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व्यंग्य: एक सुअर के बच्चे की सद्गति

Humour: वह कोरोना से नहीं, सड़क हादसे से मरा था। कुल 10-15 दिन की उम्र रही होगी उसकी। गोरा था। अंग्रेज़ों जितना गोरा। एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने कहा–माxxxx को यहीं मरना था..सूअर का बच्चा!! हां, मरने वाला सुअर का बच्चा ही था।

coronavirus, covid-19, covid deaths, कोरोना वायरस, कोविड-19, कोरोना से मौतेंप्रतीकात्मक तस्वीर…

नई दिल्ली। वह 11 घंटे तड़पा। उसके शरीर ने तीन घण्टे अंत्येष्टि की प्रतीक्षा की। अंत में एक बड़ी गाड़ी उसे समेट ले गई। यूं तो उसके पास पारिजात एनक्लेव की पूरी बस्ती मौजूद थी, पर उसका सगा-अपना कोई न था। माता-पिता, भाई-बहन, संगी-साथी उसके दम तोड़ने के पहले ही वहां से जा चुके थे।  ना-ना-ना। ग़लत सोच रहे हैं आप। वह कोरोना से नहीं, सड़क हादसे से मरा था। कुल 10-15 दिन की उम्र रही होगी उसकी। गोरा था। अंग्रेज़ों जितना गोरा। बेला, हरसिंगार और रजनीगन्धा से गमकती और गुलमोहर के दरख़्तों तले बसी इस कॉलोनी पहले कभी ऐसे हादसे से गुज़री ही न थी। लोगों की प्रतिक्रया उत्तर भरतीय मानक पर सामान्य थी। बानगी: एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने कहा–माxxxx को यहीं मरना था..सूअर का बच्चा!!

हां, मरने वाला सुअर का बच्चा ही था।  सोमवार की रात वह अपने संगी-साथियों के साथ पारिजात कॉलोनी की सड़कों-गलियों में उछलकूद कर रहा था कि एक तेज़ रफ़्तार दुकाटी से टकरा गया। उसका सर फट गया। बेहोश हो गया। पास ही खेल रहे कुछ बच्चे भाग कर वहां गए। सर से खून बह रहा था और वह करवट पर पड़ा तड़प रहा था। जैसे साइकिल चलाते हैं न, उसके चारो पैर वैसे ही चल रहे थे। “इट्ज़ अ बेब, वो मूवी देखी है न …बिलकुल उसी के हीरो जैसा है ये” एक लड़के ने कहा।

दूसरा बोला, “अरे-अरे-अरे!!देखो तो यह मर रहा है। कित्ता खून बह गया बेचारे का…मैं जाता हूं, पापा को लेकर आता हूं.. मेरे पापा डॉक्टर हैं, यू नो।” बालक घर पहुंचते ही पिता को बाहर चलने के लिए खींचने लगा। “क्या है!?” डॉक्टर ने सख्ती से डपटा तो बच्चा बोला, “पापा, सड़क पर एक बेब घायल पड़ा है। चलिए उसे बचा लीजिए।”

डॉक्टर बच्चे के साथ बाहर मौके पर गया तो वहां भीड़ लगी थी और एक नन्हा-सा सुअर पड़ा तड़प रहा था। डॉक्टर साहब को माजरा समझ में आ गया था। लेकिन वे अपने बच्चे की आंख में आंसू भी देख रहे थे। उन्होंने बच्चे को गोद में उठा लिया और पुचकार कर बोले, “लेकिन बेटा मैं तो आदमियों का डॉक्टर हूं, जानवरों के डॉक्टर दूसरे होते हैं।”
डॉक्टर अपने बच्चे के साथ वापस चल दिए। इस बीच बाकी लोग भी बच्चों को डांट-डपट कर घर की ओर भगाने लगे। बच्चों का बेब अब भी साइकिल की तरह पांव चला रहा था।

