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दुनिया: संबंधों का नया दौर

आधुनिक से उत्तर आधुनिक होने की राह में जिस समझ और रफ्तार के साथ दुनिया आगे बढ़ रही थी, वो सफर अब थमने जा रहा है। कोरोना पूर्व और बाद की दुनिया कैसे पहले से अलग होगी, इसके आसार दिखने भी लगे हैं। एक ‘ग्लोबल छतरी’ के नीचे खड़े होकर सबके हितों के लिए खुलापन दिखाने वाले राष्ट्र फिर से अलग-अलग राह पर चल पड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय जगत की मौजूदा और भावी हलचल के साथ बदलावों की नई तैयार हो रही जमीन पर आज का विशेष।

सांकेतिक फोटो।

विवेक ओझा

देशों के बीच द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों-सरोकारों की दुनिया कोरोना महामारी के कारण जिस तेजी से बदल रही है, वह अपूर्व है। देशों के बीच प्राथमिकताओं के नए अक्षांश-देशांतर तय हो रहे हैं। दिलचस्प है कि इन सारे बदलावों के पीछे एक नियामकीय कारक के तौर पर जो देश उभरा है, वह भारत का पड़ोसी मुल्क चीन है। कोविड-19 की उत्पत्ति के कारणों की स्वतंत्र जांच कराने की राष्ट्रों की मांग थम नहीं रही है। आरोप और प्रत्यारोप वैश्विकराजनीति में इस कदर बढ़ गए हैं कि इसने एक साथ विश्व व्यवस्था के कई आयामों को प्रभावित किया है। महामारी के साए में जहां ज्यादातर देशों में राष्ट्रवाद , धुर राष्ट्रवाद, और संरक्षणवाद की प्रवृत्तियां बढ़ी हैं, वहीं तेल के सीमित भंडार की समझ के साथ खाड़ी देशों को लेकर भी नए वैश्विक समीकरण आकार ले रहे हैं। यह स्थिति बहुत तेजी से एक नई विश्व व्यवस्था की शक्ल लेती जा रही है।

इस दौरान जहां दुनियाभर के देशों को पशुजन्य बीमारियों (जूनोटिक) से निपटने के लिए वैश्विक स्वास्थ्य साझेदारियों की महत्ता समझ में आई है, वहीं नेपाल और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देश कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर चीन को ही वैध ठहराते हुए भारत को असहज करने की कोशिश में लगे हैं। नेपाल की ‘मैपिंग पॉलिटिक्स’ और भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को विवादित करने के प्रयासों से साफ तौर पर यह जान पड़ता है कि कैसे एक अति अल्प विकसित देश की ‘एशियन ड्रैगन’ की क्षमता में आस्था है। पाकिस्तान जैसे राष्ट्र ने भी भारत के टीके के बजाय चीन की मदद से स्वदेश निर्मित कोविड टीका ‘पाकवैक’ को विकसित कर भारत को अपनी आत्मनिर्भरता की गवाही पेश की, जो सत्यापित भले न हो पर प्रचारित तथ्य तो जरूर है।
वैश्वीकरण की कलई

महामारी के दौर में विश्व में बढ़ता उग्र राष्ट्रवाद और वैश्वीकरण की धारणा पर उठे सवालों पर चर्चा जरूरी है। केनिची ओहमे ने बर्लिन की दीवार गिरने पर लिखी किताब ‘सीमारहित विश्व’ में दावा किया था कि अब दुनिया के देशों के बीच कृत्रिम भौतिक सीमाओं की जगह नहीं रह गई है। लेकिन सवाल है कि क्या कोरोना ने देशों के बीच फिर सीमाओं की रचना कर दी है? उत्तर कोरोना विश्व में क्या वैश्वीकरण की धारणा कमजोर पड़ेगी? ये प्रश्न इसलिए क्योंकि आने वाली पीढ़ी हमसे जरूर पूछेगी कि क्या महामारी के खिलाफ लड़ाई मिलकर नहीं लड़ी जा सकती थी? क्या यह मान लिया जाए कि वैश्वीकरण छलावा था और दुनिया कभी एक हुई ही नहीं थी। राष्ट्रों की सीमाएं केवल आवाजाही और व्यापार के लिए ही मुक्त थी, सहयोग तो बस दिखावा था। वैश्विक स्तर पर जिन नए बदलावों की बात हो रही है, उसके पीछे बड़ी वजह छोटे-बड़े तमाम मुल्कों की घरेलू राजनीति में आ रही नई प्रवृत्तियां है। आर्थिक राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद, सीमाओं के कठोर नियंत्रण जैसी प्रवृत्तियां आज पहले से ज्यादा मजबूत हो रही हैं।

पिछले वर्ष कुछ देश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए अधिक सतर्क हो गए और खाद्य संरक्षणवादी नीतियों को उन्होंने अपनाया। सिंगापुर के व्यापार मंत्री ने खाद्यान्न को लेकर संरक्षणवादी मानसिकता के प्रति चिंता जाहिर करते हुए संशय भी जताया कि इससे वैश्विक आपूर्ति तंत्र प्रभावित हो जाएगा। आलम तो यह रहा कि कई देशों ने तो अपनी खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर अन्य देशों को खाद्यान्न निर्यात करना तक बंद कर दिया। वियतनाम ने जहां चावल निर्यात पर नियंत्रण लगाया तो वहीं रूस ने प्रसंस्कृत अनाज के निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। इस स्थिति ने वैश्विक आपूर्ति शृृंखला की कमजोरी को भी उजागर किया क्योंकि अब ‘नेशन फर्स्ट’ के दौर में शायद ही कोई देश अपने लिए जरूरी सेवाओं को दूसरे देशों को उपलब्ध कराएगा।

