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अमेरिका-ईरान संकट: रिश्तों पर तेल की धार, जानें क्या कहते हैं जानकार

अमेरिका में युद्ध की तैयारी के संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं। अमेरिका के कार्यवाहक रक्षामंत्री ने रक्षा तैयारियों की एक योजना प्रस्तुत करते हुए बताया है कि अमेरिका के एक लाख 20 हजार सैनिकों को खाड़ी में भेजा जा सकता है। ऐसे में हालात गंभीर हो सकते हैं।

Author May 28, 2019 6:02 AM
भारत ने वेनेजुएला से भी कच्चा तेल खरीदना बंद कर रखा है।

अमेरिका के प्रतिबंधों से मिली छूट की अवधि इस महीने की शुरुआत में खत्म होने के बाद भारत ने ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है। भारत ने वेनेजुएला से भी कच्चा तेल खरीदना बंद कर रखा है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है और यह अपनी जरूरतों का 80 फीसद तेल आयात करता है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में कोई छोटी-सी घटना चिंगारी का काम कर सकती है। ऐसे में भारत के सामने कई राजनयिक और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की नौबत आ सकती हैं।

भारत पर असर
वैकल्पिक इंतजाम के तहत अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदना भारत के लिए मुश्किल नहीं है। लेकिन ईरान से हमें जिन अनुकूल शर्तों पर तेल मिलता था, वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। ईरान से मिलने वाले तेल के दामों में काफी स्थिरता थी। उसके लिए भुगतान की अवधि भी लंबी थी और उसकी सुरक्षित आपूर्ति के लिए बीमा आदि की सुविधाएं भी थीं। अमेरिकी कंपनियां भारत को तेल बेचने के लिए उतावली हैं। वे हमें ईरान के दामों पर तेल बेचेंगी, यह गारंटी नहीं है।

खाड़ी में कार्यरत भारतीय
भारत के सामने दूसरी कठिनाई खाड़ी के देशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है। खाड़ी क्षेत्र में लगभग 80 लाख भारतीय कार्यरत हैं। अगर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है तो खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

अमेरिका-ईरान तनाव
अमेरिका में युद्ध की तैयारी के संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं। अमेरिका के कार्यवाहक रक्षामंत्री ने रक्षा तैयारियों की एक योजना प्रस्तुत करते हुए बताया है कि अमेरिका के एक लाख 20 हजार सैनिकों को खाड़ी में भेजा जा सकता है। ऐसे में हालात गंभीर हो सकते हैं। अमेरिका ने 2003 में जब ईरान पर हमला किया था तो उसमें एक लाख 30 हजार अमेरिकी सैनिकों का इस्तेमाल किया गया था। कूटनीतिक रूप से यह परिस्थिति भारत के लिए किसी तूफान से कम नहीं होगी। भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे जिससे अर्थव्यवस्था मंद पड़ जाएगी।

राजनयिक कवायद
भारत ने खुद को अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब के पीछे खड़ा कर लिया है, जो ईरान पर चौतरफा दबाव बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। ट्रंप प्रशासन ने ही ईरान के साथ 2015 के परमाणु समझौते को रद्द कर दिया था और तेहरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था। दरअसल, ईरान ने भांप लिया है कि यूएस-सऊदी-इजरायल का गठजोड़ की महत्वाकांक्षाएं परमाणु समझौते से ज्यादा उसकी विदेश और सुरक्षा नीति पर लगाम लगाने को लेकर है। साथ ही, अमेरिका के सहयोगी यूरोपीय देश इस गठजोड़ के साथ आने से इनकार कर चुके हैं। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ईरान समझौते पर अमेरिका से अलग रास्ते पर चल रहे हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका के प्रतिबंधों को यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन चुनौती दे सकते हैं।

चाबहार की चुनौती
भारत के सामने बड़ी राजनयिक चुनौती वहां के चाबहार बंदरगाह परियोजना में अपने घरेलू हितों को सुरक्षित रखने की है। चाबहार बंदरगाह का निर्माण करके भारत ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए अपना रास्ता खोला है। ईरान के विदेश मंत्री जवाद जरीफ की हाल की भारत यात्रा के दौरान तेल आयात के बरक्स चाबहार का मुद्दा उठा था। भारत ने जब स्पष्ट किया कि ईरान से तेल की खरीद बिल्कुल बंद करने के अमेरिकी दबाव को देखते हुए हमारे विकल्प सीमित हैं, तब ईरान ने पाकिस्तान से गलबहियां बढ़ानी शुरू की। जावेद जरीफ ने पाकिस्तान जाकर चाबहार बंदरगाह और ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने की पेशकश कर दी। ऐसे में जब चीन अपनी बेल्ट एंड रोड के तहत ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है, चाबहार और ग्वादर के जुड़ने से भारतीय हितों को नुकसान पहुंचेगा।

ईरान भारत का खास रणनीतिक और ऊर्जा साझीदार है। ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों को माने जाने से भारत को नुकसान पहुंचा है। भारत को दिखाना होगा कि विदेश नीति और उसके हित अमेरिका, सऊदी अरब और इजरायल के हिसाब से तय नहीं होंगे।
– एमके भद्रकुमार, पूर्व राजनयिक

चीजें उतनी सरल नहीं हैं, जितना दिखती हैं। ईरान पर लगाए गए पुराने प्रतिबंधों और हाल के प्रतिबंध में फर्क। पुराने प्रतिबंध बहुत से देशों ने मिल-जुल कर लगाए थे। इस बार यूरोपीय संघ जैसे बड़े ब्लॉक शामिल नहीं हैं। अमेरिका की तरफ से एकतरफा प्रतिबंध हैं। अमरीका और भारत के सामरिक संबंधों को देखते हुए हमें थोड़ी दुविधा होना लाजिमी है।
– नरेंद्र तनेजा, फिक्की हाइड्रोकार्बन कमेटी के सह अध्यक्ष

ईरान और भारत के बीच दोनों देशों के बीच तेल के व्यापार से ज्यादा का रिश्ता है। दोनों देशों में सांस्कृतिक और धार्मिक घनिष्ठता भी रही है। अर्थशास्त्र जरूरी है, लेकिन तेल ही सब कुछ नहीं।
– प्रोफेसर राहुल त्रिपाठी, अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग, गोवा विवि

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