Faladesh of Chandra in 12th House: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, माता और भावनाओं का मुख्य कारक माना गया है। ऐसे में चंद्रमा की स्थिति में बदलाव का असर मानसिक स्वास्थ्य, निर्णय लेने की क्षमता, कल्पनाशीलता, सौंदर्य, शांति आदि में अधिक देखने को मिलता है। नवग्रह में से चंद्रमा एकलौता ऐसा ग्रह है, जो सबसे तेज गति से चलता है। वह एक राशि में करीब ढाई दिनों तक रहते हैं। ऐसे में किसी न किसी ग्रह के साथ युति करने के साथ-साथ अधिक प्रभाव देखने को मिलता है। इसकी गति और प्रभाव के कारण किस समय में क्या घटना होने वाली है। इसी के आधार पर पता लगाया जाता है। मन्त्रेश्वर द्वार रचित ‘फलदीपिका’ में चंद्रमा के भावों के बारे में विस्तार से बताया गया है। चंद्रमा के हर भाव के फल के बारे में ‘फलदीपिका’ ग्रंथ के आठवें अध्याय में इस बारे में विस्तार से बताया गया है। आइए जानते हैं चंद्रमा के 12 भावों में जाने का क्या-क्या फल हो सकता है…
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा की गति के द्वारा विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं बनती है। चन्द्रमा के मित्र ग्रह सूर्य और बुध है। इसके साथ ही चंद्रमा किसी ग्रह से शत्रुता नहीं रखता है। चंद्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबंध रखते है। इसके साथ ही कर्क राशि के स्वामी है। उच्च राशि वृषभ और नीच राशि वृश्चिक राशि है। चंद्रमा का शुभ अंक 2, 11, 20 है।
12 भाव में चंद्रमा का असर
लग्न भाव में चंद्रमा
यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में हो तो मनुष्य निर्भय, दृढ़ शरीर वाला, वर्चस्वी, लक्ष्मीवान और दीर्घायु होता है। किन्तु यदि कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा हो तो इसका विपरीत फल समझना चाहिये*।
दूसरे भाव में चंद्रमा
यदि चन्द्रमा धन स्थान में हो तो मनुष्य मधु वचन बोलने वाला, विषय सुखवान (आसांसारिक विषयों में बहुत रुचि उठाने वाला) और धनाढ्य होता है। किन्तु उसकी वाणी में कुछ कठोरता होती है। यदि द्वितीय भाव में चन्द्रमा हो तो आँखों का सुख हो; ऐसा व्यक्ति मधुरभाषी, बली और शूर किन्तु अत्यन्त कृपण होता है।
तीसरे भाव में चंद्रमा
शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है इस कारण इसका शुभ फल दिया है किन्तु यदि चन्द्रमा क्षय को प्राप्त हो तो इसका दुष्ट फल होता है।॥
चौथे भाव में चंद्रमा
यदि चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो जातक सुखी, भोगी, त्यागी, अच्छे मित्रों वाला, सवारी के सुख को प्राप्त और यशस्वी होता है।
पंचम भाव में चंद्रमा
यदि पंचम में चन्द्रमा हो तो मृदु गति* वाला, मेधावी (बुद्धिमान्) और अच्छे पुत्र वाला हो। ऐसा व्यक्ति राजा का मन्त्री होता है। यदि
छठे भाव में चंद्रमा
छठे में चन्द्रमा हो तो मनुष्य अल्पायु, बुद्धि हीन और उदर रोगी हो और परिभव (अपमान या हार) को प्राप्त हो।
सप्तम भाव में चंद्रमा
यदि सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो तो स्वयं सौम्य और सुन्दर हो और श्रेष्ठ पत्नी का प्यारा हो (अर्थात् उसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर हो और पति-पत्नी में प्रेम भी हो)।
अष्टम भाव में चंद्रमा
यदि अष्टम में चन्द्रमा हो तो जातक रोगी और अल्पायु होता है।
नवम भाव में चंद्रमा
चन्द्रमा नवम में हो तो जातक शुभ धर्मा (शुभ धार्मिक आचरण करने वाला) होगा और उसके पुत्र भी होंगे।
दशम भाव में चंद्रमा
यदि दशम में चन्द्रमा हो तो ऐसा जातक विजयी होता है; जिस काम में वह हाथ लगाता है उसमें प्रारम्भ में ही सफलता हो जाती है। ऐसा व्यक्ति शुभ कर्म करने वाला और सज्जनों के साथ उपकार करने वाला होता है।
एकादश भाव में चंद्रमा
यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो मनुष्य मनस्वी, दीर्घायु, धनवान्, पुत्रवान्, होता है। और उसे नौकर का भी सुख प्राप्त होता है।
द्वादश भाव में चंद्रमा
व्यय भावगत चन्द्रमा का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति आलसी, अपमानित, दुःखी होता है और उससे अन्य द्वेष करते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)- इस लेख में दी गई जानकारी वैदिक ज्योतिष के पारंपरिक ग्रंथों, मान्यताओं और ज्योतिषीय सिद्धांतों पर आधारित है। जन्मकुंडली में सूर्य के फल केवल उसकी भाव स्थिति से निर्धारित नहीं होते, बल्कि राशि, दृष्टि, युति, ग्रहबल, दशा, अंतर्दशा तथा संपूर्ण कुंडली के समग्र विश्लेषण पर निर्भर करते हैं। यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। इसे किसी प्रकार की निश्चित भविष्यवाणी, चिकित्सा, कानूनी, वित्तीय या व्यक्तिगत सलाह के रूप में न लें। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले योग्य विशेषज्ञ से परामर्श करना उचित है। ज्योतिष एक विश्वास और व्याख्या आधारित विद्या है, इसलिए इसके परिणाम व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों और कुंडली के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। इस लेख का उद्देश्य पाठकों को ज्योतिषीय अवधारणाओं से परिचित कराना है, न कि किसी प्रकार की गारंटी या दावा करना।
