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किस्सा तब का है जब कटिहार-अमृतसर एक्सप्रेस का नंबर 5707/5708 हुआ करता था…

पप्पू जी कहीं चले गए हैं। बहुत ढूंढने के बाद जब वे नहीं मिले तो हमने गप्पू जी से रिक्वेस्ट की वे अकेले ही बाइट दे दें तो वे राज़ी हो गए। बोले, मैं किस्सागोई करूँगा। किस्से मनगढ़ंत होंगे पर किसी व्यक्ति को आहत होने की अभिलाषा हो तो उसे छूट होगी। हमने गप्पू जी का नाम अब सत्तू कर दिया है। यह उन्हीं के सुझाव पर किया है। उनका कहना है कि झूठ की दाल सत्य के तड़के के बिना खाते नहीं बनती। तो, पेश हैं सत्तू जी की असत्य कथाएं...अजय शुक्‍ल के कपोल-कल्‍पित शब्‍दों में...

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सवाल है कि बिहार के गरीब आदमी के कष्ट कब मिटेंगे? सरल सा जवाब है, जब वह चाहेगा। मगर उसने तो मान लिया है कि उसके अंदर दुख, अपमान और गलाज़त सहने की अंतहीन क्षमता है। सबसे बड़े बिहारी बाबू अशोक ने बुद्ध को अपना लिया और अपने सद्कर्मों के प्रचार के लिए शिलालेखों के काम में मस्त हो गए। दूसरी ओर उनकी प्रजा चत्वारि आर्य सत्यानि के पहले सत्य यानी दुख के आगे यह जान ही नहीं पाई कि कष्ट से निजात पाने का मार्ग भी है।

उसी अशोक के बनवाई जीटी रोड पर हांफते-भागते बिहारी को ज़रा ध्यान से देखना। लगेगा, चेहरे पर मुस्कान रह-रह कर सिसक रही है। मैं जो झूठी दास्तान सुनाने जा रहा हूं वह बीस साल पुरानी है। इसके दुखभोक्ता पात्र शायद आज के सड़क नापते माइग्रेंट्स के माता-पिता रहे होंगे। तो, सुनेंं। किस्सा तब का है जब कटिहार-अमृतसर एक्सप्रेस का नम्बर 5707/5708 हुआ करता था।

2001 के अप्रैल की बात है। मैं जालंधर के एक संस्थान में सहाफत करता था। (अगर सहाफत का मतलब नहीं जानते तो अच्छा है। मैं चाहता भी नहीं कि आप जानें)। प्राइवेट नौकरी, नाईट ड्यूटी। और, तिस पर अंडर स्टाफिंग। घर यानी नौ सौ किमी दूर कानपुर जाने का मौका कब मिलेगा पता नहीं होता था। ये समझिए कि छुट्टी की स्थायी अर्ज़ी लगी रहती थी। बॉस को जब खुशी होती तो रात एक-दो बज़े चंद दिनों की छुट्टी दे देता।

इस हालत में मैं एक भी दिन नष्ट किए बिना तड़के जालंधर रेलवे स्टेशन को भागता। बिना आरक्षण। मेरी ट्रेन होती थी वही कटिहार-अमृतसर। छूटती थी आठ बजे।

यह पहली यात्रा का ब्यौरा है। मैंने खूब तैयारी की। खूब अच्छे कपड़े पहने। अलग दिखने के लिए कपड़ों पर खशबू भी उड़ेली और ट्रेन आने के एक घण्टा पहले स्टेशन पहुंच गया। वहां सबसे पहले मैंने सिडनी शेल्डन का नॉवेल खरीदा और अपनी सहाफत और ओढ़ी गई साहबी के बल पर आरक्षण पाने की जुगत भिड़ाने लगा। मगर न एसी में जगह थी और न स्लीपर में। मैंने जनरल डिब्बे में यात्रा करने का फैसला कर लिया। नॉवेल मेरे पास है। बस विंडो सीट मिल जाए। मैंने सोचा, 10-11 घंटे तो यूं ही कट जाएंगे। मैं कितना ग़लत था!!!

