बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बनने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है। बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी की कमान तारिक रहमान के हाथों में थी। बीएनपी इससे पहले भी बांग्लादेश में सरकार बना चुकी है। खुद तारिक रहमान की मां खालिदा जिया तीन बार बांग्लादेश की कमान संभाल चुकी हैं। खालिदा जिया का इस चुनाव से ठीक पहले निधन हो गया।

खालिदा जिया के शासन काल में बांग्लादेश और भारत के संबंध बेहद निचले पायदान पर चले गए। तब भारत की तरफ से बांग्लादेश पर पाकिस्तान के प्रॉक्सी के रूप में लड़ने का भी आरोप लगाया गया। उस समय असम और अन्य नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में ULFA और NDFB जैसे अलगाववादी और अलगाववादी ग्रुप भी उभरे।

आइए नजर डालते हैं खालिदा जिया के शासन काल में कैसे थे भारत- बांग्लादेश के संबंध…

खालिदा जिया के पति जनरल जियाउर रहमान का झुकाव चीन के अलावा पश्चिम और पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों की तरफ था। 1981 में जनरल जियाउर रहमान की हत्या के बाद खालिदा की बांग्लादेश की राजनीति में एंंट्री हुई।

खालिदा जिया पहली बार साल 1991 में बांग्लादेश की पीएम बनीं। तब चुनाव से पहले बीएनपी की रैलियों में कहा जाता था कि आवामी लीग सरकार बांग्लादेश को भारत की ‘जंजीरों में जकड़’ देगी। भारत के खिलाफ शुरुआती विरोध वाले फैसलों में उत्तर-पूर्वी राज्यों को जमीन से जाने की इजाजत न देना भी शामिल था। उनका कहना था कि ये बांग्लादेश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा है।

गंगा जल बंटवारे पर भारत से नहीं बनी

इसके अलावा फरक्का बैराज और ट्रांजिट पर उनकी सरकार के रुख ने बांग्लादेश में यह बात फैलाई कि देश के हितों की रक्षा के लिए भारत की रिक्वेस्ट को नकारना जरूरी है। 1976 में शुरू हुआ फरक्का बैराज विवाद खालिदा जिया के समय में भी जारी रहा जबकि इस बीच दोतरफा समझौतों पर साइन हुए थे।

खालिदा जिया 1992 में पानी के बंटवारे से जुड़ा विषय सुलझाने के लिए भारत का दौरा किया। इस दौरान एक जॉइंट स्टेटमेंट साइन किया गया, जिसमें बराबर और लंबे समय तक चलने वाले पानी के बंटवारे के समझौते पर पहुंचने के लिए आपसी कोशिशों पर सहमति जताई गई थी। इसका शेख हसीना की अगुआई वाली अवामी लीग ने विरोध किया। जिसने कहा कि वह भारत से ‘एक मग पानी भी’ लाने में नाकाम रही हैं।

दूसरे कार्यकाल में रसातल पर चले गए रिश्ते

इससे खालिदा जिया बैकफुट पर आ गईं और उन्होंने आगे की बातचीत पर साइन करने से परहेज किया। इसके बाद 1996 में सत्ता में आने पर शेख हसीना ने भारत के साथ ऐतिहासिक गंगा जल संधि पर साइन किए। साल 2001 में जब खालिदा जिया एक बार फिर सत्ता में आईं, तब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते तकरीबन रसातल में चले गए।

तब भारत के अधिकारियों ने बांग्लादेश पर पूर्वोत्तर में उग्रवादी गतिविधियों को पनाह देने का आरोप लगाया। इस दौरान कनेक्टिविटी और रीजनल कोऑपरेशन की कोशिशें काफी हद तक रुकी रहीं। इसके अलावा खालिदा जिया ने 1972 की भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप ट्रीटी को रिन्यू करने का भी विरोध किया। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता के खिलाफ बताया।

क्या तारिक रहमान भी अपनी मां की तरह भारत विरोधी रुख अपनाएंगे?

इस सवाल का जवाब आने वाले समय में ही पता चलेगा लेकिन चुनावी रैलियों के दौरान उनके भाषणों पर नजर डाले तो पता चलता है कि अगर वो भारत से दूरी बनाएंगे तो पाकिस्तान के भी करीब नहीं जाएंंगे। तारिक रहमान ने अपनी चुनावी रैलियों में ‘न दिल्ली, न पिंडी – सिर्फ ढाका’ का नारा दिया था।

तारिक रहमान के लिए भारत विरोधी रुख अपनाना कई वजहों से आसान नहीं होगा। इसकी चार प्रमुख वजह हैं – बांग्लादेश की भौगोलिक और आर्थिक वास्तविकता, सुरक्षा और सीमा से जुड़े मुद्दे, पानी व नदी समझौते और कूटनीतिक संतुलन।

बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा है। भारत व्यापार और ट्रांजिट के अलावा बिजली के लिए बांग्लादेश की जरूरत है। दोनों देश रेल, सड़क और जलमार्ग से जुड़े हैं। इसके अलावा चार हजार किलोमीटर की सीमा होने की वजह से दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे बॉर्डर मैनेजमेंट, अवैध तस्करी, उग्रवाद और रोहिंग्या शरणार्थी जैसे मुद्दों पर एक-दूसरे का सहयोग करें।

पानी से जुड़े मुद्दे पर भी द्विपक्षीय बातचीत पर ही निर्भर हैं। यहां बांग्लादेश के लिए भारत को अनदेखा करना बिलकुल भी व्यावहारिक नहीं है। इसके अलावा अगर तारिक रहमान चीन, अमेरिका और अन्य देशों के ज्यादा करीब जाते हैं तो भारत को दरकिनार करने की कोशिश करते हैं तो यह बांग्लादेश के लिए का कूटनीतिक संतुलन बिगाड़ सकता है। कोई भी सरकार आमतौर पर ‘संतुलित विदेश नीति’ ही अपनाती है, ऐसे में बांग्लादेश के लिए भारत को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। 

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