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“हमरा का ई पुड़िया न चाही”, मैंने एक लंबी सांस खींची..गोस्वामी जी फिर गुनगुनाए…

आततायी 12-14 से अधिक नहीं थे लेकिन कमर्शियल सामान के पैकेट बहुत ज़्यादा थे। ट्रेन खुलने से पहले ही सीटों पर पहले से बैठे पचासों लोग सिर झुका कर खड़े हो गए थे।

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पुरानी दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन बस रुकी ही थी कि कोच के दोनों छोरों में कोलाहल मच गया। मारपीट और गाली-गलौज। मेरी सीट कोच के मध्य में थी। इस बार मुझे उत्सुकता व्यक्त करने की ज़रूरत ही न पड़ी। क्योंकि दोनों छोरों से भीड़ का रेला और मारपीट करने वाले 10-12 सेकंड में मेरी ही तरफ आ गए थे।
“सीट खाली कर…” पीटने वाले पश्चिमी यूपी की सीधी, खुरदरी एवं खड़ी बोली का इस्तेमाल कर रहे थे। निवेदन को असरदार बनाने के लिए मा, बहन, नानी जैसे शब्दों का खुल कर इस्तेमाल हो रहा था। इनके बेअसर रहने पर। थप्पड़, घूंसा और दोफिटे रूलर भी चल रहा था। ऊपर की सीट पर बैठे किसी लड़के ने हिम्मत दिखाई तो उसे सर के बाल पकड़ कर नीचे फेंका जा रहा था।
आततायी 12-14 से अधिक नहीं थे लेकिन कमर्शियल सामान के पैकेट बहुत ज़्यादा थे। ट्रेन खुलने से पहले ही सीटों पर पहले से बैठे पचासों लोग सिर झुका कर खड़े हो गए थे। उनकी सीटों पर या तो गुंडे बैठे थे या उनका समान रखा था। मेरी अपनी सीट सुरक्षित थी। मेरा लिबास, बोलने का लहज़ा और गोद में पड़ा अंग्रेजी की किताब मुझे बचा रही थी। एक बार एक गुंडे की आंखों से मेरी नज़र टकराई भी। मैंने इशारे में पूछा भी कि क्या मैं भी सीट खाली कर दूं तो उसने सज्जनता से हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं सर, आप तो अपने साथ के हो, बड़े भाई हो।” गुंडे की इस भलमनसाहत के चलते मैंने सामने बैठे छपरा के तीन मज़दूरों की सीट बचा ली थी। जालन्धर से साथ-साथ आ रहे थे ये तीनों। दोस्ती सी हो गई थी।
ट्रेन चल पड़ी थी। गुंडे भाई सेटल हो चुके थे। भइया बिरादरी को कोई परेशानी नहीं थी। जिनकी सीट बची थी वे बैठे थे और जो खड़े थे, वे भी गपियाने में मशगूल हो चुके थे। इसी को तो कहते हैं स्थतिप्रज्ञता!!
मैं खिड़की से बाहर झांकने लगा। शाहदरा..साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद.. दादरी गुज़रते जा रहे थे। मैं ढलती शाम का लुत्फ ले रहा था। इधर, गुंडे भाई ताश की गड्डी निकाल चुके थे। मैं उन्हें देखने लगा। कटपत्ता खेल रहे थे। तभी एक गुंडे ने आवाज़ लगाई, “अरे चच्चा, दो पैसा तू भी कमा ले…आ जाओ, इधर..हम संभाल लेंगे।”
थोड़ी देर में चच्चा नमूदार हो गए। 60 पार की उम्र। बकरा दाढ़ी। लम्बी मटमैली क़मीज़ और उतना ही गंदला अलीगढ़ी पाजामा.. पांयचे एड़ी से छह इंच ऊपर। उनके हाथ में एक झोला था, जिसमें से उन्होंने लिफाफा निकाला और मज़मेबाज़ों की स्टाइल में बोलने लगे, “भाइयो-बहनो, सिर्फ बीस रुपए.. सिर्फ बीस रुपए है कीमत इसकी और इसके अंदर रखा है खज़ाना: एक आईना, एक कंघी, एक डॉटपेन और हाज़मे वाली हींग की गोली।”
यह सारा सामान बीस साल पहले 4 या 6 रुपए में खरीदा जा सकता था। आईना वही था दो इंच व्यास वाला जिसे मदारी का बन्दर रखता है। कंघी, पांच इंची। डॉटपेन अठन्नी वाला और हींग गोली भी चवन्नी वाली।
इस बीच चच्चा खामोश हो चुके थे और झोला एक 16 साल के किशोर को थमाया जा चुका था। यह लड़का कागज़ के ये पाउच एक-एक कर हर मुसाफिर को थमाए जा रहा था। कोई आनाकानी करे, उससे पहले लड़का आगे बढ़ जा रहा था। वैसे आनाकानी करने की हिम्मत किसी में बची भी नहीं थी। शायद इसी मकसद के साथ ही वे पीटे गए थे!
झोले वाला लड़का शनैःशनैः मेरी सीट के निकट आ रहा था। मैं कनखियों से देख रहा था और डर रहा था। जान चुका था कि कनपुरियों द्वारा ईजाद की गई लूट की पद्धति टप्पेबाज़ी का यह अलीगढ़ी संस्करण है। मुझे विश्वास था कि अगर मैंने विरोध किया तो कुटाई पक्की है। आखिर, टप्पेबाजों की रोज़ी का सवाल था। मुझे हथेलियों में नमी महसूस हो रही थी। मेरे मन के महासागर में गांधी और भगत सिंह की बहादुरी तथा आदमी के अंदर आत्मरक्षा के लिए ईश्वरप्रदत्त, इनबिल्ट कायरता एक साथ हिलोरें मार रही थी।
सहसा मैं चौंक पड़ा। किसी ने मेरे घुटने पर ठकठक की थी। देखा तो सामने छपरा वाला मज़दूर मुखातिब था।”ज़रा सुनीं… ” वह बड़ी धीमी आवाज़ में बोला कि कोई और न सुन पाए।
“का बा?” मैंने पूछा।
“हमरा का ई पुड़िया न चाही।”
इसके बाद तो मैं उस स्थिति में आ गया था, जिसमे हीरो को कहना पड़ता है कि एक बार कमिटमेंट कर लिया तो फिर मैं अपनी भी नहीं सुनता। मैं क्या करता? गोस्वामी जी मेरे कान में लगातार गा रहे थे
…शरणागत का जे तजहिं निज अनहित अनुमान…ते नर पांवर पापमय तिनहि बिलोकति हानि..।
मैंने एक लंबी सांस खींची..गोस्वामी जी फिर गुनगुनाए..
सौरज धीरज तेहि रथ चाका/सत्यशील दृढ़ ध्वजापताका
“परेशान न हो।” मैंने छपरा वाले को अभयदान दे दिया। इस बीच वह लड़का उसकी गोद में पाउच डाल कर आगे बढ़ गया था। बहरहाल, मुझे बख्श दिया गया था। मुझे इससे बड़ा बल मिला।
अब तक पाउच बंट चुके थे। टप्पेबाज़ी का बस अंतिम चरण बाकी था। इसके लिए बलिष्ठ शरीर के दो बदमाश निकले और पाउच की कीमत वसूलने में जुट गए।
“बीस रुपए…बीस रुपए..बीस रुपए।” एक गुंडा बोलता जा रहा था। लोग बिना हीलहुज्जत के रकम निकलते जा रहे थे। सिर्फ दो ने नानुकुर की तो एक घूंसे, दो लप्पड़ में ढीले हो गए।
वसूली टीम अब मेरे पास आ रही थी। मेरी धुकधुकी बढ़ रही थी। शरणागत की और अपने सम्मान की रक्षा करनी थी। मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी।
वसूली टीम छपरा वाले मज़दूर के सामने आ चुकी थी। वह गुंडों को बिसूरने लगा। “अबे, मा के xxx टुकुर-टुकुर क्या देख रहा है..चल निकाल बीस रुपए।”
“साहब की तरफ क्यों देखता है रे, वो क्या करेंगे तेरा।” गुंडों ने उसे हड़काते हुए एक नज़र मेरे चेहरे पर भी डाली।
यह आंखों के ज़रिए ताल ठोकने जैसा था। अब रुक पाना सम्भव नहीं था। मैं बोला, “यह लड़का आपका सामान नहीं खरीदना चाहता।”
“तू कैसे जानता है?” गुंडे अब मेरी तरफ मुड़ चुके थे। “मुझको मालूम है”
“कर साबित…नहीं तो तेरी साहबी अभी घुसेड़ दूंगा।”
मैंने वह पाउच उस मज़दूर से ले लिया। फिर मज़दूर से बोला,”बताओ, तुम्हे यह चाहिए कि नहीं।”
“नहीं चाही, नहीं चाही, नही” मज़दूर हिम्मत दिखा रहा था।
मैंने गुंडों से कहा, अब बोलो?