डॉक्टर के बच्चे ने अभी हार न मानी थी। घर जाकर उसने पाप से डॉगी के डॉक्टर खन्ना जी को फोन कराया। डॉक्टर खन्ना ने भी बच्चे को समझा दिया, “मैं डॉगी और गौमाता का डॉक्टर हूं। बेब के डॉक्टर को कसाई कहते हैं।” उनींदा बच्चा थोड़ी देर तक बेब-बेब रटता रहा। फिर सो गया। उधर, सुअर जनित खून-खच्चर और गन्दगी से परेशान बस्ती वाले रात में ही एक घर मे विचार विमर्श के लिए बैठ गए। सबसे पहले बॉडी के डिस्पोजल की बात उठी तो सबने माना कि थोड़ी देर में कुत्ते नाले की तरफ जंगल में खींच ले जाएंगे। सुबह कुछ खून के धब्बे होंगे वे पानी की धार से मिट जाएंगे।

“आपकी सोच गलत है” मनसुख भाई ओझा ने कहा, “यहां रहते 50 साल हो गए हैं मुझे, कभी भी किसी ने अपने या पराए कुत्ते को, गोश्त तो दूर अंडा भी खिलाया है किसी ने?…देखना बस्ती के कुत्ते कुछ न करेंगे।” “तो, सफाई करने वाले से कहेंगे” जैन साहब ने कहा। “वो, सफाई वाला सुरेंद्र? वो न उठाएगा। उसकी बिरादरी ने एक साल पहले घोषणा की थी कि वो लोग अब मुर्दा जानवरों को नहीं उठाएंगे” पटवर्धन शास्त्री ने बताया। “समझाएँगे उसे, मान जाएगा” जैन ने उम्मीद जताई।

सत्तू जी की फेक न्यूज…

“नहीं भाई। वो नहीं मानेगा। एक साल पहले उसने एक मुर्दा बछिया उठाई थी। जंगल ले जाकर वह खाल निकाल रहा था तो भीड़ ने हमला कर दिया था। लिंच होते बचा था।” शास्त्री जी ने समझाया। “ठीक है, सुबह की सुबह देखी जाएगी” विदेश सेवा से रिटायर्ड शान्तनु गांगुली बोले,”लेकिन, हमे इन आवारा सुअरों और गायों का बंदोबस्त करना होगा…अरे, मैं इस्लामाबाद में रहा हूं। इस लिहाज से पाकिस्तान हमसे बेहतर है कि वहां एक भी सुअर नहीं है..एक बार मरगल्ला हिल्स के जंगल से एक बनैला शूकर इस्लामाबाद आ गया था, तब उसे पकड़ने के लिए पूरी फौज लगा दी गई थी।”

रात 12 बज़े मीटिंग खत्म हो गई। सुबह 6 बज़े लोगों ने देखा, सुअर मरा नहीं था। उसके आसपास तीन कुत्ते बैठे थे और उनसे थोड़ी दूर पर कुछ चीलों और कौओं का झुंड। कौए जैसे ही सुअर की ओर बढ़ते, कुत्ते उनको खदेड़ देते। करीब नौ बजे सुअर ने दम तोड़ दिया। कुत्तों ने तब भी कौओं को लाश छूने न दी। क्या किया जाए? इस पर चर्चा चल ही रही थी कि बड़ा ट्रक गुज़रा और उसके पिछले टायरों पर वह नन्हा शरीर कुछ इस तरह आया कि सड़क पर एक लाल धब्बे के सिवा कुछ न बचा। कुछ बाल्टी पानी के साथ पारिजात कॉलोनी पहले जैसी हो गई। रात में डॉक्टर के बच्चे ने बाप से कहा,

“पापा, बेब सुबह तक मेरा नहीं था।” “कैसे मालूम, बेटू को?” “पापा, मैं सुबह जब आप सो रहे थे तो बेब को पानी पिलाने गया था। मैंने पानी डाला तो उसने जीभ से चाटा था। उसने आंखें खोल कर मुझे देख भी था।” “अच्छा। अब खूब रगड़ के नहाना। ओके?” “और पापा, एक और बात बताऊं?” “हां, बेटू” “पापा, बेब ने मुझे थैंक यू भी कहा था। सच्ची। मैंने सुना था”…

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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