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अर्मेनिया और अजरबैजान संघर्षविराम के लिए राजी, जानें किस बात पर ठना विवाद?

अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नगोरनो-काराबाख का इलाका पड़ता है, जो कि मुख्यतः अजरबैजान का हिस्सा रहा है, पर इसकी ज्यादातर आबादी अर्मेनियाई लोगों की है, इसी को लेकर दोनों के बीच विवाद है।

Azerbaijan, Armeniaअजरबैजान और अर्मेनिया के बीच सितंबर में युद्ध तक हालात पहुंच गए थे, हालांकि रूस के हस्तक्षेप के बाद दोनों देशों के बीच वार्ता शुरू हुई है। (फोटो- एपी)

अर्मेनिया और अजरबैजान ने कहा कि वे नागोरनो-काराबाख में संघर्षविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देश वार्ता के लिए शनिवार दोपहर बैठक शुरू करेंगे। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने एक वक्तव्य में कहा कि संघर्षविराम का मकसद कैदियों की अदला-बदली करना और शवों को लेना है। इसमें कहा गया कि अन्य बातों पर सहमति बाद में बनेगी। अर्मेनिया और अजरबैजान के विदेश मंत्रियों के बीच यह वार्ता रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर हुई।

इस घोषणा से पहले मास्को में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की देखरेख में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच 10 घंटे तक वार्ता हुई थी। लावरोव ने कहा कि यह संघर्षविराम विवाद निपटाने के लिए वार्ता का मार्ग प्रशस्त करेगा। नागोरनो-काराबाख क्षेत्र में 27 सितंबर को दोनों देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ था, यह क्षेत्र अजरबैजान के तहत आता है लेकिन इस पर स्थानीय आर्मीनियाई बलों का नियंत्रण है। यह 1994 में खत्म हुए युद्ध के बाद इस इलाके में सबसे गंभीर संघर्ष है। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।

क्यों ठना है विवाद?: दरअसल अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच एक क्षेत्र पड़ता है, जिसका नाम है नगोरनो-काराबाख। यह इलाका मुख्यतः अजरबैजान का हिस्सा रहा है, पर इसकी ज्यादातर आबादी अर्मेनियाई लोगों की है। 1980-90 के दशक में सोवियत संघ से टूटने के बाद जब अजरबैजान और अर्मेनिया अलग हुए, तो नगोरनो-काराबख ने जनमत संग्रह में अर्मेनिया के साथ जाने का फैसला किया।

इसके चलते दोनों देशों में युद्ध छिड़ गया था। रूस के हस्तक्षेप के बाद 1994 में दोनों देशों ने सीजफायर का ऐलान किया। लेकिन नगोरनो-काराबाख को अर्मेनिया का हिस्सा नहीं बनाया जा सका और यह अजरबैजान के साथ ही रह गया। एक मुश्किल यह रही है कि नगोरनो-काराबाख लंबे समय से अर्मेनियाई अलगाववादियों द्वारा ही शासित रहा है। पिछले कई सालों में समझौते की कोशिशें नाकाम रहीं और दोनों के बीच शांति समझौता नहीं हो पाया।

अजरबैजान और अर्मेनिया की वजह से तुर्की और रूस में भी हो सकता है आमना-सामना: 1991 में जब अजरबैजान और अर्मेनिया अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। अजरबैजान मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल देश बना, जबकि अर्मेनिया की आबादी मुख्यतः इसाई है। ऐसे में पड़ोसी तुर्की का समर्थन धार्मिक आधार पर अजरबैजान को ज्यादा है। तुर्की पहला देश था, जिसने 1991 में अजरबैजान को स्वतंत्र देश माना था। 1993 में तुर्की ने अर्मेनिया से अपनी सीमाओं को भी बंद कर दिया था। तुर्की अब भी अर्मेनिया के साथ आधिकारिक रिश्ते नहीं रखता। हालांकि, क्षेत्र में इसाई बहुल रूस में अर्मेनिया का समर्थन बढ़ा है। रूस का अर्मेनिया में मिलिट्री बेस भी है और दोनों सैन्य गठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे में अगर अजरबैजान और अर्मेनिया के बीच युद्ध जारी रहता, तो तुर्की और रूस के आमने-सामने आने की संभावना प्रबल थीं।

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