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Humour: मजदूरों की यात्रा राष्ट्रहित के खिलाफ, सवाल मुझे पसंद नहीं

Humour: पप्पू: साफ है कि मज़दूरों की इस भागदौड़ से कोविड 19 फैलता है। यह तो राष्ट्रहित के खिलाफ हुआ न? चलो, मज़दूरों की छोड़ो...

प्रतीकात्मक तस्वीर.

पप्पू: गप्पू, बहुत बड़ी खबर है…

गप्पू: क्या है बच्चा! अम्मा ने शादी तय कर दी क्या?
पप्पू: अरे अंकल!! इस उमर में भी दिमाग़ में शादी और लड़कियां…!
गप्पू: सताओ नहीं, पप्पू…इस लॉकडाउन ने पहले ही दुखी कर रखा है।
पप्पू: पिछली बार की बन्दी यानी नोटबन्दी में तो बहुत खुश थे। लम्बी-लम्बी लाइनें देखकर खूब ताली बजाया करते थे…वैसे हुआ क्या? खासे हट्टे-कट्टे तो दिख रहे हो…बस ये दाढ़ी-मूछ के बाल थोड़ी गुस्ताखी कर रहे हैं।…
गप्पू: तुम न समझोगे…
पप्पू: आपकी आंखें लाल हैं। खांसी और बुखार तो नहीं? टेस्ट करा लो…आखिर हो तो सीनियर सिटीज़न ही।
गप्पू: पप्पू जी, आप स्वनामधन्य हैं। यह भी नहीं जानते कि मैं योगी हूं, कभी बीमार नहीं पड़ता। योगा-डे पर मुझे देखा नहीं था?
पप्पू: येस..येस। सॉरी। भूल गया था। अच्छा याद दिलाया.. योगा-डे तो फिर आने वाला है।
गप्पू: हां मित्र हां। योगा-डे का भूत ही तो सर पर नाच रहा है…इतनी चिंता कि सो नहीं पाता।
पप्पू: लो, कल्लो बात!! आपको काहे की चिंता जोगी जी…भुजंगासन से लेकर सिंहासन तक सारे आसन तो आप कर लेते हो..
गप्पू: बालक, सुलगाओ नहीं। जानता तो मैं धोबीपछाड़ भी हूं।
पप्पू: एक तो आप गुस्सा बहुत करते हैं योगिराज। क्या सीधे आसनों पर उतर आए थे…यम-नियम बाइपास कर गए थे? खैर, छोड़िए। मित्र कहते हो तो समस्या भी बता दो।
गप्पू: दोस्त, क्या बताऊं। मेरी तोंद निकल आई है
पप्पू: कितने इंच की है?
गप्पू: मत पूछ, छाती छोटी हो गई है।
पप्पू: फिर तुम काहे के योगी?!! क्या लॉकडाउन में आसन-वासन त्याग दिए?
गप्पू: सब कुछ योगा से थोड़े ही होता है। शरीर को छरहरा रखने के लिए घूमना भी पड़ता है। पप्पू, तुमको तो पता ही है, दो महीने हो गए, मैं अमरीका-इंग्लैंड तो दूर, केदारनाथ तक नहीं जा सका।
पप्पू: योगा डे अभी एक महीना दूर है। इन माइग्रेंट मज़दूरों के साथ एक क्रॉसकंट्री दौड़ लेते हैं। असली वाली। जामनगर से सिलचर या लेह से कन्याकुमारी!! सारी चर्बी छँट जाएगी। फिर योगा डे में चिकोलाइट बनकर सबका मन मोह लेना।
गप्पू: ना भाई ना। मुझसे न हो पाएगा।
पप्पू: तब तो करौना देवता की प्रार्थना करो
गप्पू: क्या?
पप्पू: यही कि हे वाइरस कुलदीपक करौना जी,जिस तरह आपने रामनवमी, रमज़ान और ईद घर के भीतर मनवाई है, वैसे ही इस बार अंतरराष्ट्रीय योगा डे भी घर के अंदर मनवाना…
गप्पू: कितनी घटिया, ओछी सलाह दी है तूने, पप्पू। मुझको राष्ट्रद्रोह के लिए उकसा रहा है। मैं कभी किसी करौना के आगे न गिड़गिड़ाऊंगा। राष्ट्रहित सर्वोपरि है.
पप्पू: अच्छा ये बताइए कि सड़कों पर भागते मज़दूर राष्ट्रभक्त हैं या राष्ट्रद्रोही?
गप्पू: इसमें क्या! कुछ राष्ट्रभक्त होंगे कुछ राष्ट्रद्रोही। इट्स ईज़ी। कपड़ों से पहचान लो।
पप्पू: म’गॉश!! यू आर इम्पॉसिबल!! छोड़ो। ये बताओ कि मज़दूरों की यह उड़मड़ टांडा से झुमरीतिलैया की यात्रा राष्ट्रहित में है या ख़िलाफ़?
गप्पू: उनकी यात्रा उनके हित में है
पप्पू: और राष्ट्र के?
गप्पू: तुम बताओ। मुझको सवाल वैसे भी नापसन्द है..
पप्पू: साफ है कि मज़दूरों की इस भागदौड़ से कोविड 19 फैलता है। यह तो राष्ट्रहित के खिलाफ हुआ न? चलो, मज़दूरों की छोड़ो। ये नेता लोग जो इनके लिए ट्रेन और बस का इंतज़ाम कर रहे हैं, उनके बारे में क्या विचार है? बोलो, गप्पू बोलो।
गप्पू: यार, तूने उलझा दिया। वो तूने शुरू में किसी बड़ी खबर के बारे में बोला था, क्या थी वह?
पप्पू: उसकी चर्चा अगली मुलाक़ात में।

– लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनकी कपोल-कल्पित बातचीत है।

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