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भारत-चीन में पूर्वी लद्दाख का समझौता, बफर जोन : रणनीतिक फायदे में कौन

वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चल रहे लंबे तनाव के बाद आखिरकार भारत और चीन में समझौता हो गया है।

(ऊपर) भारत-चीन सीमा। (बाएं) ब्रह्मा चेलानी, रक्षा और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ। अभिजीत अय्यर मित्रा, सामरिक मामलों के जानकार।

समझौते को लेकर बहस का दौर चल रहा है। समझौते के अनुसार भारत ने पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील के उत्तर और दक्षिणी तट पर 10 किलोमीटर चौड़ा बफर जोन बनाने के लिए सहमति दे दी है। इस क्षेत्र में दोनों देशों की सेनाएं नहीं रहेंगी। पूर्वी लद्दाख को लेकर हुए इस समझौते का असर अरुणाचल प्रदेश में दिख रहा है।

वहां नाकुला में आगे बढ़ आई चीनी सेना ने कदम पीछे हटाने शुरू किए हैं। वहां मई 2020 से जारी तनाव कम हो रहा है। कंचनजंगा की पहाड़ी के दक्षिण पश्चिम में मौजूद नाकुला में दोनों देशों की सेना के बीच नौ मई 2020 से लेकर हाल में 20 जनवरी 2021 तक तनाव बढ़ गया था और यहां हुई घटनाओं में दोनों पक्षों के सैनिकों को चोटें आई थीं। बहस का एक मुद्दा डेपसांग, गोगरा, हॉट स्प्रिंग और गलवान में पीछे हटने को लेकर फिलहाल वार्ता न होना भी है। इस मुद्दे पर सामरिक विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अलग चरण में बात हो सकती है।

समझौते में क्या-क्या

इस समझौते के तहत पहले चरण में पैंगोंग त्सो झील के चारों तरफ डटे सैनिक 20 अप्रैल, 2020 से पहली वाली लोकेशन पर वापस लौट जाएंगे। फिंगर 4 और फिंगर 8 के बीच बेहद कम तापमान में होने वाली पट्रोलिंग को किसी भी तरह के संघर्ष से बचने के लिए रोकना जरूरी माना गया। अप्रैल, 2020 के बाद यहां बने किसी भी तरह के सुरक्षा ढांचे को हटा दिया जाएगा। जब कैलाश रेंज खाली हो जाएगी तो भारतीय सैनिक चुशुल में बहुत करीब तैनात रहेंगे।

ये सारे काम होने के 48 घंटों के भीतर डेपसांग, गोगरा, हॉट स्प्रिंग और गलवान में पीछे हटने के लिए वार्ता होगी। दोनों देशों के कैडर किसी भी तरह के मसले पर नजर रखने, उसकी पुष्टि करने या उसके हल के लिए लगातार मिलते रहेंगे। समझौते को लेकर पूर्व सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक का कहना है कि दोनों देशों में अभी भरोसे की कमी है। इस कारण हमारे सैनिकों का सतर्क रहना जरूरी माना जा रहा है। जनरल मलिक के मुताबिक, सैनिकों के पीछे हटने में और तनाव पूरी तरह खत्म होने में समय लगेगा।

अभी तक चीनी सेना ने क्या किया

चीनी सेना पैंगोंग त्सो के उत्तर में मौजूद फिंगर 8 से पूर्व में श्रीजप के मैदानों की तरफ बढ़ी है और पैंगोंग त्सो के दक्षिण हिस्से से उसने कम से कम 220 चीनी लाइट टैंक पीछे हटाए हैं। 10 फरवरी को पैंगोंग त्सो में पीछे हटने (डिसइंगेजमेंट) की प्रक्रिया शुरू करने पर बनी सहमति के बाद भारतीय सेना के कमांडरों ने नाकुला में तनाव और दोनों देशों के बीच बिगड़ते रिश्तों का मुद्दा उठाया था।
डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया को लेकर चीनी सेना प्रतिबद्धता साबित करने के लिए एक बटालियन कमांडर ने नाकुला में भारतीय सेना में अपने समकक्ष से बात करने की पेशकश की थी और कहा था कि चीन की तरफ से सीमा का उल्लंघन नहीं होगा।

