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व्यंग्य: केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या के विरोध में जंगल में हुई रैली, पढ़ें आंखों देखा हाल

'सत्तू जी की फेक न्यूज' की श्रृंखला की इस कड़ी में पढ़ें- केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या के विरोध में जंगल में हुई रैली और पूरी बतकही का आंखों देखा हाल...

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नई दिल्ली। कुछ खड़खड़ाहट जैसी आवाज़ से नींद टूटी। आंख खुली तो खिड़की पर एक उल्लू बैठा था। “क्यों भाई, हर शाख़ पर तुम्हारा कब्ज़ा है..अब क्या हर घर पर कब्ज़ा करोगे?” मैंने घर आए परिन्दे को छेड़ा। बेज़ुबान जीव ने अपनी बड़ी-बड़ी गोल आंखों से मुझे दो पल देखा और रोने लगा। “हम क्या कब्ज़ा करेंगे” मैं चौंक गया। उल्लू बोल रहा था। मैं उसके पास चला गया। वह बोला, ” हमारी जान पर आफत है और आपको छेड़छाड़ में सुख मिल रहा है…आदमी हो न, तभी!!”

“क्या!?” मैं उल्लूवाणी से अकबकाया हुआ था…यह बोल कैसे रहा है.. चलो वो बोल भी रहा है तो मैं समझ कैसे रहा हूं..कहीं मेरा शरीर उल्लू में तो नहीं बदल गया…कहीं मैं उल्लू तो नहीं!? “नहीं, आप उल्लू नहीं” इस बार उल्लू सिर्फ बोल नहीं रह था, वह मेरे मन में उठ रहे सवालों को पढ़ भी रहा था। वह बोलता गया, ”आप आदमी हैं। आदमी यानी कि सबसे घटिया जीवधारी। उल्लू छोड़िए, आप चीटी नहीं बन सकते।” मेरे मन में उठ रहे सवालों का खुद-ब-खुद जवाब देते हुए उल्लू बोला, ” दरअसल, जंगल में सुल्तान शेरख़ान ने मानव इतर सभी पशु-पक्षियों की रैली आहूत की है। शेरख़ान को लगा कि आप बिना भेदभाव के कवरेज करेंगे। इसलिए आपको बुलाया है। हम लोगों की ज़बान समझने की कुव्वत भी शेरख़ान ने भगवान पशुपतिनाथ से कहकर दिलाई है।”

मैंने हामी भर दी और तय वक़्त पर नेशनल पार्क के गेट पर पहुंच गया। वहां उल्लू पहले से राह दिखाने के लिए मौजूद था। वह मेरे सर पर बैठ गया।  “सर” वह बैठते ही बोला,”रैली केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या के विरोध में है। वहां, मेरे जैसे उल्लुओं के मुद्दे छूट जाएंगे। मैं चाहता हूं कि आप मेरा मुद्दा भी अपनी रिपोर्ट में उठाएं।”  “ओके, गो अहेड” “सर, जब से हैरी पॉटर बुक्स और फिल्म्स आई हैं तब से मैं परेशान हूं। बच्चे, खासकर अंग्रेज़ीदां बच्चों में उल्लू पालने का शौक पैदा हो गया है।…हर शाख पर उल्लू छोड़िए, भाग कर छिपने की जगह भी नहीं मिल रही है… इतना भी नहीं सोचते कि हॉगवर्ट्स स्कूल हिंदुस्तान में नहीं गप्पीस्तान में है।”

इस बीच रैली स्थल आ चुका था। मैंने उल्लू को सर पर बिठाकर एक सेल्फी ली और आगे बढ़ गया। शेरख़ान एक ऊंची चट्टान पर विराजमान थे। मुझको देखते ही मेरी ओर बढ़ चले। मैं उपस्थित पशु समुदाय को देखने लगा। सबसे आगे गिलहरी और खरगोश जैसे जानवर थे। फिर सियार, कुत्ते, भेड़िए और हिरन। छोटे से बड़े के क्रम में बिठाया गया था। सबसे पीछे हाथी थे। पक्षी पेड़ों पर थे।तकनीकी समस्या के मद्देनजर मछलियां नहीं आईं थीं।उनकी नुमाइंदगी क्रोकोडाइल और हिप्पोपोटेमस कर रहे थे। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि शाकाहारी और मांसाहारी, सब साथ बैठे थे। और, हंस-बोल रहे थे।

सत्तू जी की फेक न्यूज…

तब तक शेरख़ान मेरे सामने आ चुके थे। उन्होंने अपनी आइकोनिक दहाड़ और पूंछ लहराकर मेरा स्वागत किया।
“आइए” शेरख़ान ने कहा,”मैंने आपकी सीट अपने बराबर रखी है।” हम दोनों चट्टान की तरफ चल दिए। इस बीच बातचीत होती रही। मैंने पूछा,”शेरख़ान साहब, ये खरगोश, लोमड़ी, हिरन और तेंदुआ आदि सब साथ बैठे हैं…अचरज यह कि तेंदुआ आदि और आप खुद प्रथम कोटि के मांसाहारी हैं..”

शेरख़ान मेरी बात सुनकर चलते-चलते रुक गए। अपनी लाल-लाल आंखों से मुझे देखने ले और बोले, “हम जानवर हैं। नरपिशाच नहीं। भूख लगती है तभी खाते हैं और खा भी तब पाते हैं जब शिकार कर पाते हैं..यहां एक प्लेट हिरन देना जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।…मैंने अनगिनत हिरन खाए हैं। उसे मारता तो हूं पर उससे नफरत नहीं करता। हिरन भी मुझसे नफरत नहीं करते। किसी ने आज तक मेरे सोने के समय पेट में सींग नहीं घुसेड़ा। हम दोनों जानते हैं कि एक को मारने का अधिकार प्राप्त है और दूसरे को बचके भागने का। वैसे,आज के लिए मैंने सभी मांसाहारियों से कह रखा था कि घर से खा कर आएं ताकि रैली में डिस्टरबेंस न हो।”

इस बीच रैली में आया पशु समुदाय अधीर हो रहा था। हाथी के हत्यारों को, दांत से काटो xxxसालों को.. भीड़ नारे लगा रही थी। शेरख़ान ने मेरी तरफ देखकर कहा, ”चलिए, सभा की कार्यवाही शुरू की जाए।” ( रैली में क्या भाषण हुए: पढ़ें कल)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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