तू इस लफड़े में न पड़, गुंडे मुझे समझाने लगे। पर मैं नहीं माना। वे भी नहीं माने। उनकी ज़िद थी कि पाउच वापस मज़दूर को दे दूं।
“पाउच बीस रुपए का ही है न?” मैंने यह सवाल गुंडों की तरफ उछाला और साथ ही उस पाउच को चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।
गुंडे हक्का बक्का थे। पर मैंने उन्हें रीएक्शन का मौका ही नहीं दिया। मैंने एक हाथ में 20 का नोट पहले से थाम रखा था। मैंने वह नोट गुंडों को थमा दिया। गुंडों के चेहरे पर विचित्र से भाव थे। शायद वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे जीते हैं या हारे। दरअसल, जानता तो मैं भी नहीं था कि ये हार है या जीत।
इस बीच ट्रेन अलीगढ़ के आउटर पर खड़ी हो गई थी। गुंडे भाई वहीं उतर रहे थे। और मज़दूर भाई उन सीटों पर दोबारा काबिज हो रहे थे, दिल्ली में छीन ली गई थीं। सामने वाला छपरैया मज़दूर मुझे कृतज्ञ भाव से देख रहा था। कुछ मज़दूर आपस में बात कर रहे थे..अब बस एक ही बैरियर है कानपुर का। उसके बाद गुंडे नहीं मिलेंगे।
कानपुर में मैं उतर गया। नहीं जान पाया कि मेरे शहर के गुंडों ने इन भोलेभाले लोगों को कैसे लूटा।
चलते चलते इतना और बता दूं कि एक माह बाद मैंने इसी ट्रेन की जनरल बोगी से फिर यात्रा की थी। मैं इन श्रमिकों को लड़ने के लिए प्रेरित करता रहा। वे नहीं लड़े और लुटते पिटते रहे। काश ऐसा नहीं होता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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