ट्रेन के आते ही मैं सरदारों के बीच कनपुरिया स्टाइल अपनाते हुए मैंने सिंगल सीट विंडो पर कब्ज़ा कर लिया। डिब्बा भर गया पर कोई रेलमपेल न थी। ज़्यादातर लोग नौकरीपेशा डेली पैसेंजर थे। जालंधर और लुधियाना के बीच यात्रा करने वाले।

Coronavirus, Covid-19 पप्पू और गप्पू की बकैती (प्रतीकात्मक तस्वीर)

लुधियाना में खूब जगह हो जाएगी! मैंने खुश होकर किताब खोल ली। धर्मेंद्र के गांव साहनेवाल होते हुए गड्डी कब लुधियाना लग गई मैं जान ही नहीं पाया। होश तब आया जब मेरे घुटनों पर सामने वाले मुसाफिर के घुटने गड़ने लगे। मैंने नज़र उठाई। सामने तीन ‘भइया’ बैठे थे। दाहिनी ओर गैलरी आदमियों और गठरियों से अंटी पड़ी थी। एक आदमी सिर पर बोरा लिए इशारा कर रहा था कि मैं पांव उठा लूं तकि वह दो सीटों के बीच की जगह में अपना बोझ रख सके।

मेरी पीढ़ियों से वातानुकूलित कुलीनता उबलने लगी। तभी मेरी नज़र उस आदमी के पांव पर पड़ी। वेरिकोज़ वेन्स से ग्रस्त उसकी टांगें भार के कारण थरथर कांप रही थीं। मेरा मन पिघला। मेरा बरसों सद्साहित्य पढ़ना उस गरीब के काम आया। मैंने घुटने मोड़ कर पांव सीट पर रख लिए। तब तक बोरे पर सात या आठ साल का बच्चा बैठ चुका था।

अभी ट्रेन चली नहीं थी। गरमी शबाब पर थी और ओवरपैक डिब्बे में हवा आने की कोई गुंजाइश नहीं। मुसाफिरों के शरीर के छोटे बड़े रंध्रों से निकल रही द्रवीभूत और गैसीभूत बदबू वातावरण में घुल रही थी। तभी सामने वाले लड़कों ने झालमूड़ी निकाल ली। मैं बुरी तरह प्यासा था। उबकाई आने लगी। मैंने देखा कि मुसाफिर सामान सेट करने के बाद सामान्य हो चुके थे। गप्पें होने लगी थीं। कहीं बज्जिका सुनाई द रही थी तो कहीं छपरा वाली भोजपुरी। मैथिल, अंगिका भी सुनाई दे रही थी और पुरैनिया की बांगला मिश्रित बोली। बाप रे बाप!! इत्ता बड़ा बिहार। सिर्फ उत्तर बिहार। नन्हे से डिब्बे में समा गया था। और बास मार रहा था।

ट्रेन चल दी थी और हवा किसी तरह अंदर आने का रास्ता बना पा रही थी। उपन्यास पढ़ने की कोई गुंजाइश न बची थी। हां उसका और अच्छे कपड़ों का एक असर था कि मेरी सीट पर मैं अकेला था, हालांकि उकडूं। ट्रेन खन्ना और राजपुरा क्रॉस कर हरियाणा की सीमा में प्रवेश कर रही थी। तभी डिब्बे के भीतर से मरणांतक पीड़ा से भरा चीत्कार सुनाई दिया। एक मर्दानी मगर बूढ़ी आवाज़ में कोई चीख रहा था, मुआ देलस रे..मुआ देलस रे (मार डाला, मार डाला)। इसी के साथ लाठी चलने की आवाज़ भी सुनाई देने लगी। मैं उठकर देखने की स्थिति में नहीं था। मैंने सामने मूढ़ी खाते लड़कों से उठकर देखने को कहा। वे नहीं हिले। मूढ़ी खाते रहे।

आर्तनाद और लाठी की चटकार बढ़ती जा रही थी। मेरे अंदर का भला मानस, बुरा कानपुर और सहाफी एक साथ उबल पड़ा: कउन है बे माxxx!! मैं पूरी ताकत लगा कर हुमक के उठा। भीड़ ने मुझे स्पॉट पर जाने का रास्ता दे दिया। (कौन लाठी चला रहा था, क्यों चला रहा थ और कौन था पिटने वाला: पढ़ें कल)

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)

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