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Humour: जब तक पतित पावन जयश्री राम हैं तब तक पतित होने में क्या दिक़्क़त!

गप्पू: जैसे इन दिनों लॉकडाउन में हो रहा है। बड़े-बड़े शहरों में फंसे करोड़ो गरीबों ने दूसरों से उम्मीद ही छोड़ दी है। बस जो दे दो, उसी में खुश...

पप्पू और गप्पू की बकैती (प्रतीकात्मक तस्वीर)

पप्पू: ये क्या देख रहा हूं, सुबह-सुबह!!?
गप्पू: क्यों? कभी साइकिल नहीं देखी क्या?
पप्पू: नहीं भाई। मैं भी कैंची चलाते-चलाते बड़ा हुआ हूं। मगर, आपको इस पर गद्दीनशीन देखा तो मन प्रसन्न हो गया।
गप्पू: अच्छा…समझा। पहाड़ जैसी ऊंचाई से मेरे पतन पर खुशी मिली होगी! बढ़िया है। चलो, अगर मेरे पतन से देशवासी खुश होते हैं तो मेरे लिए इससे ज़्यादा गौरव की बात और क्या होगी। जब तक पतित पावन जयश्री राम हैं तब तक पतित होने में क्या दिक़्क़त! दाग़ अच्छे हैं। पतित पावन हैं ना!
पप्पू: बलिहारी है, बलिहारी है। ज़रा सी बात का सरकमलोक्यूशन कर डाला। मैं तो सिंपली साइकिल की तारीफ कर रहा था।
गप्पू: तो पहले बताया क्यों नहीं? मैं समझा कि तुम चिढ़ा रहे हो।
पप्पू: कभी तो सम पर रहा करो, गप्पू। हमेशा चंग पर चढ़े रहते हो। देश को बड़ी उम्मीदें हैं तुमसे। मैं भी उम्मीद से हूं।
गप्पू: बस कर पगले…रुलाएगा क्या?
पप्पू: तो, हम साइकिल पर बात करें…?
गप्पू: येस। पप्पू, दरअसल मैं बहुत दिनों से पॉल्यूशन को लेकर चिंतित था। अभी करौना ने वक़्त दिया तो करीने से चिंतन कर पाया। मैंने सोचा कि कारों और स्कूटर-मोटरसाइकिलों पर प्रतिबंध होना चाहिए।
पप्पू: ग्रेट आइडिया। आगे।
गप्पू: मैं चाहता हूं कि हाईवेज़ पर सिर्फ बसें और ट्रक चलें और शहरों- क़स्बों में सिर्फ साइकिलें और साइकिल-रिक्शा।
पप्पू: साइकिल-रिक्शा क्यों? इक्का-तांगा-विक्टिरिया क्यों नहीं?
गप्पू: अच्छा सवाल है। मैं भी इस पर से गुज़रा। मैंने तो ऊंट और हाथीगाड़ी के बारे में भी सोचा। मोटरसाइकिल की जगह अरबी घोड़ों के बारे में भी सोचा। बच्चों को बड़ा मजा आता सच्चम-सच्च!!
पप्पू: और जो सड़क पर गिरता..फच्च-फचाफच्च। आय मीन हॉर्स शिट, कैमल शिट और एलीफैंट शिट। और इन सबका मूत। न पीने के काम आता न पिलाने के।
गप्पू: इस सबका इलाज़ तो था, पप्पू। जैसे कि सड़क पर डिवाइडर की जगह चौड़ा नाला बनवा देते और सड़क को हर दस मिनट में गुलाबजल से धुलवा देते।
लेकिन, विचार त्यागना पड़ा क्योंकि स्वच्छता मिशन पर सवाल उठने लगते।
पप्पू: मुझे 14वीं सदी के एक सुल्तान की याद आ रही है..
गप्पू: ज़्यादा मत बोलें। मैंने सम्पूर्ण इतिहास पढ़ रखा है… हां तो सुनो। मेरी प्लानिंग के मुताबिक शहर के अंदर आवाजाही के लिए साइकिल होगी और जो बूढ़े-बीमार हैं वे साइकिल-रिक्शा पर चलेंगे।
पप्पू: तो सबकी औकात एक हो जाएगी। कलक्टर साब और चपरासी साब, सब के सब साइकिलों में!!
गप्पू: तुम यार बोलते ही क्यों हो! मैं बोल तो रहा हूं। पहले, यह बताओ कि क्या रखने वाले सभी लोगों की औकात एक होती है? नहीं होती न?
तो सुनो, उसी तरह साइकिल वालों की औकात बराबर न होगी। अरे भाई, निम्न वर्ग पैदल चलेगा, निम्न मध्यम की साइकिल लोहे की होगी। मध्यम वर्ग स्टेनलेस स्टील की साइकिल पर होगा तो उच्च मध्यम चांदी, सोना और प्लेटिनम का इस्तेमाल कर अपनी गाड़ी की औकात बढ़ाएगा।
अब आइए उच्च वर्ग पर, दुनिया जिनकी मुट्ठी में होती है। ये लोग अपनी गाड़ियों में हीरे जड़वा कर रुआब ग़ालिब कर सकेंगे।
पप्पू: लेकिन, निम्न वर्ग की जनता जो पैदल होगी, क्या वह इन बेशकीमती गाड़ियों को पाने के लिए अमीरों के साथ लूटमार नहीं करेगी?
गप्पू: नहीं भाई। उनके दिमाग की कंडीशनिंग की जाएगी।
पप्पू: कैसे?
गप्पू: जैसे इन दिनों लॉकडाउन में हो रहा है। बड़े-बड़े शहरों में फंसे करोड़ो गरीबों ने दूसरों से उम्मीद ही छोड़ दी है। बस जो दे दो, उसी में खुश। कोई अधिकार नहीं। कोई सुविधा नहीं। बस काम काम और काम। वो जैसे तांत्रिक भूत-प्रेत को सिद्ध कर लेते हैं न, वैसे ही हम जनता को सिद्ध कर लेंगे। लाइक आ जॉम्बी वर्किंग फ़ॉर हिज़ मास्टर। दिमाग़ सुन्न/टुन्न और नज़रें झुकी हुई। सारी दुनिया की फैक्टरियां यहीं चल रही होंगी। 72 ट्रिलियन की इकॉनमी होगी। पूरा दक्षिण एशिया कहेगा:हम भी इंडिया। हुएनसांग, मेगस्थनीज़, मरकॉपोलो और इब्न बतूता के वंशज फिर आएंगे पहन के जूता और पढ़ेंगे नालन्दा, विक्रमशिला और तक्षशिला के संस्थानों में।
पप्पू: तक्षशिला तो पाकिस्तान में है
गप्पू: तब तक पाकिस्तान रहेगा ही नहीं
पप्पू: नौ मन तेल है?
गप्पू: कौन सी रेल?
पप्पू: बहरे बाबा, वो ब्राह्मण की कथा सुनी है जिसके पास मटका भर सत्तू था
गप्पू: नहीं
पप्पू: कल सुनाऊंगा।

– लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनकी कपोल-कल्पित बातचीत है। 

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