संरक्षणवादी जोर

बढ़ती संरक्षणवादी मानसिकता इस रूप में भी चिंता का विषय बन सकती है कि अति महत्त्वपूर्ण चिकित्सकीय सामग्रियों की आपूर्ति और उनका वैश्विकउत्पादन कुछ देशों में ही केंद्रित है। इनमें मुख्य रूप से जर्मनी, अमेरिका और स्विट्जरलैंड शामिल हैं जो 35 फीसद चिकित्सकीय उत्पादों की आपूर्ति करते हैं। इसी तरह ‘पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट’ यानी पीपीई का निर्यात भी कुछ प्रमुख देशों तक ही सीमित है। जब कोरोना अमेरिका में अपने तांडवी रूप में नहीं पहुंचा था तो अमेरिका ने चीन से आयात किए जाने वाले चिकित्सकीय उत्पादों पर लगभग पांच बिलियन डॉलर का शुल्क लगाया था। यही नहीं, अमेरिका ने चिकित्सकीय उपकरणों की आपूर्ति और निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाने पर विचार किया था। बाद में महामारी की भीषण चपेट में आने पर अमेरिका की अकड़ थोड़ी ढीली पड़ी।

कोरोना आपदा का एक और बड़ा प्रभाव देखें तो इसने फिर से राज्य को अपनी पुरानी भूमिका में लौटा दिया है। सरकारें इस बदलाव का फायदा भी उठा रही हैं और जनता से मिली इस नई वैधता के आधार पर अंध राष्ट्रवाद को बल देते हुए अपने अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से बच रही हैं। अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की सहायता राशि रोक दी, तो वहीं जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने इस आपदा के दौरान जब देश को संबोधित किया तो एक बार भी यूरोपीय संघ का जिक्र तक नहीं किया। यहां तक कि पोलेंड, इटली, और स्पेन जैसे देशों ने भी यूरोपीय संघ की निष्क्रियता की खुलकर आलोचना की।

लिहाजा वैश्वीकरण की चल रही प्रक्रिया के आगे अब राष्ट्रों का कठोर संरक्षणवादी रवैया हावी होगा और इसी आधार पर कुछ देशों के नए समूह उभरेंगे। दुनियाभर में जिस तरह संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के साथ सरकारें काम कर रही हैं उसका एक अमानवीय पक्ष यह है कि शरणार्थियों की बेचारगी अब और बढ़ जाएगी। इस दौरान तो कुछ देश वैध प्रवासियों का भी विरोध करते देखे गए। संयुक्तअरब अमीरात ने पिछले साल आदेश दिया था कि भारतीय प्रवासियों को महामारी के इस कठिन दौर में अपने देश वापस जाना होगा। उसकी यह हिदायत कितनी कठोर थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां की सरकार ने भारत सहित सभी देशों को संकेत दिया था कि यदि ये देश अपने नागरिकों की वापसी कराने में आनाकानी करते हैं तो उन्हें कठोर प्रतिबंधों को झेलना पड़ सकता है।

चीनी ताकत और हिमाकत

2008 की आर्थिक मंदी के बाद से ही चीन ने अपने एशियाई स्वप्न के सहारे विश्व की महाशक्तिबनने की दौड़ में खुद को शामिल कर लिया था। इस दौरान चीन ने काफी हद तक सफलता भी हासिल कर ली, क्योंकि मंदी का शिकार अमेरिका अपनी अंतर्मुखी नीति के जरिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीतियों को बढ़ावा दे रहा था। इस नीति के तहत उसने वैश्विक स्तर पर अपने बढ़ते आर्थिक और सैन्य बोझ को कम करना शुरू कर दिया। इसी क्रम में वह आर्थिक बोझ से बचने के लिए पेरिस सम्मेलन से बाहर निकला और फिर यूनेस्को, मानवाधिकार परिषद जैसे संगठनों से भी बाहर आया। अलबत्ता वहां के नए राष्ट्रपति अब जरूर फिर से समन्वयवादी राह पर चलना चाह रहे हैं।

इस दौरान चीन ने अमेरिका की वैश्विक राजनीति में बढ़ती निष्क्रियता का लाभ उठाते हुए विश्व में शक्ति निर्वात को भरने की कोशिशें तेज कर दीं। कोरोना के प्रसार के लिए जिम्मेदार देश के तौर पर आज दुनियाभर में चीन को लेकर सख्ती और कड़वाहट जरूर बढ़ी है पर जमीनी स्थिति यह है कि वह दक्षिण एशिया के कई देशों का खैरख्वाह है। ये देश चीनी मदद के जाल में इस तरह फंस चुके हैं कि वे अपनी सरहद की हिफाजत तक के लिए भी उस पर निर्भर हैं। यह स्थिति निकट भविष्य में तो बदलती नहीं दिख रही है। इस लिहाज से देखें तो भारत के लिए दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति को रणनीतिक तौर पर मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।

पानी पर मनमानी

कोरोना संकट के बीच दुनियाभर में ‘व्यापार युद्ध’ और ‘संसाधन संघर्ष’ को भी खासी गति मिल रही है। महामारी की गंभीर आपदा के बीच ही चीन ने मेकांग नदी का पानी रोक दिया था, जिससे चार दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में सूखे की संभावना गहरा गई। मेंकांग के पानी के प्रवाह को कम कर चीन ने थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम को भारी मुश्किल में डाल दिया था। इन देशों के किसानों और मछुवारों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ा। लाओस में इन समुदायों ने चीन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन भी किया।

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