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इस नौजवान के चलते 55 शहरों में रोज भरता है 15 हजार भूखे लोगों का पेट

25 साल के अंकित क्वात्रा ने अपनी कॉरपोरेट सेक्टर की नौकरी छोड़ कर भूखे लोगों का पेट भरने का अभियान छेड़ा है।

फीडिंग इंडिया के संस्थापक अंकित क्वात्रा। (Photo Source: Facebook)

अशोक कुमार

बॉन के जलवायु सम्मेलन में कई ऐसे भी लोग हैं जो समाज के सबसे जरूरतमंद लोगों की मदद कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं अंकित क्वात्रा। उनकी संस्था फीडिंग इंडिया हर रोज हजारों भूखे लोगों तक खाना पहुंचाती है। आम तौर पर शादियों, पार्टियों और रेस्तरां में जो खाना बर्बाद होता है, फीडिंग इंडिया उसे भूखे लोगों तक पहुंचाने में जुटी है। 25 साल के अंकित क्वात्रा ने अपनी कॉरपोरेट सेक्टर की नौकरी छोड़ कर भूखे लोगों का पेट भरने का अभियान छेड़ा है। दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी भारत में है। लेकिन अंकित कहते है कि इसी देश में हर साल 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का खाना बर्बाद हो जाता है। शादियों और पार्टियों में तो अकसर खाना बर्बाद होता ही है, लेकिन उसे पैदा करने वाले किसान भी अकसर अनाज को ठीक से नहीं रख पाते हैं क्योंकि उनके पास उचित तकनीक और संसाधन नहीं होता।

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अंकित क्वात्रा कहते हैं, ‘फीडिंग इंडिया ऐसी संस्था है जो रेस्तरां, होटल, कॉलेज कैंटीन या फिर शादियों और पार्टियों से बचा हुआ खाना उन लोगों के पास लेकर जाती है जिनके पास खाने को नहीं है।’ ये संस्था भारत के 55 शहरों में हर रोज 10 से 15 हजार लोगों तक खाना पहुंचाती है। फीडिंग इंडिया को दुनिया भर में अपने इस काम के लिए सराहना मिली है। संयुक्त राष्ट्र ने अंकित क्वात्रा को 2016 के यंग लीडर ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल चुना है। इसके अलावा ब्रिटेन ने भी उन्हें सम्मानित किया है।

अंकित क्वात्रा बताते हैं कि उनके इस अभियान की शुरुआत एक छोटी सी घटना से हुई. “मैं दिल्ली की एक शादी में गया था। वहां 35 तरह के खाने बने थे, इटैलियन, चाइनीज, स्पैनिश वगैरह जो आजकल सब पसंद करते हैं। शादी में बहुत सारे लोग थे। तभी मेरे दिमाग में ख्याल आया कि जो खाना बच जाता है, तो उसका क्या होता है। मैंने कैटरर से पूछा तो पता चला कि उस शादी से ही दस हजार लोगों का खाना बर्बाद होने वाला था।’ तभी अंकित ने फैसला कर लिया कि वह अपनी नौकरी छोड़ कर ऐसे खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचायेंगे। शुरू में वह अपने दोस्तों के साथ मिल कर शादियों और रेस्तरांओं में जाते थे और लोगों को राजी करते थे कि वे लोग बचा हुआ खाना उन्हें दे दें। अब लगभग साढ़े आठ हजार वॉलंटियर्स के साथ फीडिंग इंडिया भारत के 55 शहरों में सक्रिय हैं।

अंकित का कहना है कि अब तक उन्होंने एक करोड़ लोगों तक खाना पहुंचाया है और वह इस अभियान को और आगे बढ़ाना चाहते हैं। फीडिंग इंडिया जैसी कोशिश कई अन्य जगहों पर भी हो रही हैं। मिसाल के तौर पर कभी शेफ रहे नारायण कृष्ण ने 2003 में तमिलनाडु के मदुरै में अक्षय ट्रस्ट की स्थापना की जो बेघर और मानसिक रूप से विकलांग लोगों को खाना मुहैया कराता है। हर दिन सैकड़ों लोगों को तीन वक्त का खाना मुहैया कराने वाले कृष्णा को सीएनएन हीरो 2010 के टॉप 10 में जगह दी गयी थी। जर्मनी में भी टाफेल नाम की संस्था कुछ ऐसे ही मिशन में जुटी है। उसके वॉलंटियर जरूरतमंद लोगों और परिवारों को खाने पीने के ऐसे सामान देती है जिन्हें फेंक दिया जाता। यह संस्था अपने पार्टनर और स्पॉन्सर संगठनों के साथ काम करती है और उनसे ऐसे सामान लेती है जो बेचने लायक नहीं रहा है। लेकिन वह खाने लायक होता है और बहुत से बेघर लोगों का पेट भर सकता है।

जर्मनी में इस समय बड़े बड़े शेफ एक आंदोलन भी चला रहे हैं कि एक्सपायरी डेट खत्म हुए खाने को फौरन न फेंके, उसे कुछ और दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है। बर्बाद होने वाले खाने का पर्यावरण से भी करीबी संबंध है। दुनिया भर में बर्बाद होने वाले खाने से लगभग 8 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। बर्बाद खाने से कचरे के ढेर में मीथेन गैस निकलती है जो कार्बन डायऑक्साइड से 25 फीसदी ज्यादा जहरीली होती है। खाने को बर्बाद करने की बजाय जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना न सिर्फ इंसानियत के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी अच्छा होगा। अंकित क्वात्रा को बॉन के जलवायु सम्मेलन में उन लोगों से मिलने का मौका मिला जो पर्यावरण की नीतियां बनाते हैं। बॉन में भारत की इस पहलकदमी को अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली है।

दुनिया भर की आबादी तेजी से बढ़ रही है। तेज तरक्की के साथ पिछले दशकों में करोड़ों लोगों को गरीबी से निकाला गया है। लेकिन अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनके लिए दो वक्त के खाने का कोई ठिकाना नहीं है। दुनिया में दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में भी भूख से लड़ाई जारी है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक 119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है। भारत भुखमरी से निपटने में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और इराक से भी पीछे है। लेकिन फीडिंग इंडिया जैसी कोशिशें उम्मीद भी जगाती हैं। अंकित क्वात्रा अपनी मुहिम को भारत के हर कोने तक ले जाना चाहते हैं जहां पर भूख अभी भी जिंदा है। यानी जब अगली बार आपके घर में कोई फंक्शन हो और उसमें खाना बच जाये तो उसे फेंकने की बजाय आप फीडिंग इंडिया के माध्यम से उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

 

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