Vimshottari Mahadasha Grah Dasha Calculation Hindi: जीवन में आपके साथ कई बार ऐसा हुआ होगा कि अचानक से आपके जीवन में खुशियां ही खुशियां आती रहती हैं, तो की बार दुख के बादल छटने का नाम नहीं लेते हैं। ज्योतिष में इसे ‘महादशा’ कहा जाता है। फलदीपिका के अनुसार, ज्योतिष में महादशा एक चक्र के समान होती है, जो आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों का ही निश्चय करती है। मान लो ये एक ऐसा नक्शा होता है, जो आपको ये बता देता है कि आपके जीवन के किस मोड़ में सफलता हासिल हो सकती है और कब चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हम कैसे पता कि कुंडली में महादशा चल रही है कि नहीं। महादशा सहित विम्शोत्तरी दशा प्रणाली में सूर्य, शनि सहित अन्य ग्रहों की महादशा निकालने की प्रणाली को विस्तार से बताया गया है। इस ‘कुंडली रहस्य’ श्रृंखला के इस लेख में जानिए किस नक्षत्र में जन्म होने पर कौन-सी महादशा प्रारंभ होती है, भोग्य महादशा कैसे निकाली जाती है तथा मन्त्रेश्वर और प्रचलित ज्योतिषीय पद्धति में क्या अंतर है।
विम्शोत्तरी महादशा प्रणाली वैदिक ज्योतिष की सबसे लोकप्रिय दशा प्रणाली मानी जाती है। जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उसी नक्षत्र के स्वामी ग्रह की महादशा से जीवन की दशा प्रारंभ होती है। जन्म के समय उस महादशा का कितना भाग शेष है, इसे भोग्य दशा कहा जाता है। इसकी गणना मन्त्रेश्वर पद्धति तथा प्रचलित भारतीय पद्धति दोनों से की जा सकती है। इन गणनाओं के आधार पर ज्योतिषी जीवन के विभिन्न कालखंडों के फलादेश का अध्ययन करते हैं।
क्या होती है महादशा?
बता दें कि महादशा नौ ग्रहों में से किसी एक ग्रह द्वारा शासित एक अवधि है, जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी जरूरक आती है। महादशा की अवधि कुल 120 वर्ष होती है, जो नवग्रहों में विभाजित हो जाती है। हर एक ग्रह की अलग-अलग महादशा होने के साथ वर्ष निर्धारित होती है। अलग-अलग महादशाओं का आपके जीवन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। ये इस बात पर निर्भर करका है कि आपकी कुंडली में जन्म के समय ग्रह की स्थिति क्या थी। जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के आधार पर व्यक्ति की महादशा निर्धारित होती है।
नक्षत्रों के स्वामी और उनकी महादशा अवधि
अग्न्यादितारपतयो रविचन्द्रभौम-
सर्पामिरेड्यशनिचन्द्रजकेतुशुक्राः ।
तेने नटः सनिजया चतुधान्यसौम्य-
स्थाने नखा निगदिताः शरदस्तु तेषाम् ॥२॥
इस श्लोक में 27 नक्षत्रों के स्वामी ग्रहों तथा उनकी महादशा अवधि का वर्णन किया गया है। जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उसी नक्षत्र के स्वामी ग्रह की महादशा से जीवन की दशा-चक्र की शुरुआत मानी जाती है।
| ग्रह | दशावर्ष | नक्षत्र 1 | नक्षत्र 2 | नक्षत्र 3 |
| सूर्य | 6 | कृत्तिका | उत्तरा फाल्गुनी | उत्तराषाढ़ा |
| चन्द्र | 10 | रोहिणी | हस्त | श्रवण |
| मंगल | 7 | मृगशिरा | चित्रा | धनिष्ठा |
| राहु | 18 | आर्द्रा | स्वाती | शतभिषा |
| बृहस्पति | 16 | पुनर्वसु | विशाखा | पूर्वाभाद्रपदा |
| शनि | 19 | पुष्य | अनुराधा | उत्तराभाद्रपदा |
| बुध | 17 | आश्लेषा | ज्येष्ठा | रेवती |
| केतु | 7 | मघा | मूल | अश्विनी |
| शुक्र | 20 | पूर्वा फाल्गुनी | पूर्वाषाढ़ा | भरणी |
जन्म के समय शेष महादशा कैसे निकालें?
श्लोक
ऋक्षस्य गम्या घटिका दशाब्द-निघ्ना
नताप्ता स्वदशाब्दसंख्या ।
रूपैर्नगैः संगुणयेन्नतेन
हृतास्तु मासा दिवसाः क्रमेण ॥३॥
इस श्लोक में बताया गया है कि जन्म के समय किसी ग्रह की कितनी महादशा शेष (भोग्य) है, इसकी गणना कैसे की जाती है।
कैसे करेंगे महादशा की गणना?
