्ट की धारा 295 सी) में बदलाव की कोई मांग को इससे रजामंद न होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे कुछ लोगों द्वारा कानून के गलत इस्‍तेमाल से रोकथाम के लिए समुचित बदलाव की मांग के तौर पर देखा जाए।”

कोर्ट एक हत्‍यारे के मामले पर सुनवाई कर रहा था। दोष साबित होने के बावजूद उसे फांसी नहीं दी जा सकती थी। उसका कहना था कि उसने हत्‍या तब की, जब पीडि़त ने ईशनिंदा कानून की आलोचना की। जनवरी 2011 में मारे जाने वाले ये शख्‍स कोई और नहीं पंजाब के गवर्नर सलमान तासिर थे। कुछ कट्टरपंथी वकील और धार्मिक समुदाय के कुछ लोग इस आरोपी को मदद कर रहे थे। तासिर का हत्‍यारा पुलिस का एक जवान था, जो उनकी ही सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। तासिर एक ईसाई महिला आसिया बीवी के खिलाफ ईशनिंदा कानून के तहत चल रहे मामले में चल रही भेदभावपूर्ण न्‍यायिक प्रक्र‍िया का विरोध कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने तासिर का पक्ष लेते हुए कहा कि उनकी ओर से गई कानून की आलोचना सही थी, इसलिए पुलिसवाले को फांसी देना गलत नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, 1953 से लेकर जुलाई 2012 तक ईशनिंदा से जुड़े कानूनों के तहत 434 पर कार्रवाई हुई। इनमें से 258 मुसलमान, 114 ईसाई, 57 अहमदी जबकि चार हिंदू थे। यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि ईशनिंदा से जुड़े मामलों में इजाफा उस वक्‍त हुआ, जब 80 के दशक में जनरल जिया उल हक ईशनिंदा कानून लेकर आए। अगर हम आबादी के हिसाब से अनुपात देखें तो इसके ज्‍यादा शिकार मुसलमान नहीं, बल्‍क‍ि ईसाई और हिंदू हैं। एक पिद्दी सी दलील यह दी जा सकती है कि अगर कानून न हो तो लोग आरोपियों को मारकर खुद ही न्‍याय कर लेंगे। कानून आने काफी बाद 1990 से लेकर अब तक 52 लोगों की पैगंबर का अपमान करने के लिए हत्‍या कर दी गई। असल बात यही है कि कानून ने ही हत्‍यारों को ऐसा करने के लिए उकसाया है। अधिकतर हत्‍यारों ने किसी गुस्‍से की वजह से नहीं, बल्‍कि संपत्‍त‍ि की लालच में ऐसा किया। इस मामले में आसानी से शिकार बनने वाले पीडि़त ईसाई हैं, क्‍योंकि उनकी बस्‍त‍ियां अधिकतर मुख्‍य जगहों पर स्‍थि‍त जमीनों पर होती हैं। ईसाईयों को यह जमीन ब्रिटिश राज में लीज पर मिली थी।

2013 में 15 ईसाईयों, पांच अहमदियों और दो हिंदुओं को इस कानून के तहत जेल में डाल दिया गया, क्‍योंकि ये कथित अपराध गैर जमानती होता है। अगर यह पता चलता है कि इन लोगों को फंसाया गया तो क्‍या जज इन्‍हें जाने देंगे? भले ही जजों की अंतरात्‍मा ऐसा करने के लिए कहे, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं क्‍योंकि वे बेहद डरे हुए हैं। आज तक इसमें मिली मौत की सजा के सिर्फ एक मामले में फैसले को पलटा गया। आज 17 निर्दोष लोग अपने केस के खत्‍म होने का इंतजार कर रहे हैं। बाकी 20 को दिलासा दिया गया है कि उन्‍हें बस आजीवन कारावास होगी। ईशनिंदा के लिए अभी तक किसी को फांसी नहीं हुई है, लेकिन एक बुरे कानून की वजह से पाक में कुछ निर्दोष लोगों को अनिश्‍चित वक्‍त तक जेल में रहना पड़ रहा है।

ईशनिंदा कानून के तहत सजा दिलाने में शामिल रहे वकील या रिटायर्ड जजों को इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पीडि़त अधिकतर गरीब हैं और वे कोर्ट में प्रभावी ढंग से अपना बचाव नहीं कर सकते। दुखद की बात यह है कि अगर मानवाधिकारों में भरोसा रखने वाला कोई वकील इन गरीबों लोगों के बचाव के लिए खड़ा होता है तो उसकी भी हत्‍या हो सकती है। मुल्‍तान के रहने वाले वकील राशिद रहमान खान की पिछले साल ऐसे ही एक मामले में एक जिहादी ग्रुप ने हत्‍या कर दी थी। मौत से पहले रहमान ने कहा था, ”पाकिस्‍तान में ईशनिंदा के आरोपी को बचाने की कोशिश करना मौत के मुंह में जाने सरीखा है।” ईशनिंदा को यहां एक बहुत बड़ा अपराध माना जाता है, इसलिए जज भी आरोपी की रिहाई को लेकर डरते हैं। आरोपी को औसतन आठ साल तो जेल में बिताना ही पड़ता है। और हां, अभी तक कोई बरी नहीं हुआ। सिवाय एक केस के, जहां एक ईसाई को विदेश में शरण मिलने वाली थी। हालांकि, इसमें काफी वक्‍त लग गया, जिसका मतलब यह है कि एक निर्दोष पीडि़त की जिंदगी छोटी कर दी गई।

(लेखक ‘न्‍यूजवीक पाकिस्‍तान’ के कंसल्‍ट‍िंग एडिटर हैं)

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