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अमीरों की बस्ती में मचा भगवान की चिट्ठी का शोर, सदमे में गए गरीब मजदूर

अनुभवी बुज़ुर्ग ने सिर हिलाया, न न न नो। कॉल समबडी हायर अप, से आवर कलेक्टर साब...इसके अंदर बायोलॉजिकल वेपन हो सकता है...एबीसी वारफेयर यू नो।"

Coronavirus, COVID-19, Corona Casesसत्तू जी की फेक न्यूज… (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नई दिल्ली। रविवार की सुबह लोगों को घर के मेन गेट के बाहर एक खूबसूरत, ख़ुशबूदार, चमकदार हरे क़ागज़ का लिफ़ाफ़ानुमा छोटा-सा पैकेट पड़ा मिला। लॉकडाउनजनित बेरोज़गारी और तद्जनित भुखमरी से पीड़ित गरीब लोगों ने इसे सांता क्लॉज का गिफ्ट माना और सुंदर रैपिंग के चीथड़े कर दिए। अंदर संतरे के रंग के कुछ 3-4 कागज़ थे। अंगूठाछाप मोबाइल चलाने वाले माइग्रेंट मज़दूर टाइप इन दरिद्र नारायणों ने क्रोध में आकर कागज़ों को फूंक कर चाय बना ली। ये चायखोर मूर्ख बाद में सदमे में चले गए, जब अमीरों की बस्ती में यह शोर मचा कि वह भगवान की चिट्ठी थी।

चिट्ठी की पहली लाइन थी
मैं भगवान हूं
और अंतिम लाइन थी
तुम्हारा भगवान।

अमीर, खुद को अमीर समझने वाले मध्यवर्ग और खुद को बीपीएल श्रेणी का न मानने वाले कथित निम्न मध्यम वर्ग की प्रतिक्रिया भिन्न थी।  एक अमीर ने पैकेट को देखते ही भयग्रस्त होकर चौकीदार को बुलाया। और, उसे दरोदीवार से दूर लॉन में रखा दिया गया ताकि फटे भी तो चौकीदार की…….नानी रोए न कि उनकी। अब अंदर चाय पर मंथन होने लगा। हर साल छह दिसंबर को सवामणी प्रसाद का वितरण करने वाले ग्रैंडफादर को लिफाफे का हरा रंग परेशान कर रहा था। उन्होंने अपने पुत्र को इसका इशारा किया। 50 वर्षीय युवा ने हामी में सिर हिलाया और बोला, “पुलिस को बुलाता हूं। यह उनके किसी स्लीपर मोड्यूल की कारस्तानी लगती हैं।”

अनुभवी बुज़ुर्ग ने सिर हिलाया, न न न नो। कॉल समबडी हायर अप, से आवर कलेक्टर साब…इसके अंदर बायोलॉजिकल वेपन हो सकता है…एबीसी वारफेयर यू नो।” “जी, पिता जी, क्या पता किसी ने इस पर अपना थूक मल दिया हो ” घर की मालकिन ने ससुर के सुर में सुर मिलाया। “हां, बहू हो सकता है किसी ने कोरोना पीड़ित रोगी की खखार ही चुपड़ दी हो।”
“स्टॉप, स्टॉप दादाजी, स्टॉप ऑर आयम गोन्ना प्यूक..” नई पीढ़ी के किशोर पौत्र ने उल्टी आने अभिनय करते हुए ग्रैंड फादर को बरजा। अंत में उसने बड़े धीमे से मानो खुद से कहा, “डर्टी ओलमैन।”

“आप लोग नॉर्मल बिहैव क्यों नहीं करते?..बहुत से लोग सोनू सूद की तरह गरीबों की मदद कर रहे हैं। चुपचाप” घर का सबसे छोटा मेम्बर गुस्सा हो उठा था। वह रुका नहीं, “हो सकता है कि कोई आदमी ओरिजिनल सांता क्लॉज की तरह गरीब घरों की मदद कर रहा हो। दरअसल, कहना नहीं चाहिए बट यू आर हॉन्टेड बाय योर पास्ट।” इतना कह के यह लड़का बाहर निकला और उसने लॉन पर पड़े लिफ़ाफ़े की मोटी धार वाली रबर से इस बुरी तरह धुलाई की कि लिफ़ाफ़ा गल कर लुगदी बन गया।

इस बीच बस्ती के कई घरों से शंख, घड़ियाल के बीच भए प्रगट कृपाला का सस्वर पाठ शुरू हो गया था। यह शोर मचने लगा था कि भगवान ने सबके पास चिट्ठी भेजी है। यह शोर इस घर तक भी पहुंचा जहां भगवान के खत की मिट्टी पलीद कर दी गई थी। दादा-दादी, पापा-मम्मी सब बाहर लॉन की तरफ भागे। किशोर अब भी पानी की धार से लुगदी बन चुके लिफ़ाफ़े की इहलीला खत्म करने में जुटा था। दादा जी दौड़ कर उस लुगदी के ऊपर लेट गए।उनके हाथ में कागज़ के चंद रेशों के अलावा एक नन्हे से मोरपंख कुछ नहीं आया।

“भगवान का मुकुट मिल गया…भगवान का मुकुट मिल गया” हर्षातिरेक में दादा जी के आंसू बह रहे थे। वे मोरपंख को बारबार माथे में लगा रहे थे। दादा जी का पोता मुस्कुरा रहा था। उसके मन में आया कि बता दे कि मोरपंख लिफ़ाफ़े में नहीं था। वह तो शाम को एक मोर नाचते-नाचते लॉन में गिरा गया था। कई पर थे। एक उसने भी रख लिया था। अब भी ज़ेब में पड़ा था। (पत्र में लिखा क्या था: पढ़ें कल)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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