भारत की स्थिति क्या है

भारत फिंगर 8 तक गश्त कर सकेगा, जबकि चीन ने फिंगर 4 तक अपना वर्चस्व कायम रखा है। पैंगोंग झील के दक्षिण को लेकर भारत सरकार ने जो कदम उठाया, वह महत्त्वपूर्ण दिखाई दे रहा है, क्योंकि उसी की वजह से दोनों पक्षों में इस समझौते पर सहमति बन पाई। यह उम्मीद करना कि भारत फिंगर 8 तक गश्त कर सके और चीन पूरी तरह पीछे हट जाए, इसके आसार नहीं।

अप्रैल 2020 में भी यह स्थिति नहीं थी। समझौते को जमीन पर उतारने के लिए भारत के जवानों को फिंगर तीन पर स्थित अपने बेस में रहना होगा और चीनी सैनिकों को फिंगर आठ के पूर्व में रहना होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बयान दे चुके हैं कि चीन अपनी सेना की टुकड़ियों को फिंगर 8 के पूरब की दिशा में रखेगा। इसी तरह भारत भी अपनी सेना की टुकड़ियों को फिंगर के पास अपने स्थायी बेस धन सिंह थापा पोस्ट पर रखेगा। समझौते के अनुसार, परंपरागत स्थानों की गश्त अस्थायी रूप से स्थगित रखी जाएगी। गश्त तभी शुरू की जाएगी, जब सेना एवं राजनयिक स्तर पर आगे की बातचीत करके कुछ समझौता हो जाए।

डेपसांग में क्या है स्थिति

जानकारों का कहना है कि डेपसांग और कुछ अन्य सेक्टरों में पीछे हटने को लेकर फिलहाल चीन पर दबाव नहीं बन पाया है। कूटनीतिक और सैन्य दृष्टि से यह क्षेत्र भारत के लिए बेहद अहम है। यह वही क्षेत्र है, जहां माना जाता है कि चीन की सेना भारत के अधिकार वाले क्षेत्र में 18 किलोमीटर तक अंदर प्रवेश कर गई है। विपक्ष ने यह सवाल उठाते हुए समझौते को लेकर सरकार की घेरेबंदी की है।

इसके बाद कई स्तरों से स्पष्टीकरण जारी किए जा रहे हैं और बताया जा रहा है कि पहला चरण पूरा होने के बाद इस बारे में भी बात होगी। हालांकि, भारतीय सेना के पूर्व कर्नल और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ अजय शुक्ला का कहना है कि एक तो पैंगोंग में कुछ हथियारबंद गाड़ियों और टैंकों को पीछे लिया गया है।

क्या कहते
हैं जानकार

चीन की सेना ने सिर्फ पैंगोंग झील से पीछे हटने की बात कही है, जबकि चीन ने डेपसांग समेत कुछ अन्य सेक्टरों में भी अतिक्रमण किया है। इस इलाके को लेकर वार्ता बाकी है। चीन की सेना के बयान में कहीं भी अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में लौटने की बात नहीं है।
– ब्रह्मा चेलानी, रक्षा और सामरिक
मामलों के विशेषज्ञ

एलएसी की अभी की उपग्रह तस्वीरों से पता लग रहा है कि पैंगोंग-त्सो के दक्षिणी की तुलना में स्पांगुर के इलाके से चीन की सेना से पीछे हट रही है। यह अच्छी बात है। अगर आंख में आंख डालकर पीछे हटने की कवायद की जाती तो गलवान जैसे हालात का अंदेशा भी बढ़ जाता।
– अभिजीत अय्यर मित्रा, सामरिक मामलों के जानकार

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