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गर्व करें क‍ि हम प्रतीकात्मक राजनीति के पुरोधाओं के दौर में जी रहे हैं

बदलाव के वादे के रास्ते सत्ता में आई सरकार ने ढाई साल बाद भी कोई बदलाव नहीं देखा तो प्रतीकात्मक बदलाव के तौर पर नोट बदल दिए। प्रतीकात्मक झाड़ू लेकर घूमने से लेकर प्रतीकात्मक योगा तक क्या कुछ नहीं किया प्रतीकों की राजनीति के लिए।

प्रधानमंत्री ने प्रतीकात्मक रूप से अपनी भारी जीत को भारी महसूस कराने के लिए 600 करोड़ मतदाताओं की कल्पना की थी और प्रतीकात्मक राजनीति के प्रति उनकी श्रद्धा देखिए कि वह भूल गए कि प्रतीकों के देश भारत में नहीं विदेश की किसी धरती पर हैं।

आजकल देश में प्रतीकात्मक राजनीति का दौर है। मतलब झगड़ा ठीक से नहीं हो पा रहा है तो प्रतीकात्मक कर लें। केजरीवाल एलजी साहब के यहां, कपिल मिश्रा और भाजपा वाले केजरीवाल के यहां रजाई गद्दे और सोफे पर गिरे पड़े हैं। वो एक प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसी ही प्रतीकात्मक लड़ाई कांग्रेस ने कथित भूख हड़ताल की मदद से लड़ी थी और भाजपा ने संसदीय गतिरोध के खिलाफ देशव्यापी भूख हड़ताल के माध्यम से इस परंपरा को और मजबूत किया था। अमित शाह प्रतीकात्मक संपर्क अभियान पर हैं। देश भर की महान हस्तियों को अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, जैसे किसी को पता नहीं है। लेकिन प्रतीकात्मक राजनीति को मजबूत करने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

हम प्रतीकों के लिए लड़-कट-मरने वाले लोग हैं। प्रतीक हमें आकर्षित करते हैं। प्रतीकों से हमारी बहुत आस्था है। ‘अप्रतीकीय संस्कृति’ वाले लोगों ने भी प्रतीकों की महिमा को भलीभांति समझ लिया है। वह भी अपने प्रतीकों पर होने वाले प्रहार पर प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया देने लगे हैं। भारतीय जनता के इस प्रतीक प्रेम को ‘भारतीय जनता पार्टियों’ ने अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बना लिया है। अब वह प्रतीकों को लेकर गंभीर हो गए हैं। ऊना से लेकर सहारनपुर तक की घटना पर विरोधियों को क्या जबर्दस्त उत्तर दिया था हमारी सरकार ने। उन्होंने प्रतीकात्मक उत्तर का सहारा लिया। यह बहुविकल्पीय और विस्तृत उत्तरीय प्रश्नों के बीच का रास्ता था। प्रतीकात्मकीय उत्तर। उन्होंने सर्वोच्च संवैधानिक प्रतीकात्मक पद के लिए प्रतीकात्मक व्यक्ति की तलाश की और विपक्ष को प्रतीकात्मक जवाब दे डाला।

काम तो काम, राजनीतिज्ञों ने अपने बयानों तक में प्रतीकात्मकता को पर्याप्त जगह दी है। हम लोग खामख्वाह मजाक बनाते हैं। प्रधानमंत्री ने प्रतीकात्मक रूप से अपनी भारी जीत को भारी महसूस कराने के लिए 600 करोड़ मतदाताओं की कल्पना की थी और प्रतीकात्मक राजनीति के प्रति उनकी श्रद्धा देखिए कि वह भूल गए कि प्रतीकों के देश भारत में नहीं विदेश की किसी धरती पर हैं। प्रेम और जुनून ऐसा होना चाहिए। देश के राजनीति शास्त्र के राष्ट्रीय शिष्य राहुल गांधी भी इसी दृष्टिकोण से आजकल भाषण देते हैं। उन्होंने कहा कि कोका कोला कंपनी के मालिक पहले शिकंजी बेचते थे। आपको इसे प्रतीक के तौर पर स्वीकार कर लेना चाहिए था। वैसे भी महान हस्तियों के संघर्षों की कहानियों में जो वो बताते हैं क्या सब सही ही होता है? हां, मगरमच्छ वाली बात और है। उसके सही होने में कोई संदेह नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने सोचा होगा सारे महापुरुषों ने बचपन में अखबार, चाय इत्यादि बेचा ही होता है। ये सारे प्रतीक तो अब पुराने हो गए हैं। मार्केट में कुछ नए प्रतीक लाने की जरूरत है। प्रतीकात्मक राजनीति के लिए यह उनकी प्रतिबद्धता तो ही थी।

वैसे, हम प्रतीकात्मक राजनीति के एक महान पुरोधा के युग में जी रहे हैं। इसका हमें गर्व होना चाहिए। बदलाव के वादे के रास्ते सत्ता में आई सरकार ने ढाई साल बाद भी कोई बदलाव नहीं देखा तो प्रतीकात्मक बदलाव के तौर पर नोट बदल दिए। प्रतीकात्मक झाड़ू लेकर घूमने से लेकर प्रतीकात्मक योगा तक क्या कुछ नहीं किया प्रतीकों की राजनीति के लिए। हां, प्रतीकात्मक योगा ही तो है। इससे पहले फिटनेस के लिए ऐसा योगा कभी नहीं देखा था। और तो और पार्टी के बुजुर्ग लोगों की प्रतिष्ठा में कोई कमी न हो इसके लिए उन्हें भी प्रतीक बनाना जरूरी था। इसलिए एक अलग से प्रतीकात्मक (सॉरी) मार्गदर्शक मंडल बना दिया। प्रधानमंत्री के पास विपक्ष के हर सवालों का प्रतीकात्मक जवाब था। लोगों ने कहा कि इंटरव्यू नहीं देते सो एक नहीं, तीन-तीन प्रतीकात्मक इंटरव्यू दे डाले। पुरोधा को छोड़िए, उनके मंत्री भी क्या कम हैं! झोपड़ी में रहने वाले लोगों को फाइव स्टार होटल में बुलाकर और उनके साथ खाना खाकर दलित-उत्थान और समतामय समाज की दिशा में उनके प्रतीकात्मक योगदान को कौन भूल सकता है! प्रतीकात्मक राजनीति के जनक का जीवन ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। और पिक्चर तो अभी बाकी ही है, भाइयो भैणों।

खैर, लोकतंत्र के नाम पर अब इस देश में प्रतीकात्मक लोकतंत्र ही तो बचा है। राजशाही, भाई-भतीजावाद, पुत्रवाद, मित्रवाद, गुरूवाद को संवैधानिक पद-प्रतीकों के खांचे में घुसाकर मनमानी की ही जा रही है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक प्रतीकात्मक प्रतिरोध की संस्कृति पनप रही है। संसद में प्रतीकात्मक कार्यवाही हो रही है। लोग प्रतीकों को लेकर पागल हैं। मार-काट मचा रहे हैं। प्रतीकों को सत्य मान लिया गया है, यह भूलकर कि प्रतीक तो प्रतीक ही हैं, यथार्थ नहीं। कहीं ऐसा न हो जाए कि इस प्रतीकवादी युग में यथार्थवाद भी एक प्रतीक बनकर रह जाए।

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