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”पढ़े-ल‍िखे आदमी को जुत‍ियाना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाह‍िए”

2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद स्‍वच्‍छता अभियान चर्चा में आया और उसे लेकर तरह-तरह के सच घटित हो रहे हैं। नेता-जनता सब अभ‍ियान का मखौल उड़ाते भी देखे जा सकते हैं। श्रीलाल शुक्‍ल ने राग दरबारी के 18वें पन्‍ने पर लिखा था- हमारे इतना पढ़ लेने के बाद भी पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है।

फोटो सोर्स- जनसत्ता.कॉम

31 दिसंबर साल का आखिरी दिन ही नहीं है, बल्‍क‍ि राग दरबारी के कालजयी रचनाकार श्रीलाल शुक्‍ल की जयंती भी है। 1925 में इसी तारीख को वह दुनिया में आए थे। लखनऊ के अतरौली गांव में उनका जन्‍म हुआ था। 43 साल की उम्र (1968) में उनकी राग दरबारी आई थी। आते ही किताब की 2000 से ज्‍यादा प्रतियां बिक गई थीं। एक साल के भीतर ही इस किताब के लिए शुक्‍ल जी को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार भी मिल गया था।

राजकमल प्रकाशन का कहना है कि आज भी हर साल 25-30 हजार कॉपी बिक रही हैं। 2018 में किताब को 50 साल हो गए, लेकिन आज भी इसकी लोकप्र‍ियता कायम है तो इसकी वजह है। किताब आज भी पढ़ेंगे तो यही लगेगा कि कल ही लिखी गई है। लाजवाब तंज मारकर शुक्‍ल जी ने व्‍यवस्‍था की बदहाली का जो आईना तब दिखाया था, व्‍यवस्‍था आज भी उसी अवस्‍था में है।

शिवपालगंज नाम के जिस गांव के इर्द-गिर्द श्रीलाल शुक्‍ल ने अपने उपन्‍यास की कहानी बुनी है, उसे पढ़ कर आपको लगेगा कि वह आपका ही गांव या शहर है। उपन्‍यास के हर किरदार की मौजूदगी भी आप अपने आसपास सहज ही महसूस कर सकेंगे। किताब की आज भी लोकप्र‍ियता की वजह यही है। यहां हम किताब की कुछ पंक्‍त‍ियां दे रहे हैं, इन्‍हें पढ़ने से आपको इस बात का साफ इल्‍म हो जाएगा। यहां हम किताब की कुछ पंक्‍त‍ियां दे रहे हैं, इन्‍हें पढ़ने से आपको इस बात का साफ इल्‍म हो जाएगा।

2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद स्‍वच्‍छता अभियान चर्चा में आया और उसे लेकर तरह-तरह के सच घटित हो रहे हैं। नेता-जनता सब अभ‍ियान का मखौल उड़ाते भी देखे जा सकते हैं। श्रीलाल शुक्‍ल ने राग दरबारी के 18वें पन्‍ने पर लिखा था- हमारे इतना पढ़ लेने के बाद भी पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है।

भाखड़ा नांगल बांध को देखकर वे कह सकते हैं, ‘अहा अपना चमत्कार दिखाने के लिए, देखो, प्रभु ने फिर से भारतभूमि को ही चुना है’

आज जहां नेता हनुमान जी की जाति में उलझे हुए हैं, वहीं श्रीलाल शुक्‍ल ने राग दरबारी में पेज नंबर 24 पर लिखा था- जाति से उसका नाम छीन कर उसे किसी आदमी का नाम बना देने से जाति के पास कुछ नहीं बचता। वह अपने आप खत्‍म हो जाती है।

सरकारी कार्यसंस्‍कृति पर उनका तंज पढ़िए: तुमने मास्टर मोतीराम को देखा है कि नहीं? पुराने आदमी हैं। दरोगाजी उनकी, वे दरोगाजी की इज्जत करते हैं। दोनों की इज्जत प्रिंसिपल साहब करते हैं। कोई साला काम तो करता नहीं है, सब एक-दूसरे की इज्जत करते हैं।

किसानों को लुभाने की होड़ आज भी पार्ट‍ियों के बीच लगातार बढ़ रही है। श्रीलाल शुक्‍ल ने 1968 में ही राग दरबारी में लिखा था- वास्‍तव में कई सालों से गांववालों को फुसलाकर बताया जा रहा था कि भारतवर्ष एक खेतिहर देश है।

राजनीति‍ में वंशवाद पर उनका तब का यह तंज आज भी सौ फीसदी सटीक है- वह पैदायशी नेता थे, क्‍योंकि उनके बाप भी नेता थे।
आज जहां सिलेबस और परीक्षा पैटर्न बदलने की होड़ है, उसके मद्देनजर यह कोई नहीं कह सकता कि 50 साल पुराना राग दरबारी का यह वाक्‍य थोड़ा भी पुराना पड़ा है।

शुक्‍ल जी का एक और तंज: पढ़े-लिखे आदमी को जुतियाना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए।

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