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पोर्न फिल्‍मों में काम करने के लिए अफगानिस्तानी लड़की ने छोड़ा इस्‍लाम, बताई वजह

यास्मीना अली ने कहा इस्लाम उनके जैविक माता-पिता द्वार उन्हें मजबूर करता है। बचपन में पहले अफगानिस्तान में फिर किशोर अवस्था में ब्रिटेन में।

Yasmeena Aliआज यास्मीना पोर्न फिल्मों की दुनिया में अच्छा खासा नाम कमा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कुछ लोग उनकी इस कहानी से असहज होंगे। यहां तक की कुछ उदारवादी लोगों के लिए यह असुविधाजनक लगेगा। मगर यह उनकी बदली हुई सहिष्णुता कारण है। (फोटो सोर्स twitter.com/yasmeenamodel)

इन दिनों पोर्न फिल्मों में काम कर रही अफगानिस्तानी मूल की एक लड़की हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई है। सोशल मीडिया में सुर्खियां बटोर चुकी पोर्न स्टार यास्मीना अली ने खुद अपनी दास्तान बताई है। spectator.us न्यूज के मुताबिक  यास्मीना अली ने बताया कि वह युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में पैदा हुईं। उस वक्त देश के अधिकतर हिस्से में आतंकी संगठन तालिबान का शासन था। हालांकि बाद में वह करीब 9 साल की उम्र में ब्रिटेन आकर बस गईं। आज यास्मीना पोर्न फिल्मों की दुनिया में अच्छा खासा नाम कमा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कुछ लोग उनकी इस कहानी से असहज होंगे। यहां तक की कुछ उदारवादी लोगों के लिए यह असुविधाजनक लगेगा। मगर यह उनकी बदली हुई सहिष्णुता कारण है।

इस्लाम धर्म पर कटाक्ष करते हुए  यास्मीना ने बताया, ‘मैंने देखा है कि इस्लाम आमतौर पर महिलाओं पर लगाए प्रतिबंधों से आंख बंद कर लेता है। जैसे ड्रेस कोड, इसमें इस्लामिक मूल्यों का उल्लंघन करने के लिए महिलाओं को शारीरिक दंड दिया जाता है। जबरन शादी की जाती है। महिला जननांग विकृति की जाती है।’  यास्मीना ने तंज कसते हुए कहा कि आप मुझसे ये ले लो। चूंकि मुझे इस्लाम और उसके अंधेरे पहलू के बारे में बहुत कुछ पता है। मैंने देखा है कि इस्लाम सबसे बुरी स्थिति में कैसे काम करता है। मगर पश्चिम में…हमारे अधिकार हमारी नाक के नीचे हैं। यास्मीना अली ने कहा इस्लाम उनके जैविक माता-पिता द्वार उन्हें मजबूर करता है। बचपन में पहले अफगानिस्तान में फिर किशोर अवस्था में ब्रिटेन में।

अली ने कहा, ‘मेरे माता-पिता ने बताया कि इस्लाम हर एक चीज से जरूरी है। यहां तक माता-पिता और उनके बच्चे के बीच प्यार से ज्यादा इस्लाम धर्म जरूरी है। इस्लामिक नियम के मुताबिक मेरे माता-पिता मुझे निर्देश देते थे कि मैं क्या पहनूं। इस्लाम के मुताबिक क्या करूं। क्या सोचूं। मैं नर्क में जाने के डर से भयभीत वातावरण में बड़ी हुई। खुद को जानने से डरने लगी और हर उस चीज से डरने लगी जो इस्लाम के खिलाफ था। माता-पिता ने हर उस चीज से नफरत कराने की कोशिश की जो आधुनिक था। सभ्य और धर्मनिरपेक्ष वातावरण से नफरत सिखाई गई। और मेरी जिंदगी की कहानी का यह हिस्सा अनूठा नहीं है। यह दुनियाभर में कई मुसलमानों की दुखी और निराशाजनक वास्तविकता है।’

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