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व्यंग्य: स्वर्ग के गेट से लौटाए गए जुम्मन, चित्रगुप्त ने कहा- अभी दिन पूरे नहीं हुए

जुम्मन ने कहा, "बात यह थी कि जन्नत में हूर होती हैं, शानदार शराब होती है। ये सब छोड़कर बाबा के शिवधाम कैसे चला जाता।

Coronavirus, COVID-19, Corona Casesसत्तू जी की फेक न्यूज… (प्रतीकात्मक तस्वीर)

वह सुलतानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बालू में सना पड़ा था। सांस, धड़कन, नब्ज़–सब गायब। कपड़े गीले थे। शायद दोपहर की गर्मी से तड़प कर वह कपड़ों के साथ पानी में उतर गया था। गंगा जी में नहाते कुछ माइग्रेंट मज़दूरों की नज़र उस पर पड़ी। वे उसकी ओर भागे। “ई त अपन झम्मन छिके, नाथ नगर वाला।” मज़दूर उसे कंधे पर लाद कर साए में ले गए। कोई पानी के छींटे मारने लगा तो कोई बन्द बत्तीसी के भीतर गंगाजल घुसेड़ने लगा। तभी कोई अनुभवी मज़दूर चिल्लाया, “इसकी नाक बंद कर दो, बचना होगा तो ज़रा देर में फड़फड़ा कर आंख खोल देगा।” और सचमुच, वही हुआ! उस आदमी ने आंख खोल दी!!

“ये मैं कहां आ गया…यहां तो बड़ी गर्मी है..” वह बुदबुदाया, “वहां कितना अच्छा था…ठंडे पहाड़…बर्फीली चोटियां..” “नहीं,” किसी ने उसको हक़ीक़त बताने की कोशिश की, “तुम बेहोश थे और गंगा के किनारे पड़े थे।” “हां-हां-हां, याद आ गया,” उसने कहा, “लेकिन किनारे वो खड़े थे, मैं तो गंगा मइया की गोद में था।”

इस बीच वह आदमी काफी स्वस्थ हो गया था। मज़दूर उसके लिए जलपान ले आए थे। दो समोसों, एक लस्सी और चुटकी भर खैनी ने उसे ज़िंदा कर दिया था। उसने दो दिन बाद कुछ खाया था। अमृतसर से भागलपुर। लम्बा सफर। वह खुद आश्चर्यचकित था कि वह चल कैसे पाया।

जंडियाला गुरु, ब्यास, लुधियाना… इलाहाबाद, बनारस, पटना, मोकामा, जमालपुर…। उसे सारी जगहें याद आ रही थीं। नाश्ता खत्म हुआ। बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हो गया। “हां, तो मैं नहा रहा था,” उस आदमी ने कहा, “तभी, क्या देखता हूं कि किनारे एक जटाजूटधारी बाबा खड़े हैं…मैंने ग़ौर से नज़र डाली तो देखा कि बाबा उंगली के इशारे से मुझे बुला रहे हैं..पता नहीं क्या ताकत थी उनके इशारे में कि मैं खिंचता चला गया।”

“चलो, मैं तुम्हें लेने आया हूं..” बाबा ने कहा। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था। अचानक उसके मुंह से फूटा, “बाबा आपको पहचाना नहीं।” “मैं बाबाधाम, देवघर से आया हूं। अपने भक्तों को मैं अपने धाम यानी शिवधाम ले जाने मैं खुद आता हूं।” “मगर, बाबा मैं झम्मन हूं। यानी जुम्मन हूं–जुम्मन कुरेशी..आपके साथ नहीं जा सकता। मैं पांच वक़्त का नमाज़ी…अपने धरम भरष्ट नहीं करूंगा…हज़रत इज़राइल आएंगे तभी कुछ सोचूंगा।”

“देख जुम्मन, कभी-कभी गलती हो जाती है। आखिर, मैं पैंट खोलकर तो चेक नहीं कर सकता…फिर यह मेरा नहीं, बेसिकली यमराज का काम है। पता होता कि तू कौन है तो मैं इज़राइल के रूप में आता। फिर, तू भी तो कमाल करता है, उत्तरवाहिनी गंगा में नहाता है, जिसके बाद आदमी बाबा धाम जाता है। और, तेरा नाम तो नन्दी ने रिकमेंड किया था…बोला–यह आदमी बैल की तरह काम करता है..इसको बुला लो तो मेरा काम हल्का हो जाएगा”

“अब मैं चिंता में पड़ गया” जुम्मन ने कहा, “बात यह थी कि जन्नत में हूर होती हैं, शानदार शराब होती है। ये सब छोड़कर बाबा के शिवधाम कैसे चला जाता। मैं यह सोच ही रहा था कि बाबा हंसने लगे।” बाबा बोले, “मैं तेरी चिंता समझता हूं। शिवधाम का एक गेट स्वर्ग को खुलता है। घूम आया करना।

वहां भी हूर हैं…रम्भा, उर्वशी, मेनका आदि और दारू तो जो चाहो, स्कॉच, शैम्पेन, तकीला… सब कुछ।” “ऑफर सॉलिड था। मैं मान गया और चल दिया” जुम्मन ने बताया, “शिवधाम यानी कैलाश का रास्ता बड़ा अच्छा था…मैंने एक जगह चीनी फौजियों को भी देखा। आखिरकार, बाबा ने मुझे स्वर्ग का गेट दिखा दिया। बोले– अब जाओ। कोई दिक्कत आए तो मुझे पुकार लेना”

जुम्मन स्वर्ग के गेट पर पहुंचा। दरवाज़ा बन्द था और जय-विजय नाम के दो सिक्योरिटी गार्ड दरबानी कर रहे थे।  “कौन,” विजय ने पूछा। “मैं जुम्मन, निवासी नाथनगर, भागलपुर।” “मुसलमानों की एंट्री पर रोक है।” “कब से?” “5-6 साल हो गए।” “किसने हुकुम दिया” “साहब ने” “कौन साहब? ” “मेरा मुंह न खुलवाओ, लाखों साल पुरानी नौकरी चली जएगी।” “लेकिन, मुझको तो देवघर वाले बाबा खुद लाए हैं..”

जुम्मन की बात सुनकर विजय ने जय को भीतर भेजा, “चित्रगुप्त जी से कह देना कि बाबा जी का केस है। फिर जैसा वो कहें उनसे लिखवाकर ले लेना। ” जय थोड़ी देर में लौटा। वह बोला: चित्रगुप्त जी ने कहा है कि जुम्मन के दिन अभी पूरे नहीं हुए हैं। वह अभी कई बार पंजाब जाएगा। अंतिम पंजाब यात्रा में वह नकोदर के खेत में बिजाई के दौरान थकान से चूर होकर मरेगा। जुम्मन ने कहा,”इसके बाद विजय ने मुझे ज़बरदस्त ताकत से लात मारी और मेरी घर वापसी हो गई। आंख खोली तो देखा तुम लोग मुझे घेरे खड़े हो।” भीड़ ने जयकारा लगाया–बाबा बैजनाथ की जय..बोल बम।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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