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बस 160 मीटर दूर ग‍िरा था परमाणु बम, पर सलामत रही हिरोशिमा की यह बिल्डिंग

6 अगसत, 1945 को हुए हमले में 1.5 लाख लोग मरे थे, जमींदोज हो गईं थीं शहर की दो तिहाई इमारतें।

हिरोशिमा शहर में स्थित वो इमारत जो परमाणु बम को भी झेल गया (फोटो-विजिटहिरोशिमा डॉट नेट)

6 अगस्त 1945 का दिन था। जापान का हिरोशिमा शहर द्वितीय विश्व युद्ध के खौफ के साये में था। 6 अगस्त की सुबह हिरोशिमा शहर का आसमान साफ था। सुबह सवा आठ बजे मानव इतिहास का पहला परमाणु बम अमेरिका ने इस शहर पर गिराया। रिपोर्ट्स बताते हैं कि लोगों को ऐसा लगा जैसे उन्हें आग के लावे में डाल दिया गया हो। हम यहां चर्चा कर रहे हैं हिरोशिमा के उस इमारत की जो कि परमाणु बम फटने वाली जगह के लगभग ठीक नीचे था, लेकिन परमाणु बम की ‘अपरिमित’ शक्ति भी इस बिल्डिंग को नष्ट नहीं कर सकी। ये बिल्डिंग आज भी हिरोशिमा में अपनी जगह पर खड़ा है। इस बिल्डिंग को आज एटॉमिक बम डोम (परमाणु बम गुम्बद) के नाम से जाना जाता है। हिरोशिमा के निवासियों ने अपने जख्मों के इस साक्षात सबूत को सहेज कर रखने का फैसला किया है। इस बिल्डिंग को 1996 में वर्ल्ड हेरिटेज साइज घोषित किया गया।

अमेरिका द्वारा गिराया गया परमाणु बम 600 मीटर की ऊंचाई पर फटा था। परमाणु बम इस इमारत से लगभग 160 मीटर दक्षिण पूर्ण में फटा था। उस वक्त ये इमारत हिरोशिमा का परफेक्चरल इंडस्ट्रियल परमोशन हॉल था। हिरोशिमा की अंग्रेजी वेबसाइट विजिटहिरोशिमा डॉट नेट की एक रिपोर्ट के मुताबक जब बम का डिटोनेशन किया गया तो उससे प्रति वर्ग मीटर 35 टन प्रेशर का निर्माण हुआ, और वहां पर 440 मीटर प्रति सकेंडे की प्रलयंकारी हवा बही। कमाल की बात ये थी कि ये इमारत इस शक्तिशाली विस्फोट और दहकते लावे से भी अधिक की गर्मी को बर्दाश्त कर गया, हालांकि उस वक्त ये आग का गोला बन गया था। विशेषज्ञ मानते हैं कि चूंकि धमाका बिल्डिंग की गुम्बद के ठीक ऊपर हुआ था, इसलिए बिल्डिंग की मोटी दीवारें और स्टील का बना गुम्बद इस विध्वंसकारी ताकत को बर्दाश्त कर गया और ये पूर्ण रुप से नष्ट नहीं हुआ। हालांकि उस वक्त जो लोग इस बिल्डिंग के अंदर थे वे तुरंत मारे गये, बिल्डिंग की आतंरिक साज-सज्जा आग में जलकर खाक हो गई। कुछ सालों के बाद इस बिल्डिंग के खंडहर को एटॉमिक बम डोम के नाम से जाना जाने लगा।

एटॉमिक बम डोम को निहारती एक महिला (हिरोशिमा शहर में स्थित वो इमारत जो परमाणु बम को भी झेल गया (फोटो-विजिटहिरोशिमा डॉट नेट)

जापान में लगातार आते भूकंप के झटके के बीच इस बिल्डिंग को इसके वास्तविक रुप में सहेज कर रखना जापानी इंजीनियरों के लिए चुनौती से कम नहीं है। दरअसल एक जापानी स्कूल लड़की की दर्दभरी डायरी को पढ़ने के बाद ही इसे स्मारक के रुप में सहेजने का फैसला लिया गया। हिरोको नाम की ये बच्ची विस्फोट के बाद रेडिएशन की चपेट में आ गई थी। बाद में 16 साल की उम्र में ल्यूकेमिया की वजह से इस लड़की की मौत हो गई थी। बता दें कि इस परमाणु बम हमले में लगभग 1,50,000 लोग मारे गये थे। जबकि घायलों की संख्या भी लाखों में थी।

 

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