नेपाल में मार्च चुनाव के बाद जब रैपर से नेता बने बालेंद्र शाह उर्फ ‘बालेन’ प्रधानमंत्री बने, तब इसे पुरानी राजनीति के खिलाफ युवाओं की बड़ी जीत माना गया था। उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 181 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले, सीधे बोलने वाले और सिस्टम बदलने का दावा करने वाले शाह से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन सत्ता संभालने के दो महीने के भीतर ही उनकी सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।
सरकार पर सबसे बड़ा आरोप अध्यादेशों के जरिए फैसले लेने का है। संसद सत्र शुरू होने वाला था, लेकिन सरकार ने 30 अप्रैल से शुरू होने वाला सत्र टालकर 11 मई कर दिया। इस 12 दिन के अंतराल में सरकार ने आठ अध्यादेश लागू कर दिए। विपक्ष के साथ-साथ शाह के समर्थकों ने भी इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश बताया। आलोचकों का कहना है कि जो नेता व्यवस्था बदलने आए थे, वही अब पुराने सत्ता तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री को वीटो जैसी ताकत देने की भी कोशिश
सबसे ज्यादा विवाद संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश पर हुआ। यही परिषद नेपाल के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के जजों, संवैधानिक निकायों के प्रमुखों और राजदूतों के नाम तय करती है। नए अध्यादेश में प्रधानमंत्री को वीटो जैसी ताकत देने की कोशिश की गई। यानी अगर परिषद में मत बराबर बंट जाएं, तो प्रधानमंत्री की राय अंतिम मानी जाएगी। यहां तक कि बहुमत उनके खिलाफ हो, तब भी वे फैसला पलट सकते हैं।
ऊपरी सदन के अध्यक्ष नारायण दहाल और सदस्य भीष्मराज आंगदाम्बे ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि नेपाल में अब तक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर होती रही है और उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी इस अध्यादेश को वापस भेजकर दोबारा विचार करने को कहा, लेकिन सरकार ने बिना बदलाव के फिर भेज दिया, जिसके बाद राष्ट्रपति को मंजूरी देनी पड़ी।
इसके बाद संवैधानिक परिषद ने डॉ. मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी। इसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना मल्ल प्रधान समेत तीन वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज किया गया। नेपाल में न्यायिक नियुक्तियों में वरिष्ठता तोड़ने की यह बहुत दुर्लभ घटना मानी जा रही है। अब इस नियुक्ति को संसदीय समिति की मंजूरी का इंतजार है।
नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सपना मल्ल प्रधान नेपाल की दूसरी महिला मुख्य न्यायाधीश बन सकती थीं और उन्हें दरकिनार करना देश की करोड़ों महिलाओं का अपमान है। सुशीला कार्की वही जज हैं जिन्होंने सत्ता हस्तांतरण और चुनाव के दौरान अंतरिम प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी भी निभाई थी।
राजनीतिक नियुक्ति के नाम पर 1600 लोगों की नौकरियां खत्म कीं
सरकार ने एक और अध्यादेश के जरिए संवैधानिक निकायों, सरकारी बोर्डों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्त करीब 1600 लोगों की सेवाएं खत्म कर दीं। सरकार का कहना था कि ये राजनीतिक नियुक्तियां थीं और प्रशासन को “राजनीति मुक्त” बनाने के लिए यह कदम जरूरी था। इसी तरह छात्र संगठनों, सरकारी कर्मचारी यूनियनों और अस्पताल कर्मचारियों के यूनियनों समेत कई संगठनों पर रोक लगाने का भी फैसला लिया गया। लेकिन नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी।
शाह सरकार की मुश्किलें सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहीं। काठमांडू घाटी में बागमती नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान ने भी बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। कई जगह झुग्गियां और मकान तोड़े गए। मामला तब और गंभीर हो गया जब बेघर हुए दो लोगों की आत्महत्या की खबरें सामने आईं। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने सरकार पर बिना पुनर्वास के कार्रवाई करने का आरोप लगाया।
इस पूरे विवाद के दौरान बालेन शाह लंबे समय तक चुप रहे। बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से बयान जारी हुआ कि भूमिहीन लोगों का मामला स्थानीय निकाय तय करेंगे और केंद्र सरकार सिर्फ मदद करेगी। बाद में शाह ने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार “असली” भूमिहीन लोगों को बसाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले “फर्जी” भूमिहीनों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी थी।
सरकार के कुछ कदम कारोबारी जगत को भी परेशान कर रहे हैं। उद्योग वाणिज्य महासंघ के पूर्व अध्यक्ष शेखर गोल्छा समेत दो बड़े कारोबारियों को कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप में हिरासत में लिया गया। हालांकि अदालत ने चार दिन बाद कहा कि जांच के लिए उन्हें लगातार हिरासत में रखना जरूरी नहीं है। इसके बाद सरकार को नुकसान नियंत्रण करना पड़ा और वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले की व्यापारियों के साथ लगातार बैठकें शुरू हुईं, ताकि निवेशकों का भरोसा बना रहे।
विदेश नीति के मोर्चे पर भी शाह सरकार अनुभवहीन नजर आई। 8 अप्रैल को बालेन शाह ने 17 देशों के राजदूतों से मुलाकात कर नेपाल के द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रिश्ते मजबूत करने की बात कही थी। लेकिन कुछ ही समय बाद भारत और चीन ने लिपुलेख रास्ते को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए खोलने की घोषणा कर दी। नेपाल इस इलाके पर अपना दावा करता है। इसके विरोध में काठमांडू ने दोनों देशों को कूटनीतिक नोट भेजा।
भारत के साथ भी हाल में एक अनावश्यक विवाद पैदा हो गया। भारत के विदेश सचिव विवेक मिश्री की 11 मई की काठमांडू यात्रा टल गई। माना जा रहा है कि इसकी वजह बालेन शाह का यह फैसला था कि वे एक साल तक कोई विदेश यात्रा नहीं करेंगे और सिर्फ मंत्री स्तर या उससे ऊपर के विदेशी मेहमानों से ही मिलेंगे। बताया जाता है कि उनके कई मंत्रियों ने उन्हें व्यवहारिक रवैया अपनाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने अभी तक इस पर ध्यान नहीं दिया है।
उधर, चीन भी नेपाल में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव को लेकर असहज है। नेपाल ने अमेरिका के 55 करोड़ डॉलर वाले ‘मिलेनियम चैलेंज’ कार्यक्रम के तहत ऊर्जा, सड़क और ट्रांसमिशन परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति दी है। इसके बाद नेपाल अब चीन के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक नेपाल ने चीन को भरोसा दिलाया है कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव समेत कई द्विपक्षीय परियोजनाओं पर आगे बढ़ने की कोशिश जारी रहेगी।
कुल मिलाकर, बालेन शाह जिस बदलाव और नई राजनीति के वादे के साथ सत्ता में आए थे, अब उसी पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। युवाओं की उम्मीदों का चेहरा मानी जा रही यह सरकार फिलहाल अपने फैसलों, विवादों और अनुभव की कमी से जूझती नजर आ रही है।
