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कोरोना को भगवान की चिट्ठी, पढ़ कर हिल गईं सबकी चूलें

चिट्ठी से नास्तिकों और रेशनलिस्टों को फ़र्क़ नहीं पड़ा है। नास्तिकों तो साफ कहते हैं कि जब भगवान ही नहीं है तो उसकी चिट्ठी का क्या।

Coronavirus, COVID-19, Corona Casesसत्तू जी की फेक न्यूज… (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नई दिल्ली। कथित भगवान की चिट्ठी ने ईश्वर-भक्तों के बीच विचित्र स्थिति पैदा कर दी है। चिट्ठी में ऐसी-ऐसी बातें कही गई हैं कि उनकी सदियों पुरानी धार्मिक अवधारणाओं की चूलें हिल गई हैं। एक जगह उन्होंने लिखा है कि तुम लाख गंगा और गंगासागर नहा लो, मेरे लिए तुममें और बजबजाती नाली में लोटते-पलोटते सुअर के बच्चे में फर्क नहीं है। वह भी मेरा बच्चा है…शायद ज़्यादा अच्छा बच्चा।

चिट्ठी से नास्तिकों और रेशनलिस्टों को फ़र्क़ नहीं पड़ा है। नास्तिकों तो साफ कहते हैं कि जब भगवान ही नहीं है तो उसकी चिट्ठी का क्या। एक ने इस संवाददाता से कहा कि यह चिट्ठी उन्हीं xxxज़ादों की करतूत है। उधर, रेशनलिस्ट कर्तव्य पालन करते हुए चिट्ठी की ऑथेंटिसिटी पता करने में जुट गए हैं। ये बेचारे जानते हैं कि वे अप्राप्य लक्ष्य के लिए बुद्धि गला रहे हैं। पर आदत से मजबूर हैं। चिट्ठी की एक प्रति इस संवाददाता के पास है। यहां प्रस्तुत है उसका अविकल टेक्स्ट:

मेरे बच्चो
मैं भगवान हूं।
तुम सब को मेरा प्यार, झप्पी और किस।

यह पत्र पाकर तुम बड़े खुश हो रहे होगे?!! तुम से मेरा मतलब खुद को मेरी प्रतिकृति समझने वाले तुम आदमी लोग। ठीक है। खुश हो लो। वैसे, यह चिट्ठी मैंने सबको लिखी है। कोरोना को भी। अपना ही बच्चा है। अब तुम कहोगे कोरोना को चिट्ठी! कैसे मुमकिन है? तुम्हारी आस्था पर तरस आता है। वह जुलाहा याद आता है…अरे वो बनारसी जुलाहा…580 साल पहले राई और पहाड़ के ज़रिए बता गया था कि तुम कितने तुच्छ हो और मैं कितना उच्च। लेकिन तुम्हे जुलाहे से क्या मतलब। तुमको तो बस कपड़े चाहिए। रोज़-रोज़। नए-नए। रंगबिरंगे। चलो, तुम्हे वह दोहा सुना देता हूँ। थोड़ा ट्वीक करते हुए ताकि तुम्हें अंदाज़ हो जाए कि कोरोना के अंदर मेरी चिट्ठी कैसे घुस जाती है। तो, सुनो:

साहब से सब होत है, बन्दे से कुछ नाहि।
नैनो से गीगा करै, गीगा नैनो माहि।।

मानव, तू इसकी फ़िक्र छोड़ कि मैं कोरोना, क्रिल, प्लाज़मोडियम या उल्लुओं को चिट्ठी कैसे भेजी और अपने पर कंसन्ट्रेट कर। हे मानव, सोच कि आखिर क्या कारण है कि जो व्यक्ति छह मन्वन्तरों, यानी दो अरब साल से चुप था, उसे सातवें मन्वंतर के 2020 में क्यों अपनी भड़ास निकालनी पड़ रही है। कारण है तू। कई बार लगता है मैंने तुझे पैदा ही क्यों किया। तू, खुद सोच कि अगर तू न होता तो यह जग कितना सुंदर होता। ये पहाड़, नदियां, घाटियां,पशु-पक्षी–कितने निष्कलुष होते!

मैं जब चाहूं तुझे खत्म कर सकता हूं। मैं कोई धर्मात्मा नहीं परमात्मा हूं। इसी कोरोना का पावर बढ़ा दूं!बस।…या फिर तुम्हारी धरती माता के साथ डांस कर लूं।कुछ सेकंड के ट्विस्ट से तेरी गर्दन ट्विस्ट हो जाएगी। धरती का कुछ न बिगड़ेगा। वह तुझे धूल की तरह झाड़ कर सूर्यदेव की परिक्रमा में मस्त हो जाएगी।

लेकिन, मैं चाह कर भी तुझे खत्म नहीं कर पाता, कमीने। तू इतना एंटरटेन जो करता है, रे। एंटरटेनमेंट यानी मनोरंजन और मनोरंजन यानी आनंद। और, मेरा एक नाम आनंद भी है। आनंद स्वरूप। ये सुबह-सुबह की आरती, शंख घड़ियाल। भोग, 56 भोग। मैं विह्वल हो जाता हूँ। लगता है जैसे कोई नन्हा बच्चा अपनी माँ को अपने हाथ से खिला रहा हो। फिर, छह इंच के रज़ाई-गद्दे पर मेरे शयन का बंदोबस्त! मैं हंसने लगता हूँ। और चूंकि मेरे एंटरटेनमेंट का प्रोग्राम पूरी दुनिया में भांति-भांति से हर क्षण होता ही रहता है, इसलिए लगातार हंसता रहता हूँ। यह जो ब्रह्मांड में ॐ की गूंज व्याप्त रहती है, वह मेरी हंसी ही है। फर्क है!? अब भई, साहब और बन्दे की हंसी में फर्क तो होना ही चाहिए।

सच तो यही है कि मैंने यह सृष्टि ही बनाई थी अपने एंटरटेनमेंट के लिए। न बनाता तो क्या करता? मैं त्रिलोकीनाथ सहस्त्रनाममधारी भगवान अकेला था। इतना अकेला कि सिर पटकने के लिए एक पत्थर तक नहीं। कुछ नहीं। न धरती, न चांद-तारे। मैं खुद अपने अस्तित्व का अहसास नहीं कर पा रहा था। सच बताऊं तो अंडमान के जेल में तनहाई काट रहे बंदियों की जो दशा से भी बदतर दशा थी मेरी। मैं क्या करता। मैं भगवान था। न मर सकता था न माफी मांग सकता था(भगवान की चिट्ठी जारी, सृष्टि रचना के बारे में कल)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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