सबसे पहले देखें कि जन्म के समय चन्द्रमा किस नक्षत्र में स्थित है। इसके बाद जानेंगे कि जन्म के बाद वह नक्षत्र कितनी घड़ियों तक और शेष रहेगा। फिर जितनी घड़ियां शेष हैं, उन्हें उस ग्रह की कुल महादशा अवधि से गुणा करें और 60 से भाग दें।
सूत्र
भोग्य महादशा = (शेष घड़ियां × महादशा अवधि) ÷ 60
उदाहरण: पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म
अगर किसी का जन्म के समय पुनर्वसु नक्षत्र की 20 घड़ियां शेष थीं। पुनर्वसु नक्षत्र के स्वामी बृहस्पति हैं, इसलिए जन्म बृहस्पति महादशा में हुआ।
बृहस्पति की कुल महादशा = 16 वर्ष
अतः: (20 × 16) ÷ 60 = 5 वर्ष 4 महीने
यानी जन्म के समय बृहस्पति महादशा के 5 वर्ष 4 महीने शेष थे।
घड़ी का क्या है मतलब?
प्राचीन भारतीय समय मापन प्रणाली में घड़ी (घटिका) समय की एक इकाई थी। महादशा गणना में यह देखा जाता है कि जन्म के समय नक्षत्र का कितना भाग बीत चुका है और कितना भाग शेष है।
उदाहरण:
नक्षत्र कितनी घड़ियों तक और शेष रहेगा। इसमें घड़ियां की बात करें, तो ये पहले जन्म समय पर चन्द्रमा नक्षत्र में कितना चल चुका है और कितना बाकी है। इसको देखा जाता है। उदाहरण की तौर पर कहें
किसी नक्षत्र की कुल अवधि = 60 घड़ी
जन्म के समय उस नक्षत्र की 20 घड़ी बीत चुकी है
ऐसे में
शेष घड़ियां = कुल घड़ियां − बीती हुई घड़ियां
= 60 − 20= 40 घड़ी
यही 40 घड़ी नक्षत्र का शेष भाग कहलाएगा।
मन्त्रेश्वर मत और प्रचलित पद्धति में अंतर
भोग्य महादशा निकालने के विषय में मन्त्रेश्वर जी तथा अन्य ज्योतिष ग्रंथों की पद्धतियों में थोड़ा अंतर मिलता है।
मन्त्रेश्वर पद्धति
- प्रत्येक नक्षत्र का मान 60 घड़ी माना जाता है।
- गणना अपेक्षाकृत सरल होती है।
- केवल शेष घड़ियों के आधार पर भोग्य दशा निकाली जाती है।
प्रचलित भारतीय पद्धति
- नक्षत्र की वास्तविक अवधि को आधार बनाया जाता है।
- गणना अधिक सूक्ष्म और सटीक मानी जाती है।
- नक्षत्र के कुल और शेष दोनों मानों का उपयोग किया जाता है।
महादशा गणना में किस प्रकार का वर्ष लिया जाए?
रविस्फुटं तज्जनने यदासीत्तथा विधश्चेत्प्रतिवर्षमर्कः ।
आवृत्तयः सन्ति दशाब्दकानां
भागक्रमाद्दिवसाः प्रकल्प्याः ॥४॥
इस श्लोक में यह विचार किया गया है कि महादशा की गणना करते समय किस प्रकार के वर्ष का उपयोग किया जाए। ज्योतिष शास्त्र में मुख्य रूप से तीन प्रकार के वर्ष माने जाते हैं—
चंद्र वर्ष – 360 दिनों का
नक्षत्र वर्ष – नक्षत्र गति पर आधारित
सौर वर्ष – सूर्य की गति पर आधारित (लगभग 365.24 दिन)
विभिन्न आचार्यों और परंपराओं में इनका उपयोग अलग-अलग संदर्भों में किया गया है, किंतु आधुनिक ज्योतिष में प्रायः सौर वर्ष को आधार मानकर गणनाएं की जाती हैं।
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डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई ज्योतिषीय जानकारी पारंपरिक मान्यताओं और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित है। ज्योतिष एक विश्वास और अध्ययन की परंपरा है, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भविष्यवाणी की विधि नहीं माना जाता। राशिफल और ज्योतिषीय विश्लेषण को मार्गदर्शन या मनोरंजन के रूप में लें। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय (जैसे स्वास्थ्य, करियर, वित्त या अन्य जीवन संबंधी मामलों) के लिए अपने विवेक और विशेषज्ञ सलाह को प्राथमिकता दें।
