बांग्लादेश चुनाव के नतीजे आ गए हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) स्पष्ट जीत की ओर बढ़ चुकी है। 200 से ज्यादा सीटों पर उसकी मजबूत बढ़त बनी हुई है। दूसरे नंबर पर जमात-ए-इस्लामी है, जो अब विपक्ष की भूमिका निभाती नजर आएगी।
लेकिन इस चुनाव में एक और ताकत थी, जिसकी काफी चर्चा हुई- नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी)। यह वही पार्टी है, जिसका गठन कुछ समय पहले ही हुआ था। दरअसल, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन शुरू किया था। उसी आंदोलन के बाद शेख हसीना की कुर्सी गई और छात्रों ने मिलकर नेशनल सिटिजन पार्टी बना ली।
कैसा रहा एनसीपी का प्रदर्शन?
इस पार्टी ने भी चुनाव लड़ने का फैसला किया, लेकिन बांग्लादेश चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि छात्रों की यह पार्टी बुरी तरह फ्लॉप रही। एनसीपी ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन वह महज पांच सीटों पर ही अपनी बढ़त बना पाई। पार्टी को बांग्लादेश में युवाओं का बड़ा प्रतीक माना जा रहा था, लेकिन जानकारी के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी के साथ हाथ मिलाने की वजह से उसकी विचारधारा धुंधली हो गई। इसका असर चुनाव परिणामों में भी साफ दिखाई दे रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान भी कई महिला नेताओं ने एनसीपी का साथ छोड़ दिया था। उनका तर्क था कि जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर पार्टी ने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता कर लिया।
नाहिद इस्लाम हारे या जीते?
हालांकि, नई पार्टी के लिए राहत की बात यह है कि उसके प्रमुख नाहिद इस्लाम ने ढाका-11 सीट से करीब 2000 वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। इस सीट पर जीत इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यहां अब तक अवामी लीग का मजबूत प्रभाव रहा है। चूंकि इस बार अवामी लीग चुनाव नहीं लड़ रही थी, ऐसे में एनसीपी के लिए मौका बना और नाहिद इस्लाम ने जीत दर्ज की।
चुनाव में हुई धांधली?
फिलहाल बाकी सीटों पर छात्रों की इस पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। पार्टी के नेता आरोप लगा रहे हैं कि कई सीटों पर फर्जीवाड़ा हुआ है। पार्टी के प्रवक्ता आसिफ मोहम्मद ने दावा किया है कि ढाका-13, 15, 16 और 17 जैसी सीटों पर नतीजों के साथ छेड़छाड़ की गई। ढाका-15 का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां जमात के उम्मीदवार 20,000 वोटों से आगे चल रहे थे, लेकिन चुनाव आयोग ने बीएनपी प्रत्याशी को विजेता घोषित कर दिया।
फिलहाल एनसीपी दोबारा मतगणना की मांग कर रही है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णायक चुनाव में छात्रों की पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन बांग्लादेश की जनता के मूड को भी दर्शाता है।
