Faladesh of Surya in 12th House: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य के बिना कोई भी ज्योतिषीय विश्लेषण पूर्ण नहीं माना जाता। इसी के कारण सूर्य को ग्रहों का राजा माना जाता है। कहा जाता है कि जिस तरह पिता के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही सूर्य के बिना ज्योतिष में किसी ग्रह की शक्ति और प्रभाव को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। सूर्य से बहुत दूर स्थित ग्रह अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाते। जन्मकुंडली के मौजूद सूर्य हर भाव में अलग-अलग असर देता है। मन्त्रेश्वर द्वार रचित ‘फलदीपिका’ में सूर्य के भावों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसे भारतीय ज्योतिष का एक प्रमुख ग्रन्थ माना जाता है। आइए जानते हैं सूर्य के 12 भावों में जाने का क्या-क्या फल हो सकता है और उपायों के बारे में…

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, पिता, आत्मविश्वास, मान-सम्मान और सरकारी आदि का कारक माना जाता है। ऐसे में सूर्य की स्थिति में बदलाव का असर जातक के व्यक्तिगत गुण, संबंध, कार्यक्षेत्र, शारीरिक और मानसिक पर सबसे अधिक देखने को मिल सकता है। ‘फलदीपिका’ ग्रंथ के आठवें अध्याय में इस बारे में विस्तार से बताया गया है।

12 भाव में सूर्य का फल

प्रथम भाव में सूर्य

यदि जन्म के समय सूर्य लग्न में हो तो जातक बहुत थोड़े केश वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, प्रचण्ड, लड़ाका, घमंडी, शूर, क्रूर, क्षमा न करने वाला होगा। उसके नेत्र रक्त होंगे। यदि जन्म लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य हो तो मनुष्य स्फोटादि (फोड़ा, फुंसी, घाव, व्रण, सूजन, त्वचा पर उभरने वाला रोग।) होता है. यदि मेष में स्थित सूर्य लग्न में हो तो भी उसे नेत्र रोग होता है (तिमिर रोग)। यदि सिंह राशि का सूर्य लग्न में हो तो उसे रति में नहीं देखता। यदि तुला राशि का सूर्य लग्न में हो तो बहुत अधिक फल होता है। मनुष्य दरिद्री रहता है और उसके पुत्र नष्ट हो जाते हैं।

द्वितीय भाव में सूर्य

यदि सूर्य द्वितीय में हो तो मनुष्य विद्या, विनय, और धन से हीन होता है। उसकी वाणी में भी दोष होता है। हकलाना या इसी प्रकार का दोष हो।

तृतीय भाव में सूर्य

यदि सूर्य तृतीय में हो तो मनुष्य बलवान, शुरवीर, धनी और उदार होता है, किन्तु अपने सम्बंधी लोगों से शत्रुता रखता है।

चतुर्थ भाव में सूर्य

चतुर्थ स्थान में सूर्य हो तो मनुष्य हीन, बन्धुहीन, निर्बुद्धि और परपीड़ा करने वाला होता है। इन सब बातों का विचार किया जाता है और कर ग्रह के केन्द्र का यह फल है। ऐसा व्यक्ति अपने पिता से पाई हुई जायदाद या सम्पत्ति को व्यय कर देता है और राजा यानी सरकार की सेवा करता है।

पंचम भाव में सूर्य

अगर सूर्य पंचम में हो तो सुख हीन, धन हीन, आयु हीन और सुत हीन हो। यह हमारा बहुत बार का देखा हुआ अनुभव है कि पंचम भाव का सूर्य जैठे पुत्र का नाश करता है। किंतु जातक बुद्धिमान होता है और जंगल में घूमने का शौकीन होता है।

छठे भाव में सूर्य

यदि षष्ट स्थान में सूर्य हो तो मनुष्य राजा के समान श्रेष्ठ वैभव वाला, यशस्वी, धनी, विजयी और गुणवान होता है।

सप्तम भाव में सूर्य

यदि सूर्य सप्तम में हो तो शरीर में कोई विकार हो सकता है। ऐसा व्यक्ति राज विरोधी कार्य करता है अर्थात् सरकार का विरोध करता है। ऐसा मनुष्य व्यर्थ भ्रमण करता है और अपमान को प्राप्त होता है। सप्तम में सूर्य स्त्री सुख को भी नष्ट करता है।

अष्टम भाव में सूर्य

यदि अष्टम में सूर्य हो तो धन नष्ट हो, आयु नष्ट होती है यानी अल्पायु हो सकते हैं। इसके अलावा उसका कोई मित्र नहीं होता है। पिता दृष्टि से अर्थात् नेत्र ज्योति नष्ट पड़ जाये। हमने सैकड़ों कुण्डलियों में देखा है अष्टम का सूर्य दक्षिण नेत्र को बहुत बिगाड़ता है।

नवम भाव में सूर्य

यदि सूर्य नवम भाव में हो तो पिता से हीन हो अर्थात् कम उम्र में ही पिता का सुख न रहे। दक्षिण भारत में नवम भाव से पिता का विचार किया जाता है। इस कारण सूर्य का नवम भाव स्थित होने का पितृ कष्ट फल लिखा है। नवम में सूर्य संतान सुख और धन देता है। ऐसा व्यक्ति साधुओं और देवताओं का आदर करता है।

दशम भाव में सूर्य

यदि दशम में सूर्य हो तो जातक को सन्तान सुख, स्त्रियों का सुख हो। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान, लक्ष्मीवान, बलवान और यशस्वी होता है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और वह राजा के समान वैभवशाली होता है।

एकादश भाव में सूर्य

यदि एकादश भाव में सूर्य हो तो मनुष्य धनी और दीर्घायु होता है। ऐसे व्यक्ति को शोक नहीं होता अर्थात् वह सुखी रहता है। और बहुत से आश्चर्य के कार्य कुशलता करता है।

द्वादश भाव में सूर्य

यदि द्वादश घर में सूर्य हो तो अपने पिता से शत्रुता करे। ऐसा जातक नेत्र रोग से युक्त होता है। हमारे विचार से बारहवें में दृष्टि कमजोरी होनी चाहिए। ऐसा जातक हतहीन, पुरुषहीन भी होता है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)- इस लेख में दी गई जानकारी वैदिक ज्योतिष के पारंपरिक ग्रंथों, मान्यताओं और ज्योतिषीय सिद्धांतों पर आधारित है। जन्मकुंडली में सूर्य के फल केवल उसकी भाव स्थिति से निर्धारित नहीं होते, बल्कि राशि, दृष्टि, युति, ग्रहबल, दशा, अंतर्दशा तथा संपूर्ण कुंडली के समग्र विश्लेषण पर निर्भर करते हैं। यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। इसे किसी प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी, चिकित्सा, कानूनी, वित्तीय या व्यक्तिगत सलाह के रूप में न लें। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले योग्य विशेषज्ञ से परामर्श करना उचित है। ज्योतिष एक विश्वास और व्याख्या आधारित विद्या है, इसलिए इसके परिणाम व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों और कुंडली के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। इस लेख का उद्देश्य पाठकों को ज्योतिषीय अवधारणाओं से परिचित कराना है, न कि किसी प्रकार की गारंटी या दावा करना।