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क्या होते हैं मूल नक्षत्र, जानिए ज्योतिष में क्या है इसका महत्व

मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा नक्षत्र मुख्य मूल नक्षत्र हैं, अश्विनी, रेवती और मघा सहायक मूल नक्षत्र हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर 6 मूल नक्षत्र हैं। अश्विनी, आश्लेषा, मूल, मघा, ज्येष्ठा, मघा और रेवती, जब बालक का जन्म इनमें होता है तो उसके स्वास्थ्य की स्थिति संवेदनशील होती है।

मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा नक्षत्र मुख्य मूल नक्षत्र हैं

ज्योतिष की सटीक व्याख्या और फल के लिए नक्षत्रों पर विचार किया जाता है, नक्षत्रों के अलग-अलग स्वभाव होते हैं। उनके अलग-अलग फल भी होते हैं, कुछ नक्षत्र कोमल होते हैं, कुछ कठोर और कुछ उग्र होते हैं। उग्र और तीक्ष्ण स्वभाव वाले नक्षत्रों को ही मूल नक्षत्र, सतईसा या गंडात कहते हैं। जब बालक इन नक्षत्रों में जन्म लेता है तो विशेष तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। इन नक्षत्रों में जन्म लेने का असर सीधा बच्चे के स्वभाव और सेहत पर पड़ता है।

कौन से होते हैं मूल नक्षत्र – मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा नक्षत्र मुख्य मूल नक्षत्र हैं, अश्विनी, रेवती और मघा सहायक मूल नक्षत्र हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर 6 मूल नक्षत्र हैं। अश्विनी, आश्लेषा, मूल, मघा, ज्येष्ठा, मघा और रेवती, जब बालक का जन्म इनमें होता है तो उसके स्वास्थ्य की स्थिति संवेदनशील होती है। ऐसा मानते हैं कि पिता को नवजात का मुख नहीं देखना चाहिए, जबतक इसकी शांति ना करवा ली जाए। वास्तविकता में केवल नक्षत्रों के आधार पर ही सारा निर्णय नहीं लेना चाहिए। पूरी तरह से कुंडली देखकर ही इसका निर्णय करें।

अगर बच्चे का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है तो – सबसे पहले ये देंखे कि बच्चे की स्थिति क्या है, किस कारण से उसको समस्या हो सकती है, पिता और माता की कुंडली जरूर देखें। अगर बच्चे का बृहस्पति और चंद्रमा मजबूत है तो बच्चे की सेहत का संकट खत्म हो जाता है। इसी प्रकार से अगर पिता या परिजनों के ग्रह ठीक हैं तो भी चिंता ना करें। कोई भी समस्या संस्कारों का खेल है, किसी बच्चे का इसमें दोष नहीं होता, 8 वर्ष के बाद मूल नक्षत्र का प्रभाव विशेष नहीं रहता है।

 

 

मूल नक्षत्र के दुष्प्रभाव की संभावना हो तो- जन्म के 27 दिन बाद वही नक्षत्र आने पर मूल नक्षत्र की शांति करवा लें। बच्चे की उम्र 8 साल तक होने तक माता-पिता को ऊं नम: शिवाय का जाप करना चाहिए। यदि उम्र 8 साल से ज्यादा हो तो मूल नक्षत्र की शांति की जरुरत नहीं रहती, क्योंकि ज्यादा संकट आमतौर पर 8 साल तक रहता है। मूल नक्षत्र के कारण बच्चे की सेहत कमजोर रहती है तो बच्चे की माता को पूर्णिमा का उपवास रखना चाहिए।

राशि मेष और नक्षत्र अश्विनी है तो बच्चे को हनुमान जी की उपासना करवाएं, राशि सिंह और नक्षत्र मघा है तो बच्चे से सूर्य को जल अर्पित करवाएं। बच्चे की राशि धनु और नक्षत्र मूल है तो गुरु और गायत्री उपासना करवाएं, राशि कर्क और नक्षत्र आश्लेषा है तो शिव की उपासना करवाएं। वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र होने पर भी हनुमान जी की उपासना करवाएं, राशि मीन और नक्षत्र रेवती है तो गणेश जी की पूजा करें।

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First Published on October 28, 2018 3:29 pm